<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' version='2.0'><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276</atom:id><lastBuildDate>Sun, 01 Nov 2009 13:00:09 +0000</lastBuildDate><title>नव प्रवाह</title><description>हम जमीं से चले हैं आसमान के वास्ते,
   आप तो शिखर पे हैं,आपको सहूलियत होगी...</description><link>http://navpravah.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>40</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-3987507357451094074</guid><pubDate>Mon, 11 May 2009 15:47:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-05-11T08:53:10.013-07:00</atom:updated><title>शर्म की बात है मोइली साहब!!!</title><description>अगर आज के यूथ की भाषा में बोलें तो नपना एक स्वाभिवक प्रक्रिया है....हर कोई कभी न कभी, कहीं न कहीं नपता जरूर है। सबका हक है भई...तो, लो जी कल तक हर समय गाहे-बगाहे टीवी पर कर..कर..करने वाले मोइली साहब तो बड़े भाग्यशाली निकले ..ऐसे ही थोड़े न उनकी पार्टी के लोग उनके खिलाफ बीज बोने में लगे थे...मैडम की असीम अनुकम्पा जो उनपर है...तो चुनाव चल ही रहा है..लेकिन नंबर ज्यादा होने के कारण सबसे पहले मोइली साहब ही नपे।&lt;br /&gt;ऐसे तो यह इतिहास रहा है कि हर चुनाव के बाद कुछ लोग नपते जरूर हैं लेकिन ऐसी भी क्या तेजी कि आखिरी चरण का चुनाव सर पे है और पार्टी के मीडिया विभाग के प्रमुख नप गये।&lt;br /&gt;बहरहाल, इसबार के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी के साथ ऐसी कई बातें खास थीं जो खटकीं...वीरप्पा मोइली साहब की बोलती बंद होना भी उन खास बातों में से एक है। अब कुछ तो लोग कहेंगे ही॥अजी, उनका काम ही जो कहना है...मसलन,कांग्रेस के मीडिया विभाग में बहुत सारी गड़बड़ियां थीं, उसमें ऐसे लोग थे जो बड़बोलेपन के शिकार थे और कुछ भी अनाप-शनाप बोलते रहते थे, वगैरह...वगैरह। &lt;br /&gt;अब जरा सोचिए जब पार्टी का युवराज किसी बिहार के मुख्यमंत्री को अच्छा कह दिया तो वह अच्छा है न...अब आपके मंत्रीमंडल का कोई वरिष्ठ मंत्री आपको नहीं पसंद तो न सही...लेकिन मैडम (और अब तो सर भी) की आज्ञा के बगैर आप कुछ भी बोल देंगे, ये कोई सलीका थोड़े न है। इतने दिनों से राजनीति कर रहे हैं... (अब तो आप खुद भी वरिष्ठ हो गये हैं) और आपको यह भी नहीं पता कि राजनीति में कब किसके बारे में क्या कहना है...शर्म की बात है मोइली साहब!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-3987507357451094074?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2009/05/blog-post_11.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>11</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-2226793960870073455</guid><pubDate>Sun, 10 May 2009 10:44:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-05-10T04:46:49.117-07:00</atom:updated><title>इन्तजार कर लेना ही मुफीद होगा...</title><description>&lt;span style="font-size:100%;"&gt;महंगाई और आर्थिक मंदी के पहिये पर रेंगता हुआ, गठबंधन के जंजाल में जकडा भारतीय लोकतंत्र एकबार फिर से अंगडाई लेते हुए नया करवट बदलने को आतुर है। लेकिन कई सारे ऐसे पहलू हैं जो इसबार के आमचुनाव को ख़ास बनाते हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक के भारतीय इतिहास में संभवतः यह पहलीबार है जब प्रधानमन्त्री पद के दावेदार को लेकर चुनाव पूर्व ही इतनी साड़ी बिसातें बिछ गयी हैं...गांधी टाईटल वाले नेताओं को छोड़ दें तो यह पहलीबार है जब कांग्रेस ने चुनाव के पहले ही अपना कैंडिडेट घोषित कर रखा है. पिछले आम चुनावों को देखें तो कांग्रेस पार्टी अब तक अपने आलाकमान/ गांधी नाम पर ही चुनाव लड़ती थी...लेकिन इसबार मनमोहन सिंह को आगे कर चुनाव लड़ रही है...वह भी तब जब उसके स्थायी युवराज पूरे देश में पैर जमाने की जुगत में लगे हैं...ऐसे में पूरे जोरदार ढंग से मनमोहन को अपना कैंडिडेट बताकर कांग्रेस क्या सिद्ध करना चाहती है, इसे समझना बहुत कठिन नहीं है...यह मजेदार रहस्य इस वाक़ये से और भी स्पष्ट हो जाता है- आज तक भाजपा के पीएम इन वेटिंग (तथाकथित मजबूत नेता) लालकृष्ण आडवाणी द्वारा बेइंतहा खरी खोटी सुनने और लगाए गए ढेरों आरोप मसलन, इतिहास के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री और मैडम के पिट्ठू...वगैरह...वगैरह...का जवाब आखिरकार मित/ मृदु भाषी समझे जाने वाले मनमोहन ने दे ही दिया...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि उनका जवाब देना कोई बड़ी बात नहीं थी तब जबकि उनके प्रतिद्वंदी आडवाणी अमेरिकी तर्ज पर भारतीय लोकतंत्र का फैसला टीवी के डिबेट से करना चाह रहे हों...लेकिन चूँकि मैडम सोनिया की सरपरस्ती में फूंक-फूंक कर कदम रखने वाले मनमोहन सिंह ने ऐसा किया...बात बड़ी लगती है। लेकिन इससे भी मजेदार बात तो यह है कि जब उनसे इस बाबत पूछा गया कि भई, इतने दिनों से आरोप लगते रहे तो जवाब आज ही क्यों...तो उनका कहना था कि...चूँकि आजतक मुझे विश्वास नहीं था कि मुझे कैंडिडेट बनाया जायेगा या नही...लेकिन आज जब मुझे विश्वास हो गया है कि मैं ही कांग्रेस का पी एम इन वेटिंग हूँ...तो जवाब दे दिया। ध्यान देने की बात यह है कि मनमोहन के फार्म में आने के महीनों पहले से ही आलाकमान की तरफ से ये बात बार-बार कही जा रही थी कि उनके कैंडिडेट वे ही होंगे। लेकिन क्या करें भले -मानस लोगों में इज्जत की पुंगी बजने का दर कुछ ज्यादा ही रहता है...सो, कुछ कांग्रेसियों द्वारा प्रधानमन्त्री पद के दावेदार बताये जा रहे राहुल गांधी द्वारा बार-बार आश्वासन मिलने पर भी कि मनमोहन ही कैंडिडेट हैं...उन्हें अपनी कमजोरी का एहसास सताता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बहस को यहीं छोड़ते हैं...आते हैं दूसरी बड़ी पार्टी भाजपा पर, तो इसबार कुछ भी बहुत नया नहीं नजर आ रहा है...शिवाय इसके कि आजतक वाजपेयी के मुखौटे पर वोट मांगने वाली भाजपा आज आडवानी का नाम लेने पर मजबूर है...बाकी हरबार कि तरह इसबार भी भाजपा ने पहले से अपना कैंडिडेट घोषित कर रखा है...आडवानी, पी एम इन वेटिंग! लेकिन आडवानी के पेशानी कि लकीरों में झाँका जाये तो उसमें कहीं न कहीं मोदी और मुरली मनोहर जोशी कि तस्वीर साफ़-साफ़ झलकती है तब जबकि मोदी खुलेआम इसबात का ढिंढोरा पीट रहे हैं कि इसबार ही नहीं बल्कि 2014 का चुनाव भी आडवाणी जी के नेतृत्व में ही लड़ा जायेगा (कौन समझाए उन्हें नेतृत्व में लड़ना और बात होती है और पीएम बनना और) लेकिन कभी- कभी मजबूत और निर्णायक लोग भी काँप जाते हैं, इसे पचाना कोई तकलीफ कि बात नहीं...अब ऐसी भी क्या बात है इज्जत केवल म्रिदुभाशियों कि ही थोड़े होती है... एक बात और जो ख़ास है, 96 के चुनावों को देखें तो, तब तीसरा मोर्चा बना था , जो उस वक्त तक के लिए ख़ास था..लेकिन इसबार तो चौथा मोर्चा भी मोर्चेबंदी में लग गया है। हद तो यह है की महाराष्ट्र में अपने पार्टी के लिए एक अदद मुख्यमंत्री भी न जुगाड़ पाने वाले शरद पवार से लगाए बहन जी तक इस जमात में शामिल हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीँ राहुल गांधी के शब्दों में 'आर्थिक सुधार व विकासवादी' व्यक्तित्व वाले बिहार तक ही सीमित रहे बिहार के ,मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपरोक्ष रूप से ही सही इस घुड़दौड़ में शामिल हैं...लेकिन एनडीए के घटक के रूप में उनके लिए यह दिवास्वप्न सरीखा ही है...वे भी इस जुगत में हैं की चुनाव बाद यूपीए से गलबहियां कर कुछ तो उखाड़ ही लें। लेकिन एनडीए कि प्रमुझ घटक किसी भी सूरत में ऐसा होने देने के मूड में नहीं है। क्योंकि पहले ही अपने एक बड़े घटक बीजद के अलग होने के बाद भाजपा इस मामले में ज्यादा सतर्क है...लेकिन राजनीति में कुछ भी संभव है। जब यूपीए के कद्दावर सहयोगी लालू-पासवान और मुलायम यह सपना देख सकते हैं तो फिर नीतीश क्यों नहीं. आखिर हैं तो सब गुरुभाई ही... खैर, चार चरणों के मतदान हो चुके हैं. आखिरी चरण का चुनाव भी बहुत दूर नहीं , तो १६ मई का इन्तजार कर लेना ही मुफीद होगा...फिर किसी हजाम से इसपर बहस करने कि गुन्जायिश ही नहीं बचेगी कि माथे पर कितने बाल हैं. जैसे ही वोटिंग मशीनें अपने अन्दर छिपे राज उगलने शुरू करेंगी...बालों कि गिनती स्पष्ट होती चली जायेगी और पीएम इन वेटिंग/ सेटिंग का सिलसिला भी ख़त्म हो जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-2226793960870073455?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2009/05/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>10</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-4434801169162910177</guid><pubDate>Mon, 19 Jan 2009 04:51:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-01-18T21:08:42.682-08:00</atom:updated><title>क्षमा शोभती उस भुजंग को...</title><description>ऐसे तो हिन्दुस्तान धमाकों का देश बन चुका है,कोई भी जगह ऐसी नहीं बची जिसे सुरक्षित माना जाए...चाहे वो संसद ही क्यों न हो....पर मुम्बई में हुए धमाकों ने हमारी एक और अदा की बानगी पेश की॥हमारी बुझदिली! मुम्बई में धमाके क्या हुए ,मानो क़यामत ही आ गई...लोग गला फाड़ने लगे,लोगों का काम ही है गला फाड़ना।बेचारे कर भी क्या सकते हैं,कोई भी ख़ुद को लाचार और असुरक्षित महसूस करने वाला इंसान थक-हारकर गला फाड़ने लगता है,तो ये कोई नई बात नही...ऐसा तो हर धमाके के बाद ही होता है.पर जो बात इसबार अजीब हुई कि लोगों( आम जनता) ने तो अपना काम किया ही(इस मामले में हम भारतीय बहुत ईमानदार हैं)आश्चर्यजनक तरीके से हमारे सुख-दुःख के नियंता,हमारे नेतागण भी गला फाड़ने लगे....देने लगे पाकिस्तान को चेतावनी,उधर पाक अपनी मनमानी करता रहा...इसबीच गृहमंत्री बार बार कहते रहे,इसबार मार फ़िर बताता हूँ.कभी तो आतंकियों के पाकिस्तानी होने का सबूत पाक को दिखाते तो कभी विश्व समुदाय को दिखाने की बात करते...थक हारकर अमेरिका की शरण में आ गिरते...उखड़ता कुछ नही.. क्या हो गया हमें? कहीं हमने अपनी धार तो नहीं खो दी (दुर्भाग्य से वो कभी थी ही नही..)क्योंकि जिसके पास कुछ करने का बूता होता है वो धमकियाँ नहीं देता, क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,उसको क्या जो दंत-विहीन विषरहित विनीत सरल होक्या हुआ अमेरिका में..एक धमाका हुआ और उसने खड़े-खड़े अफगानस्तान को नेस्तोनाबूद कर दिया ग़लत किया कि सही यह अलग विवाद का मसला हो सकता है..पर असल बात यह है कि उसने अपने जख्म पर मरहम लगाने के लिए भारत या किसी अन्य देश के आगे गुहार नहीं लगाई नही,जो करना था कर गुजरा..हमें आजाद हुए ६ दशक से भी ज्यादा हो गए,इस बीच हम बहुत बड़ी परमाणु शक्ति भी बन बैठे,फ़िर भी आज भी किसी भी छोटी-बड़ी समस्या पर दूसरो के आगे टेसुयें बहाने की आदत नहीं गई. ऐसा क्यों? क्या पाक और अमेरिका के माँओं के सीने से ही दूध निकलता है,हमारी माएं पानी पिलाती हैं?&lt;br /&gt;क्या हिन्दुस्तान की माँओं ने कायर और नामर्द जनना शुरू कर दिया है? नही॥ऐसा बिल्कुल नही,अब मुम्बई धमाकों के बाद सोनिया गाँधी का भाषण ही सुन लीजिये (आख़िर,वह भी एक मां हैं..) कि हम भारतीयों में बलिदान की उत्कृष्ट परम्परा रही है...क्या मायने हैं इसके ?क्या हम भारतीय सिर्फ़ गुमनाम मौत मरने के लिए ही पैदा होते हैं? चलिए दूसरे तरीके से बात करते हैं...अगर 26/11 की घटना मुम्बई की जगह वाशिंगटन में हुई होती तो क्या होता..पाकिस्तान अबतक इराक की शक्ल अख्तियार कर चुका होता..पर,भारत ऐसा नही कर पाता..आखिर क्या मज़बूरी आड़े आती है? सच कहते हैं पाकिस्तानी कि हमलोग बिल्कुल कायर और नामर्द।हमारा लहू कभी उबलता ही नही.हर एक घटना के बाद हमारे विदेशमंत्री एक ही राग अलापते हैं कि सारे विकल्प खुले हैं...क्या मतलब निकाले हम इसका ?क्या चुल्लू भर पानी में डूब मरने का विकल्प भी नहीं खुला है?मुम्बई हमले को दो महीने होने को आए और हम जहाँ के तहां हैं...कुछ हुआ है तो फकत लफ्फाजियां..हमारे हुक्मरान कहते हैं कि युद्ध की कोई संभावना नही,अरे,कौन चाहता है कि युद्ध हो? पर, कि पाकिस्तान यूँ हमारी निर्लज्ज कायरता के कारण वाक् ओवर पा जाए यह भी तो नही चाहते...दुर्भाग्य है कि ,अपने जख्मों का हिसाब लेने के लिए हम उम्मीद करते हैं उस अमेरिका से जिसने ख़ुद पाक में आतंक को पाला-पोषा है और बेइंतहा पैसा खर्च करके उसे अपना प्रिय पिट्ठू बनाया है, हम उम्मीद करते हैं उस अमेरिका से जिसे किसी भी सूरत में पाक-अफगान सीमा पर पाकिस्तान की मदद की दरकार है.यदि भारत-पाक युद्ध होता है तो पाकिस्तान अपनी सेना वहां से हटा लेगा जो कि अमेरिका के लिए किसी अंधे कुंए में गिरने से भी बदतर होगा...ऐसे में अमेरिका से मदद की उम्मीद हमारी किस मानसिक दशा को दर्शाता है?आज अगर हमारे पास मुम्बई की घटना में पाक के शामिल होने के पुख्ता सबूत हैं तो अमेरिका के आगे झोली फैलाने का क्या मतलब?क्या हम इस लायक भी नहीं कि छोटे-मोटे हिसाब ख़ुद क्लियर कर लें?हम चीखते हैं कि सारे सबूत पूरे दुनिया को दिखायेंगे,किसे दिखायेंगे,उन्हें जो अपनी आँखे जानबूझकर खोलना ही नहीं चाहते.क्या आंखों देखी को भी प्रमाण की जरुरत होती है?दुनिया में कौन ऐसा अँधा है जिसे पाक की आतंकी करतूतों की ख़बर नही? हमारी पीढी के लिए यह शायद पहलीबार है जब पूरे देश में नेताओं के विरुद्ध रोष की ऐसी लहर उठी है,अगर फिरभी सब-कुछ ऐसे ही चलता रहा तो बहुत जल्द ये लहर सुनामी का रूप धर लेगी,जिसकी तबाही से हमारे हुक्मरान भी बच नहीं पायेंगे...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-4434801169162910177?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2009/01/blog-post_18.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>16</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-5169733865809832479</guid><pubDate>Sat, 17 Jan 2009 10:37:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-01-17T02:38:59.884-08:00</atom:updated><title>इंसान ग़लतियों का पुतला है...</title><description>मुम्बई की घटना जहाँ एक तरफ़ पूरे देश को एकजुट करने के काम आई,वहीँ दूसरी तरफ़ इसने कई लोगों की राजनीतिक हैसियत भी चमकाई.जी हाँ, हम बात कर रहे हैं अल्पसंख्यक मामलों के केन्द्रीय मंत्री अब्दुल रहमान अंतुले की.साथ ही देश के अन्य छोटे-बड़े नेताओं की भी जिनकी राजनीतिक हैसियत सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्म और जाति पर ही टिकी हुई है.मुम्बई धमाके होते ही प्रधानमन्त्री से लगाए गृहमंत्री सभी ने संसद और संसद के बाहर आतंकवाद के विरूद्ध लम्बी-लम्बी लफ्फाजियां शुरू कर दीं.यह सबकुछ बेरोक-टोक चल ही रहा था कि अंतुले महोदय ने एटीएस के पूर्व प्रमुख हेमंत करकरे और अन्य दो अधिकारियों की मौत की अलग-अलग जांच की मांग कर दी.ये तीनो एक ही गाड़ी में बैठे हुए आतंकी हमले में मारे गए.अंतुले साहब का मानना था कि इन अधिकारियों की मौत हिंदू आतंकियों की साजिश है.क्योंकि करकरे मालेगाँव ब्लास्ट मामले में हिंदू नेत्री साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की भूमिका की जांच कर रहे थे .उनका बयान था- "वे (हेमंत करकरे) आतंकवाद के शिकार हुए या आतंकवादियों के साथ-साथ किसी और चीज के भी,मैं नहीं कह सकता......लेकिन उन्हें पता लगा था कि कुछ आतंकी गतिविधियों में गैर-मुस्लिम भी शामिल हैं.और आतंकवाद की जड़ में जाने वाला हर शख्स निशाने पर रहता है."पूरा का पूरा मामला ही एकदम से उलट गया.धमाके से तमतमाए कांग्रेसी नेता और प्रधानमन्त्री झट बचाव की मुद्रा में आ गए.यह बचाव आतंकवाद से देश का नहीं बल्कि ख़ुद का इस बयान से था.कहने लगे-"इंसान गलतियों का पुतला है,सो,हमें इस मामले को तूल नहीं देना चाहिए."उधर रोज ही जुबानी जमा खर्च में लगे रहने वाले राहुल गाँधी और उनकी माता सोनिया जी ने मानों मौन ही धारण कर लिया,वो तो भला हो पत्रकार साथियों का जो मुंह में अंगुली करके बयान ले ही लेते है,तो युवराज को कहना पड़ा "कांग्रेस के दुसरे बड़े नेता इसपर आपस में विचार-विमर्श करेंगे".इसके बाद हमेश कि तरह मसले को सुलझाने के लिए प्रणब मुखर्जी को आगे किया गया,पर जब फ़िर भी बात नहीं बनी तो गृहमंत्री पि.चिदंबरम ने पाँच पेज का एक लंबा चौडा स्पष्टीकरण पेश किया(वित्त बजट कि ही तरह नापा तुला और चतुराय से भरा हुआ) जिसमें उन्होंने कहा "करकरे द्वारा कि गई जाँच और उनकी मौत कि परिस्थितियों पर अंगुली उठाना ग़लत बात है और यह बहुत अफसोसजनक है."स्पष्टीकरण के आते ही अंतुले महोदय बेहयाई हँसी के साथ नरम पड़ गए पर शिवराज पाटिल कि तरह इस्तीफा देने कि गुस्ताखी से बचे रहे.दे भी कैसे सकते थे जब दिग्विजय सिंह जैसे उनके अनन्य सहयोगी कहते हैं "यदि अंतुले ने जांच के लिए कह भी दिया तो क्या ग़लत किया?अंतुले जैसे राष्ट्रवादी और धर्मनिरपेक्ष नेता को राष्ट्रविरोधी कहा जा रहा है."अब इस पूरे मामले को क्या कहा जाए?हिम्मत है तो कह दीजिये,सब वोट कि राजनीति है!!&lt;br /&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-5169733865809832479?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2009/01/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-8700065583888385935</guid><pubDate>Wed, 31 Dec 2008 14:20:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-01-03T07:09:23.090-08:00</atom:updated><title>ब्लॉगर साथियों माफ़ करना....</title><description>विलम्ब के लिए माफ़ी,क्योंकि तमाम ब्लॉगर साथियों ने जिस मुद्दे पर कोहराम मचा रखा है उसमें मैं पिछड़ गया.मैंने कल ढेरों ब्लॉग पढ़े और लगभग सभी में एक सी ही बातें और प्रतिक्रियाएं थीं.वो क्या थीं बताना अब जरुरी नहीं रह गया.सोंचा मैं भी इस जमात का हिस्सा बन जाऊं. कुछ लोगों ने इसे दुर्भाग्य करार दिया.उनका कहना था कि वैसे तो वे दिल्ली में नहीं थे या किन्ही कारणों से नहीं थे और अगर मौके पर मौजूद होते तो भी वे हिन्दयुग्म के उस वार्षिकोत्सव में नहीं जाते जहाँ,कलम के स्वामी माननीय राजेन्द्र यादव जी मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे और अपने आशीर्वचनों से सभी हिन्दी प्रेमियों को अभिभूत कर दिया.औरों का तो मैं नहीं जानता पर मेरे लिए यह परम सौभाग्य की बात थी कि मैं उस सफल आयोजन का हिस्सा था. बहुत बवाल मचा कि राजेंद्र जी ने ये कहा,वो कहा,वगैरह वगैरह..असल बात यह है कि ये सारा बवाल उनलोगों ने खड़ा किया जो ख़ुद मौके पर मौजूद नहीं थे और सुनी सुनाई बातों पर ही कान देते रह गए.अब इतनी बात हो ही गई तो ये उल्लेख कर ही देते हैं कि उन्होंने कहा क्या...वैसे तो उन्होंने काफ़ी कुछ कहा पर उसमें ढेर सारा हिन्दयुग्म के बारे में था,अब बात करते हैं उन बातों का जिन पर उत्पात मचा हुआ है,उन्होंने कहा-&lt;br /&gt;-हमें १६वीं सदी के पहले के साहित्य को बक्सों में बंद कर देना चाहिए क्योंकि उनसे आज की पीढी,यूँ कहें हिन्दी को कोई लाभ नहीं.उन्होंने ये नहीं कहा कि आप बिल्कुल उन्हें मत पढ़ें,ये आप की मर्जी.अपने बृज,अवधी और ऐसी तमाम भाषाओँ सम्बन्धी लिप्सा को जमकर बुझाईये पर इस चक्कर में इस पीढी या खासकर आनेवाली पीढी को तो कम से कम मत ही तंग करिए जिसके लिए पैदा होते ही लक्ष्य थमा दिया जाता है कि तुम्हे अंग्रेजी आनी चाहिए,उससे निपटे तो फ्रेंच,जर्मन और ऐसी तमाम भाषाओँ को भी जानना है,इसी बीच हिन्दी तो सीखनी ही है.फ़िर क्योंकर बोझ लादना? वैसे भी एक तरफ़ तो हम आधुनिकता का दम भरते हैं दूसरी तरफ़ रुढियों में जीने का शौक भी पाल रखे &lt;span class=""&gt;हैं.मुश्किल &lt;/span&gt; है जी.दोगलापन  केवल हमारे नेतागणों को ही शोभा देता है.- दूसरी बात ,&lt;span class=""&gt;वे मंच &lt;/span&gt; पर बैठे हुए,अपनी पाईप से धुंए उडा  रहे थे,अपना-अपना तकाजा है इस बात पर,हो सकता है कि आप ख़ुद ही खुन्दस  खाए हों,अरे  भाई कभी सुट्टा  के चक्कर में पाकेट ढीली  हुई हो,तो इसके लिए आप दुसरे  को क्यों नोचने  पर अमादा  हैं.मैं ये नहीं कहता  कि नियम  तोड़कर  सार्वजनिक  जगह पर धुम्रपान  अच्छी बात है,पर इसके लिए आप कान तो मत ही खाईये .इसके लिए हमारे स्वस्थ्य  मंत्री  ही काफ़ी नहीं क्या?&lt;br /&gt;- तीसरी  बात उन्होंने कही कि अगर हिन्दयुग्म के लोग सिखाने  को तैयार हों तो इस उम्र  में भी मैं ब्लॉगर बनना  पसंद करूँगा ,क्योंकि दोजख  की जबान  भी तो यही होगी,अब इसमें क्या ग़लत है भाई?आप ख़ुद दिनभर  नेट पर बैठकर टिपटिपीयाते रहते हैं पर जब एक उम्रदराज  आदमी  वही चीज  सीखना  चाहता है तो आपत्ति क्यों? समझ से परे है,ये सबकुछ अजी ,अब इतने retrogessive होकर रहेंगे तो तकलीफ  होगी,वक्त के साथ,पजामा  छोड़कर सूट &lt;span class=""&gt;और खडाऊं &lt;/span&gt; छोड़कर स्टायलिश  जुटे  पहनना  तो मंजूर  कर लिया पर भाषा की बात आते ही रुढियों की दुहाई... माफ़ी चाहूँगा,एक बात और मैंने पढ़ी  थी उसका उल्लेख करना भूल गया.कुछ साथियों ने ये लिखा था की वे ट्राल हैं,अजी ,क्या कम से कम भारत में राजेन्द्र यादव को इसकी जरुरत है ?उल्टा चोर कोतवाल को दांते,ख़ुद राजेन्द्र यादव के साथ जुड़कर थोडी शोहरत बटोर पाने की जुगत में जाने कब आप ख़ुद ट्राल हो गए और दोष देते हैं॥यादव जी को,ये तो बेनियाजी है गुरु...कुछ बुरी लग सकने वाली बातों और शब्दों के लिए सभी ब्लॉगर साथियों से फ़िर माफ़ी...&lt;br /&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-8700065583888385935?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/12/blog-post_31.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-5611005004025272709</guid><pubDate>Thu, 11 Dec 2008 10:00:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-11T02:13:11.155-08:00</atom:updated><title>मानवाधिकार: अब तो अंगुली करने से बाज आ जाओ...</title><description>&lt;p&gt;&lt;em&gt;किसी का कद बड़ा कहना,किसी के कद को कम कहना,&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;em&gt;आता नहीं हमें गैर मोहतरम को मोहतरम कहना,&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;em&gt;चलो चलें सरहद पर देश के लिए जान देने,&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;em&gt;बहुत आसान है बंद कमरे में वंदे मातरम कहना!&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt; इंसानी सभ्यता के शुरुआत के समय से ही अर्थात जब मानव ने जंगली जीवन छोड़कर सामाजिक जीवन में कदम रखा तब से ही प्राकृतिक रूप से उसने अपने अधिकारों और कर्तव्यों के दायरे बना लिए।धीरे धीरे सामाजिक जीवन का विस्तार हुआ,समाज ने एक व्यवस्थित आकार लेना शुरू किया तो, कुछ कायदे क़ानून भी बन गए,जिनके अनुसार कुछ काम करना अनिवार्य हो गए तो वहीँ कुछ काम वर्ज्य बन गए.इन सबके बीच हमें इंसानी(मानवीय) अधिकार भी मिले जो आगे चलकर मानवाधिकार बन गए. &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैसे तो हर देश अपने नागरिकों को तमाम सारे अधिकार देता है और लगभग हर जगह मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थायें भी हैं.भारतीय संविधान में भी नागरिकों को तमाम सारे अधिकार दिए गए हैं,विश्व में शायद सबसे अधिक क्रियाशील मानवाधिकार आयोग भी है.पर ११ सितम्बर की घटना के बाद जब अमेरिकी सैनिकों द्वारा "अबू गारेब जेल" सहित अनेक जगहों पर कैदियों के साथ दरिन्दगी भरे बर्ताव की बातें सामने आयीं,इज़राइल.पलाऊ और मार्शल आईलैंड जैसे देशों में बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार की बातें उभरकर आयीं तो वैश्विक स्तर पर ऐसे किसी संगठन की जरुरत महसूस हुई जो इन सब बातों की देख रेख करे कि कोई भी देश अपने बंदियों या अपने नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार न करे.इस तरह 19 जून 2006 को जेनेवा में युनाईटेड नेशन आफ  ह्यूमन राईट्स काउन्सिल का गठन किया गया जिसमें भारत सहित ५३ देश शामिल हैं.हालाँकि इसे अपने गठन के समय से ही अमेरिका,इज़राइल,पलाऊ और मार्शल आईलैंड जैसे देशों का विरोध झेलना पड़ा. खैर,ये तो रही मानवाधिकार आयोग के गठन और इतिहास की बातें,अब आतें हैं भारतीय परिदृश्य में मानवाधिकार आयोग की जमीनी हकीकत पर.भारत में यों तो नागरिकों को संविधान के माध्यम से ढेरों अधिकार और कर्त्यव्य दिए गए हैं इनके संरक्षण के महत्व को देखते हुए अलग से एक स्वच्छंद मानवाधिकार आयोग का गठन भी किया गया,तमाम बड़े अधिकारों से लब्ध यह आयोग जब चाहे जिसे अपने "स्केल" पर नाप सकता है और नपने वाला छींक तक नहीं ले सकता क्योंकि जबतक वो छींकने की जुर्रत करे तबतक उसे निमोनिया हो चुका होगा.हालाँकि ये जरुरी नही कि हर बार ऐसा ही हो पर कमबख्त आंकडों पर किसका जोर है.दुर्भाग्य से इनकी सबसे अधिक गाज गिरती है उन पुलिसकर्मियों पर जो पूरे समाज पर अपनी गाज गिराते फिरते हैं.&lt;br /&gt;एक आतंकी जब ढेरों लोगो को हताहत करने के बाद पुलिस की गोलियों का शिकार होता है तो गहरी नीद में सोया मानवाधिकार आयोग जाग उठता है,जब एक वहशी दरिंदा एक नाबालिग़ के साथ दुष्कर्म करने के बाद बड़ी बेरहमी से उसे मौत के घाट उतार देता है तो सबकुछ शांत रहता है पर जब पुलिस उसी दरिन्दे पर लाठियां चलने लगती है तो आयोग जाग उठता है,निठारी में अनेक बच्चे(जिनकी सही गिनती भी नहीं) एक हैवान की हैवानियत का शिकार हो गए,आयोग ऊँघता रहा पर जब वो हैवान पुलिसिया शिकंजे में आ फंसा तो आयोग जाग उठा,अभी हाल ही में मुम्बई को आतंकियों ने दहला दिया,तब शायद ही कोई महामानव रहा हो जिसका कलेजा न फटा हो पर ये धमाके भी आयोग की कुम्भकर्णी नीद तोड़ने में असफल रहा,पर पकड़े गए एक आतंकी कसाब ने पुलिस पर थर्ड डिग्री का आरोप क्या लगाया झट आयोग जाग उठा,कमाल है जनाब,.......ये कैसी नीद है आपकी? दुनिया के सारे धर्म सम्प्रदाय कहते हैं जो किसी मानव की हत्या करता है वो मानव नहीं रह जाता,या फ़िर आतंकियों का कोई जात धर्म नही होता,वे इंसान ही नहीं होते,क्योंकि कोई भी इंसान किसी की हत्या करने के पहले हज़ार दफे सोचेगा,पर क्या आतंकी ऐसा सोचते हैं कभी.....नहीं,तो...वे कैसे मानव?पर,असल मानव तो वही हैं क्योंकि हमारा आयोग हरदम उन्ही की हिमायत में लगा रहता है.एक हाल की घटना का जिक्र करना लाजिमी होगा,बीते दिनों दिल्ली के बाटला हाउस इलाके में कुछ तथाकथित आतंकी(&lt;em&gt;तथाकथित इसलिए कि हमारे पूज्य,अमर सिंह,कपिल सिब्बल,अर्जुन सिंह जैसे लोग उन्हें आतंकी मानने से इनकार करते हैं )&lt;/em&gt; पुलिस इनकाउन्टर में मारे गए,इस मुठभेड़ में पुलिस के जाबाज अधिकारी एम.सी.शर्मा शहीद हो गए,कुछ अन्य जवान भी घायल हो गए,कमाल तो देखिये जनाब,जो शहीद हुए उनका कोई नही पर जो दुर्दांत मारे गए उनके लिए आयोग वाले गला फाड़ने लगे(यहाँ हम नेताओं की &lt;em&gt;बात नहीं कर रहे हैं,कम से कम इंसानी बिरादरी से तो उन्हें दूर ही रखिये).&lt;/em&gt; हालाँकि यह कहना एकतरफा बात होगी कि मानवाधिकार आयोग ने सिर्फ़ बेगुनाहों को ही सजा दिलाई है,कभी कभी उन्होंने गुनाहगारों को भी सजा दिलाई है,ये अलग बात है कि ऐसे आंकड़े ही दुर्लभ होते हैं. ऐसे में यह सवाल बड़ा ही लाजिमी हो जाता है कि क्या मानवाधिकार सिर्फ़ आतंकियों या अपराधियों के ही होते हैं,वीर जवानों,ईमानदार पुलिसकर्मियों या निर्दोष जनता के नहीं ?ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ भारत में ही आतंकियों और अपराधियों के मानवाधिकार की बातें होती हैं,पश्चिमी देशों में भी ऐसी बातें होती हैं.पर वहां दोगलापन नहीं होता,हमारी तरह वहां के मानवाधिकार वाले पुलिस की राह में रोड़े &lt;em&gt;नहीं होते बल्कि&lt;/em&gt; उनके सहायक होते हैं,शायद यह भी एक वजह है कि अमेरिका में ११ सितम्बर के बाद आतंकवाद के नाम पर पटाखे तक नहीं फूटे,पर भारत में........खुदा,खैर करे.और दिनों की तो बात नहीं कर सकता पर औपचारिक रूप से घोषित मानवाधिकार दिवस पर यह उम्मीद करते हैं कि शायद अपना आयोग आम जनता और पुलिस के मानवाधिकारों को लेकर भी सचेत रहेगी और बिना वजह अंगुली करने से बाज आएगी.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-5611005004025272709?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/12/blog-post_11.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>8</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-525176143412742891</guid><pubDate>Fri, 05 Dec 2008 08:00:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-05T00:10:01.816-08:00</atom:updated><title>सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी ऐय्याशियाँ....</title><description>&lt;p&gt;बीते दिनों देश ने बड़े वीभत्स दृश्य देखे,ह्रदय को चीर देने वाली चीखें और गुहार सुनीं,जो एक असामान्य बात थी (जो कि अब सामान्य बात हो चुकी है) और उसके बाद एक बेहद सामान्य प्रक्रिया हुई (जो कि इस सरकार में अब तक असामान्य थी),इस्तीफों का दौर शुरू हुआ,बड़े-बड़े नपे या नापे गए।पर समस्या यह है कि जिन तथाकथित नैतिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए इस्तीफे दिए गए उनको कितना नैतिक माना जाए?     &lt;/p&gt;&lt;p&gt;    क्या देश,पूर्व गृहमंत्री शिवराज पाटिल को इतना काबिल मानता है कि उनके इस्तीफे को सम्मान की निगाह से देखे और उनकी कर्तव्य-परायणता की गाथा गढे?....शायद नहीं,बिल्कुल नहीं....बल्कि यह हास्यास्पद ही है कि एक ऐसा व्यक्ति नैतिक इस्तीफा देता है जिसे नैतिक जिम्मेदारियों का ककहरा तक नहीं पता,उसे पता है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी ऐय्याशियाँ....       नैतिक इस्तीफा देना एक बड़ी घटना होती है जिसका मतलब होता है कि आपने प्राणपण से कोशिश की पर कीन्ही कारणों से आप असफल रहे या फ़िर किसी घटना ने आपको नैतिक रूप से झकझोर दिया हो।पर इनमें से कोई भी शर्त शिवराज पाटिल पर लागू नहीं होती,ये बात कोई भी भारतीय दावे से कह सकता है.बल्कि उन्होंने तो उस बेहद सम्मानीय और स्वस्थ परम्परा की धज्जियाँ उडायीं जिसकी शुरुआत "लाल बहादुर शास्त्री" (रेल मंत्री के रूप में) जैसे महान लोगों ने की थी.ऐसे में इन इस्तीफों का क्या करें?      बात असल अभी भी ज्यों की त्यों है,अभी भी पकिस्तान आतंकियों को बेरोक टोक पैदा करता जा रहा है,सुरक्षा तंत्र की स्थति किसी से छिपी नही है(जवानो की वीरता पर किसी को शक नही,पर तंत्र...),ऐसे में आज जो मुम्बई में हुआ कल कहीं और होगा,इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.तो क्या हम हाँथ पर हाँथ धरे बैठे रहे और इन्तजार करें अगली ऐसी ही किसी घटना का?क्या किसी बड़ी घटना की प्रतिक्रिया में कुछ नामुराद इस्तीफे ही काफ़ी हैं?       &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसका जवाब राजनेताओं को ढूँढना था,जो की हो चुका.   &lt;/p&gt;&lt;p&gt;  अब वक्त है &lt;em&gt;यह सोचने का कि इन राजनेताओं का क्या करें,और यह काम जनता को करना है...&lt;/em&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt; &lt;strong&gt;आलोक&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt; सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-525176143412742891?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/12/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-7473269796481266804</guid><pubDate>Sat, 29 Nov 2008 07:59:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-11-29T00:17:45.916-08:00</atom:updated><title>कहाँ है राज ठाकरे और उसकी बहादुर सेना...</title><description>कल रात १२ बजे करीब मेरा मोबाईल एकाएक घनघना उठा,मैं कुछ काम कर रहा था,खैर,देखा एक मैसेज आया था.भेजने वाला एक ऐसा लड़का था जो मेरे छोटे भाई की तरह है.मैं उसे एक बच्चे की तरह ही मानता और समझता रहा हूँ,जो शरीर से तो बड़ा है पर उसकी सोच बच्चों वाली है.मैंने मैसेज पढ़ा,चौंक गया.अरे,ये क्या मैसेज भेजा है इसने?इतना बड़ा हो गया है अंशु?.......     मैसेज था- &lt;strong&gt;"where is raj thackaray n his 'brave' sena?tel him dat 200 NSG commondos 4m Delhi(no marathi manoos! all south &amp;amp;north indians) hv been sent 2 mumbai to fite t terrorists so dat he can sleep peacefully..pls fwd ths so tht it finally reaches t coward bully!tel him nt 2 destroy my country's sovergnity...."   &lt;/strong&gt;  (कहाँ है राज ठाकरे और उसकी 'बहादुर'सेना ? उनसे कह दीजिये कि दिल्ली से २०० एनएसजी कमांडो आतंकियों से लड़ने मुम्बई भेजे गए हैं ताकि वह चैन की नींद सो सके...  कृपया इस संदेश को फारवर्ड करें ताकि यह अंततः उस (राज ठाकरे)नपुंसक! के पास पहुँच जाए.उनसे कह दीजिये कि मेरे देश की संप्रभुता और अखंडता को नष्ट न करे....)                    मैं हतप्रभ था मैसेज पढ़कर,नहीं की किसी ने बहुत बड़ी बात की थी,पर की,इस घटना को एक बच्चा भी इस रूप में देख सकता है.       महाराष्ट्र में उत्तर भारतियों पर हमले और मुम्बई में हुई आतंकी घटना,दोनों दो बिल्कुल अलग बातें हैं.किसी भी रूप में दोनों की तुलना नहीं की जा सकती (शिवाय इसके की दोनों ही घटनाएं सरकार और प्रशासन नामक संस्था को आइना दिखाती हैं),पर आम जनता कैसे इन दोनों घटनाओं में सम्बन्ध स्थापित कर नई बातें और नई सीख पैदा कर लेती है,विस्मयकारी है.  दुखद है तथाकथित हमारे नेता आम जनता की श्रेणी में नहीं आते,वरना शायद इस संदेश की जरुरत ही नहीं पड़ती.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-7473269796481266804?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/11/blog-post_8746.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-5117549153798430868</guid><pubDate>Sat, 29 Nov 2008 07:59:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-11-29T00:17:44.047-08:00</atom:updated><title>कहाँ है राज ठाकरे और उसकी बहादुर सेना...</title><description>कल रात १२ बजे करीब मेरा मोबाईल एकाएक घनघना उठा,मैं कुछ काम कर रहा था,खैर,देखा एक मैसेज आया था.भेजने वाला एक ऐसा लड़का था जो मेरे छोटे भाई की तरह है.मैं उसे एक बच्चे की तरह ही मानता और समझता रहा हूँ,जो शरीर से तो बड़ा है पर उसकी सोच बच्चों वाली है.मैंने मैसेज पढ़ा,चौंक गया.अरे,ये क्या मैसेज भेजा है इसने?इतना बड़ा हो गया है अंशु?.......     मैसेज था- &lt;strong&gt;"where is raj thackaray n his 'brave' sena?tel him dat 200 NSG commondos 4m Delhi(no marathi manoos! all south &amp;amp;north indians) hv been sent 2 mumbai to fite t terrorists so dat he can sleep peacefully..pls fwd ths so tht it finally reaches t coward bully!tel him nt 2 destroy my country's sovergnity...."   &lt;/strong&gt;  (कहाँ है राज ठाकरे और उसकी 'बहादुर'सेना ? उनसे कह दीजिये कि दिल्ली से २०० एनएसजी कमांडो आतंकियों से लड़ने मुम्बई भेजे गए हैं ताकि वह चैन की नींद सो सके...  कृपया इस संदेश को फारवर्ड करें ताकि यह अंततः उस (राज ठाकरे)नपुंसक! के पास पहुँच जाए.उनसे कह दीजिये कि मेरे देश की संप्रभुता और अखंडता को नष्ट न करे....)                    मैं हतप्रभ था मैसेज पढ़कर,नहीं की किसी ने बहुत बड़ी बात की थी,पर की,इस घटना को एक बच्चा भी इस रूप में देख सकता है.       महाराष्ट्र में उत्तर भारतियों पर हमले और मुम्बई में हुई आतंकी घटना,दोनों दो बिल्कुल अलग बातें हैं.किसी भी रूप में दोनों की तुलना नहीं की जा सकती (शिवाय इसके की दोनों ही घटनाएं सरकार और प्रशासन नामक संस्था को आइना दिखाती हैं),पर आम जनता कैसे इन दोनों घटनाओं में सम्बन्ध स्थापित कर नई बातें और नई सीख पैदा कर लेती है,विस्मयकारी है.  दुखद है तथाकथित हमारे नेता आम जनता की श्रेणी में नहीं आते,वरना शायद इस संदेश की जरुरत ही नहीं पड़ती.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-5117549153798430868?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/11/blog-post_28.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>8</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-4800551695625554295</guid><pubDate>Wed, 19 Nov 2008 14:09:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-11-19T06:23:11.793-08:00</atom:updated><title>राजनीतिक नपुंसकता......चार चाँद लगाती रहेगी..?</title><description>डान फ़िल्म देखी है आपने?अरे वही जिसमें छोरा गंगा किनारे वाला बनारसी पान चबाते हुए बम्बई पहुँचता है और उसके कसीदे पढ़ते हुए गाता है 'ई है बम्बई नगरिया तू देख बबुआ'.जी हाँ,तब मुम्बई,बम्बई हुआ करती थी,उन्ही दिनों इडली,साम्भर,डोसा की बदबू से परेशान बम्बई का एक भूमिपुत्र हांथों में "छड़ी" लेकर पैदा हुआ और तमाम लुन्गीवालों को दक्षिण का रास्ता दिखा ताकि उसे वहां की राजनीति में एक रास्ता मिल जाए,मिला भी और वह छड़ी के बल पर ही किंगमेकर बन बैठा.तब बम्बई विकास के पहियों पर बहुत तेजी से दौड़ रही थी,बहुत विकास हुआ,इतना कि बम्बई,वर्णक्रम में दो कदम आगे बढ़कर 'ब' से 'म' पर आ गई और मुम्बई हो गई.           अब वो "छड़ी" पुरानी हो गई थी,बिल्कुल घिसी हुई और कमजोर.तब उसे दरकार थी एक और नई छड़ी की पर उसे सँभालने के लिए नए,मजबूत हाँथ भी चाहिए थे.तब पुत्रमोह और बंटवारों के बीच वो "छड़ी" उसी भूमिपुत्र के भतीजे ने उठा ली,फर्क और भी आया,तब रुख दक्षिण का था अब उत्तर का.         अब कहानी से आगे बढ़कर आज के मुद्दे पर आते हैं.आज राज ठाकरे(वही भतीजा) जैसा २००(सक्रिय) कार्यकर्ताओं की पार्टी चलाने वाला बन्दा मुम्बई से उत्तर भारतीयों को खदेड़ने पर अमादा है.कारण इसबार भी वही राजनीतिक हैसियत बना पाने की जद्दोजहद.इसके चलते देशभर में क्षेत्रीयता की आग लपटें लेने लगी,भाषा और क्षेत्र आधारित राजनीति सर उठाने लगी है.      क्षेत्रीयता का जो राजनीतिक सबक मुम्बई से चल पड़ा है वह सरेआम उस लोकतंत्र की ऐसी तैसी कर रहा है,जिसके बूते आजादी के वक्त सरदार पटेल ने क्षेत्रीयता और बिखराव के तमाम रुझानों को नाकाम किया था. जब सरदार पटेल ने साढे पाँच सौ सूबों में बँटे हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरोने का काम शुरू किया तो तीन रियासतों से विरोध हुआ जिनमें एक जूनागढ़ भी था जो उन्ही के गृह प्रदेश गुजरात का हिस्सा था.जब वहां का निजाम साम दाम से नहीं माना तो उन्होंने सैनिक कार्रवाई से जूनागढ़ को गुजरात का अभिन्न हिस्सा बना दिया. अगर इस किस्से/घटना को ध्यान रखें तो यह सोचना बिल्कुल ग़लत है कि अगर केन्द्र सरकार चाहे तो भी इस क्षेत्रीयता की लपटों को शांत नहीं कर सकती.विडम्बना है कि आज देश का गृह मंत्री उसी महाराष्ट्र से आता है जहाँ क्षेत्रीयता की राजनीति चरम पर है.उस राज्य में सरकार भी उसी पार्टी की है जो केन्द्र में बैठी है,पर फ़िर भी कोई कुछ कहने को तैयार नहीं........अधिक दुखद/हास्यास्पद यह है कि आज जबकि सारा विश्व आर्थिक मंदी से जूझ रहा है वहीँ हमारा देश भाषा और क्षेत्रीयता की क्षुद्र राजनीति में व्यस्त है जिसे तक़रीबन दो दशक पहले दबा दिया गया था.सवाल यह कि,आख़िर कब तक इच्छाशक्ति की कमी से उपजी राजनीतिक नपुंसकता राजनेताओं की हैसियत में चार चाँद लगाती रहेगी,जाने कब तक?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-4800551695625554295?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/11/blog-post_19.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-7172022400025092076</guid><pubDate>Mon, 03 Nov 2008 05:11:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-11-02T21:15:52.130-08:00</atom:updated><title>नसीरुद्दीन शाह, तालियाँ,कैमरों के फ्लैश और लोगों का हुजूम</title><description>जामिया मिल्लिया इस्लामिया का अंसारी ऑडिटोरियम दर्शकों से खचाखच भरा था,तमाम छोटे बड़े लोग आपनी-अपनी सीटों पर काबिज थे,कुछ, जिनको सीटें मयस्सर नहीं हो सकीं तो सीटों के नीचे कालीन पर ही बैठ लिए,बाकी कुछ जगह जहाँ कहीं बची थी उसे कैमरा वालों और खबरचियों ने भर रखा था.एक कौतूहल सा भर गया था पूरे वातावरण में.इसी बीच मंच पर हलकी सी कुछ सरसराहट हुई,क्षणेक के लिए व्याप्त सन्नाटे के बाद एकाएक पूरा ऑडिटोरियम शोर,तालियों और कैमरे के फ्लैश से भर उठा.मंच पर एक बेहद परिचित और संजीदा सा लगने वाला&lt;em&gt; आदमकद&lt;/em&gt; आ चुका था,जिसके दोनों हाँथ बार बार लबों पर जाकर दर्शकों की तरफ़ फ्लाईंग किस उछालने में व्यस्त थे.तबतक पीछे बैठे किसी ने जोर से गला फाडा&lt;em&gt;,"नसीर भाई,सलाम वालेकुम",&lt;/em&gt;शायद आवाज उनतक पहुँच नहीं सकी होगी,क्योंकि वे जवाब देने की बजाय मंच पर रखे सोफे पर पसर चुके थे.   मंच पर पहले से मौजूद एक प्रस्तोता ने मिसेज किदवई को आवाज लगायी कि वे आयें और &lt;em&gt;'नसीरुद्दीन शाह'&lt;/em&gt; साहब का परिचय कराएं जिनके परिचय की जरुरत इस तीसरी दुनिया में तो कम से कम नहीं ही है.खैर,कुछ एक बेहद भारतीय सरीखे औपचारिकताओं के बाद नसीर साहब कमर कस चुके थे,क्योंकि आज उन्हें वहां दर्शकों से सीधे मुखातिब होकर उनकी तमाम जिज्ञासाओं को शांत करना था.इस मौके पर उन्होंने निजी जिंदगी से लगाये फिल्मों,थियेटर और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर जवाब दिए.उन्होंने कहा कि मैं मूलतः थियेटर का इन्सान नहीं हूँ पर मेरी पहली पसंद वही है क्योंकि इसमें सीधे दर्शकों से संवाद करने का मौका मिलता है(हालाँकि ऐसे,मुझे लोगों को फेस करने में असुविधा होती है).एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहाकि आजकल के नए निर्देशकों में काफ़ी क्षमता है और वे सामाजिक सरोकारों वाली फिल्में भी बना रहे हैं.बेशक,७० के दशक में भी सामाजिक सरोकारों वाली फिल्में बनीं लेकिन वे मास्टर पीस कत्तई नहीं थी.चूँकि उस समय के निर्माताओं में आलोचना सहने की क्षमता नहीं होती थी इसीलिए तथाकथित समांतर सिनेमा का अवसान हो गया.जबकि आजकल के निर्माताओं में प्रयोग करने का साहस और आलोचना सहने की क्षमता भी है.यही वजह है कि आज भारतीय सिनेमा फ़कत नाच गाने वाला एक ड्रामा नहीं रहा गया है बल्कि बाहर वाले भी इसे गंभीरता से लेने लगे हैं.     जब एक छात्र ने फंडामेंटलिज्म की बात छेड़ी तो उनका कहना था  फंडामेंटलिज्म वे लोग हैं जिनके पास अपने ख़ुद के विचार नहीं हैं.साथ ही उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि आज जरुरत इस बात की है कि इस्लाम को जानने के लिए कुरान को न सिर्फ़ पढ़ा जाए बल्कि सही तरीके से समझा जाए और इसके ग़लत इंटरप्रीटेसन से भी बचा जाए. जैसे जैसे नसीर साहब सवालों का जवाब देते गए लोगों में सवाल पूछने के लिए होड़ मचने लगी.ऑडिटोरियम में बैठे सभी के पास कुछ न कुछ पूछने के लिए था.पर वक्त की कमी ने इस सिलसिले को थमने पर मजबूर कर दिया.फ़िर आने का वादा कर नसीर साहब ने रुखसत ली और जाते जाते एक बार फ़िर दर्शकों की तरफ़ फ्लाईंग किस उछालकर उनके प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया.इस तरह जामिया मिल्लिया इस्लामिया और वहां उपस्थित लोगों के लिए वह दिन एक &lt;em&gt;तारीख&lt;/em&gt; बन गया.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-7172022400025092076?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/11/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>12</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-7499359012445130612</guid><pubDate>Sat, 27 Sep 2008 14:49:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-09-27T21:59:52.392-07:00</atom:updated><title>जो कागज़ के फूल सजे हों....</title><description>14 सितम्बर हमारे देश में हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है.हरसाल की तरह इस साल भी हिन्दी दिवस आया और आकर चला गया.हरसाल की तरह इस बार भी हिन्दी का जन्म दिवस बड़ी धूम धाम से मना,मसलन,हिन्दी में काम को बढावा देने वाली खोखली घोषनाएँ,भिन्न भिन्न तरह के सम्मलेन,आयोजन वगैरह वगैरह.पर असल सवाल इसबार भी अनसुलझा रह गया कि क्या यह गुजरा साल हिन्दी के इतिहास में एक साल और जोड़ गया या उसकी उम्र से एक साल कम कर गया।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;           आज&lt;/span&gt; से लगभग ६ दशक पहले १४ सितम्बर को जब हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया तब राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने बड़े दिल से यह घोषणा की थी-&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                 &lt;em&gt;है&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;em&gt; भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी, &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;                हिन्दी&lt;/span&gt; हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी.&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;           पर&lt;/span&gt; आज भी ये घोषणा साकार रूप लेने की बाट जोह रहा है.हमेशा से ही हिन्दी हमारे बोलचाल और संपर्क की भाषा रही है पर आज के समय में हिन्दी केवल उन लोगों की भाषा बनकर रह गई है जिन्हें या तो अंग्रेजी आती नहीं या फ़िर हिन्दी से कुछ ज्यादा ही लगाव है,ये वही लोग हैं जिन्हें पिछड़ा और सिरफिरा जैसे नाम दिए जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;          आज&lt;/span&gt; जब हमारा देश हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है,ऐसे में हमारी हिन्दी राजभाषा से राष्ट्रभाषा के सफर में कहाँ पिछड़ गई?क्या कुछ कमी रह गई इसके विकास में? आज दुनिया में जहाँ सभी विकसित और विकासशील देश अपनी भाषाओँ में काम करके दिनोंदिन प्रगति कर रहे हैं वहीँ हमारे देश में हिन्दी में काम करने से ही गुरेज किया जाता है,अधिकांश उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षण का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही है.ऐसे में ज्यादा कुछ अच्छा उम्मीद करना ही बेमानी है.आज हिन्दी मिडिया के प्रसार ने काफ़ी हद तक लोगों को हिन्दी तक पहुँचने में अहम् भूमिका निभाई है इसी तरह अगर प्रशासनिक स्तर के कार्य भी हिन्दी में होते तो शायद सरकारें,आमजनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह होतीं.पर.......&lt;br /&gt;           एक बड़ी अजीब बात है कि हमारे देश के संविधान का प्रारूप ही अंग्रेजी में बना,संविधान सभा की बहस का अधिकांश हिस्सा भी अंग्रेजी में ही प्रकाशित हुआ,यहाँ तक कि हिन्दी के प्रबल पक्षधर भी अंग्रेजी में ही बरसे.शायद यही कारण है कि आजादी के ६१ सालों बाद भी भारत का विधितंत्र अंग्रेजी और उर्दू में ही चलता है.यहाँ तक कि देश के उच्चतम और उच्च न्यायालयों का सारा काम सारा अंग्रेजी में ही होता है ऐसे में आमजनता कानूनी दांवपेंचों से वाकिफ नहीं हो पाती और कानून के दलदल में फंसती जाती है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;           अंग्रेजी&lt;/span&gt; के कारण हमारा बहुत नुकसान हुआ तो उम्मीद से कहीं ज्यादा लाभ भी मिला इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि देश में हिन्दी का पठन पाठन ही बंद कर दिया जाए,उससे नफरत किया जाए,बल्कि उसे उतना ही महत्व दिया जाए कि हमारी हिन्दी भी बची रहे.आज जब पश्चिम के देशों में भी हिन्दी का डंका बज रहा है,यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को सातवीं भाषा के रूप में मान्यता देने की कवायद भी चल रही है,ऐसे में अपने ही देश में हिन्दी की उपेक्षा देखकर एक शेर याद आता है-&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                  &lt;em&gt;सच&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;em&gt; पूछो तो यूँ लगती है हिन्दी हिंदुस्तान में,&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;                  कागज के फूल सजे हों शीशे के गुलदान में.&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-7499359012445130612?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/09/blog-post_27.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>10</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-5375147220131980296</guid><pubDate>Fri, 26 Sep 2008 05:13:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-09-25T22:19:44.404-07:00</atom:updated><title>इस्लामी आतंकवाद....अधिक खतरनाक कौन?</title><description>&lt;span class=""&gt;       आज&lt;/span&gt; जहाँ एक तरफ़ इस्लामी आतंकवाद ने देश को झकझोर कर रखा हुआ है वहीँ दूसरी तरफ़ एक अन्य तरह का आतंकवाद भी अपने लिए एक खास तरह की जमीन तैयार करने में लगा हुआ है।यह अलग बात है कि अभी तक इस नए तरह के आतंकवाद को आधिकारिक तौर पर आतंकवाद का टैग नहीं मिला है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;      जिस&lt;/span&gt; तरह इस्लामी आतंकवाद ने देश में असुरक्षा और दहशत का माहौल पैदा कर रखा है,उसी तरह इस नए वाले ने भी देश में रहने वाले एक खास संप्रदाय/धर्म के लोगों को खौफजदा कर रखा है,पहला वाला भी एक धर्म की आड़ में चलाया जा रहा है,तो दूसरे के मूल में भी कहीं न कहीं धर्म ही है।थोड़ा फर्क है दोनों में तो यह कि पहला वाला अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा किया जा रहा है तो दूसरा बहुसंख्यकों द्वारा,पहले वाले में आतंक फैलाने वाला संप्रदाय ख़ुद ही सकते में है तो दूसरे वाले में आतंक के शिकार संप्रदाय के लोग।       &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;           अब&lt;/span&gt; अगर नियम कानून,समाजशास्त्र आदि की बात करें तो आतंकवाद के सन्दर्भ में यह बात बहुत अजीब नहीं लगती कि एक अल्पसंख्यक समुदाय के लोग इसमें शामिल हों क्योंकि हो सकता है बहुसंख्यक नीत नीतियों ने किसी रूप में उनके साथ ज्यादती की हो या उनकी भावनाएं आहत हुई हों,ऐसा सम्भव है(जरुरी नहीं कि ऐसा ही होना चाहिए),शायद यही आतंकवाद को जन्म देने वाले कारक हैं,पर जब बहुसंख्यक समुदाय के लोग ऐसा करने लग जायें तो समझ नहीं आता कि क्या कारण हो सकता है,या कैसे इनसे बचा जाए?          &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;      अगर&lt;/span&gt; बात समझ नहीं आई तो पिछले कुछ समय से इसाई संप्रदाय के लोगो और उनके आस्था के केन्द्र चर्चों पर होने वाले लगता हमलों को जेहन में लाईये।अरे,दूर कहाँ जा रहे हैं,यहीं उडीसा,कर्नाटका वगैरह कहीं भी चले जाईये. &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आखिरी सवाल-&lt;/strong&gt; &lt;em&gt;अब आखिरी सवाल यह है कि अधिक खतरनाक कौन,जिसे नाम दे दिया गया है वो या जो अभी भी बेनाम है?और क्या दूसरे वाले को भी एक नाम की दरकार है?&lt;/em&gt;&lt;strong&gt; &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-5375147220131980296?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/09/blog-post_25.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>22</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-898711241375765271</guid><pubDate>Fri, 19 Sep 2008 06:57:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-09-19T00:01:55.066-07:00</atom:updated><title>मुठभेड़ चल रही,दो मारे गए,एक गिरफ्तार</title><description>दिल्ली में हुए हालिया बम धमाके, दिल्ली पुलिस समेत केन्द्रीय सत्ता तक के लिए सरदर्द बने हुए थे,कपड़े बदलने और विभिन्न तरह की लापरवाही के चलते भी गृहमंत्री शिवराज पाटिल की खासी किरकिरी हो रही थी,इन सबसे परे उधर दिल्ली पुलिस अपने अब तक के सबसे बड़े सरदर्द से गुजर रही थी और अपने दामन पर और कोई भी छींटा नहीं आने देना चाहती थी यही कारण था कि घटना के तकरीबन दो दिन बाद जाकर संदिग्धों का स्केच जारी किया गया जो अमूमन घटना के तत्काल बाद कर दिया जाता है,और जारी किए गए स्केच की खास बात यह रही की वह स्केच न होकर होकर पूरा का पूरा फोटो ही था जो विभिन्न कलाकारों की मदद से बनवाया गया था।था,जो चीख चीख कर कह रहे थे कि इसबार दिल्ली पुलिस के इरादे क्या हैं,वे कोई भी रिश्क नहीं लेना चाहते थे,इसीलिए हरकाम बहुत सफाई के साथ किया ।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;          आखिरकार&lt;/span&gt; दिल्ली पुलिस की मेहनत रंग लायी और जोरदार/मुकम्मल मुखबिरी ने पहुँचा दिया दिल्ली पुलिस को आतंकियों की गिरेबान तक।कई दिनों से चल रही खोजबीन और निशानदेही के परिणाम स्वरुप जब पुलिस को पता चला कि आतंकी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के बगल/पीछे जामिया नगर और बाटला हाउस इलाकों में छिपे हैं तो बेहद व्यस्थित तरीके से पूरी तयारी केसाथ आज सुबह ११ बजे पुलिस ने बाटला हाउस पर धावा बोला,दिल्ली पुलिस का साथ देने के लिए एन एस जी कि टीम भी पहुँच चुकी है। अभी तक इन धमाकों के तथाकथित मास्टर माईंड तौकीर का दाहिना हाँथ कहा जाने वाला अतीक तथा एक और आतंकी सैफ ढेर किए जा चुके हैं। जबकि जामिया नगर के खलीला मस्जिद के पास स्थित मकान नम्बर एल-१८ में छिपे आतंकियों से पुलिस की मुठभेड़ जारी है,एक अन्य सफलता के तौर पर एक आतंकी की गिरफ्तारी भी हो गई है।उम्मीद कि जा सकती है पूर्व कि घटनाओं से सबक लेते हुए दिल्ली पुलिस ने जो मेहनत कि है वो अंजाम तक जायेगी.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-898711241375765271?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/09/blog-post_18.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>8</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-1301770407505701012</guid><pubDate>Sat, 13 Sep 2008 14:31:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-09-13T07:41:25.043-07:00</atom:updated><title>धमाकों ने फ़िर किया बेहाल</title><description>धमाकों ने फ़िर दहलाया दिल्ली को।दिल्ली के ३ पाश जगहों पर हुए एक के बाद एक ५ धमाके।ढेरों घायल। एकबार फ़िर आतंकवादियों ने अपने नापाक मंसूबों को अंजाम दे दिया और दहल उठा हमारा देश।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;    आज&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; शनिवार का दिन है,वीकेन्ड का पहला दिन।हफ्ते भर के काम काम के बोझ से थके लोगों के लिए राहत की साँस लेने का दिन।हफ्ते भर की भागमभाग से उबरकर मस्ती करने का दिन।वो दिन जब लोग अपने घरों से बाहर निकलकर सपरिवार घूमने-फिरने और मार्केटिंग करने का प्लान बनाते हैं,पर शायद इस देश के दुश्मनों को हमारा सुकून रास नहीं आता।अभी पिछले दिनों पूरे देश के विभिन्न जगहों पर हुए धमाकों के चोट से लोग उबर भी नहीं पाए थे कि इन नामुरादों कर डाला एकबार फ़िर धमाका और इस बार निशाने पर थे राजधानी दिल्ली के वो खास जगह जहाँ छुट्टी के दिनों में खासी भीड़ रहती है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;    ये&lt;/span&gt; जगह हैं&lt;br /&gt;१।करोल बाग का गफ्फार मार्केट&lt;br /&gt;२।ग्रेटर कैलाश-१ का एम् ब्लाक&lt;br /&gt;३।कनाट प्लेस के पास बारहखम्बा रोड और सेन्ट्रल पार्क।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;      अभी&lt;/span&gt; तक पुष्ट तौर पर किसी के हताहत होने की सूचना तो नही मिली है लेकिन कम से कम १० से अधिक लोगों के मारे जाने की आशंका है.पहला धमाका करोल बाग़ के गफ्फार मार्केट में हुआ जहाँ एक ऑटो के सीएनजी सिलिंडर फटने से धमाका हुआ.आशंका जताई जा रही थी कि शायद सिलिंडर फटने से मामूली विस्फोट हुआ हो,तभी ग्रेटर कैलाश-१ में धमाका हो गया,लोग कुछ समझ पाते तबतक अगला धमाका बारहखम्बा रोड पर गोपाल दास बिल्डिंग के पास हो चुका था.पुलिस मौके पर पहुँची घायलों को अस्पतालों तक ले जाने की कवायद में लगी ही हुई थी कि कनाट प्लेस के सेन्ट्रल पार्क और ग्रेटर कैलाश में धमाके हो गए।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;         ध्यान&lt;/span&gt; रहे कि कनाट प्लेस पर जहाँ धमाका हुआ वह मेट्रो स्टेसन के बिल्कुल करीब की जगह है,इससे यह साफ़ हो जाता है कि धामको का मकसद कितना भयानक था अभी पूरा पुलिस विभाग घायलों को अस्पतालों तक पहुँचने में लगा है.दुआ की जा सकती है कि अब धमाकों का सिलसिला कम से कम आज तक के लिए थम जाए ताकि घायलों को उपचार के लिए अस्पतालों तक पहुँचाया जा सके. &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;       तक&lt;/span&gt; यह बात पता नहीं लग पाई है कि इस सीरियल ब्लास्ट का जिम्मेदार कौन है, पर इतने सालों के अनुभवों का ख्याल रखते हुए अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल काम नहीं.असल मुश्किल है उन नामुरादों को समझाना कि इंसानी खून बहाकर लोगो में दहशत पैदा कर के कोई भी खुशी हासिल नहीं की जा सकती.काश! कि उन्हें समझ आ जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-1301770407505701012?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/09/blog-post_13.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-27175109351946520</guid><pubDate>Fri, 12 Sep 2008 14:12:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-09-12T07:17:25.269-07:00</atom:updated><title>१४४० मिनट....११३२ शिलाएं!!</title><description>दुनिया बहुत ही रंग-बिरंगी है।कब कहा क्या देखने सुनने को मिल जाए अंदाजा लगा पाना बहुत मुश्किल।ऐसा ही कुछ गुजरा आज मध्य प्रदेश के सागर के रहेली में,जहाँ के विधायक गोपाल भार्गव ने कर डाले एक ही साथ(एक ही दिन में,महज ८६४०० सेकेंड्स या यूँ कहें १४४० मिनटों में) ११३२ परियोजनाओं के शिलान्यास।मान्यवर भार्गव हाल फिलहाल एम।पी। के कृषि मंत्री हैं,साथ ही अन्य दो विभागों की जिम्मेदारी भी उनके मजबूत कन्धों पर है.            बात करें अतीत की तो, भार्गव साहब, सन १९८५ से ही रहेली से विधायक बनते आ रहे हैं पर आज भी वहां सड़क,स्कूल,अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं का खासा अभाव है,आज तक जब कुछ नही हुआ तो फ़िर क्या जरुरत आन पड़ी कि उन्होंने एक ही दिन में इतने सारे शिलान्यास कर डाले?            मुद्दा,या फ़िर बात यह नहीं कि महज एक दिन में किए गए इतने परियोजनाओं के लिए आवंटित फकत २०० करोड़ रुपयों से क्या कुछ हो पायेगा,बात दरअसल यह है कि जो काम आज तक नही कर पाये वो अभी यकायक इतनी जल्दबाजी में क्यों?कहीं ये कोई सियासी मज़बूरी तो नही?               जी हाँ,आपको याद दिला दें कि आने वाले नवम्बर महीने में वहाँ विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं.तो,अगर उन्होंने सारे शिलान्यास नहीं किए तो फ़िर चुनाव आचार संहिता आड़े आ जायेगी.समस्या फ़िर भी यथावत कि विधायक तो पिछले पौने पॉँच सालों से हैं फ़िर अभी क्यों?               यह जानने के लिए जरुरत है इस मामले को एक नौटंकी से परे हटकर देखने की.ऐसा करने पर हम पाएंगे कि इन सबके पीछे कहीं न कहीं हम भारतीय ख़ुद ही जिम्मेदार हैं.चौंकिए मत!          एक सवाल का जवाब दीजिये, सब आसान हो जाएगा.आज तक के भारतीय इतिहास में एक-आध अपवाद घटनाओं(दुर्घटनाओ) को छोड़ दें तो कौन सा ऐसा चुनाव है जो विकास कार्यों के नाम पर जीता गया? आज की तारीख में कौन सा ऐसा नेता है जो फकत विकास कार्यों के नाम पर चुनाव जितने का माद्दा रखता है?   जवाब- शायद,शायद क्या,कोई नहीं.           अब कारण क्या है?अन्य देशों में तो ऐसा होता है फ़िर हमारे यहाँ क्यों नहीं?दरअसल, हम भारतीयों की याददाश्त बहुत ही कमजोर होती है,हमें बड़ी से बड़ी घटनाओं को भुला देने के लिए चंद हफ्ते या महीने ही काफ़ी होते हैं.ऐसे में कोई भी राजनीतिक शख्स जब कोई अच्छा कम तभी करता है जब चुनावी तौर पर कोई फायदा होने वाला हो.           पर एक समस्या अब भी बची रह गई,की ठीक है काम करना था तो करते पर इतने सारे की क्या जरुरत थी?         साधारण सी बात है.क्या आपको लगता है,सिर्फ़ २०० करोड़ रुपयों और फकत २ महीनो में सारे काम पूरे हो जायेंगे?अगर ऐसा लगता है तो माफ़ कीजियेगा पर आपको बहुत ग़लत लगता है.             बात यह है कि,भार्गव साहब को पता है चुनाव होने तक में कोई भी परियोजना पूरी नहीं हो पाने वाली फ़िर फायदा क्या,तो उन्होंने उठा लिया एक ऐतिहासिक कदम.लोग काम के लिए न सही कम से कम इतनी बड़ी घटना के रूप में तो याद रखेंगे ही,और इतना काफ़ी है उनकी चुनावी नैया पार हो जाने के लिए.और चाहिए भी क्या?          भगवान,उनकी इस नेक कामना को पूर्ण करे.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-27175109351946520?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/09/blog-post_12.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-7158663585965160360</guid><pubDate>Wed, 03 Sep 2008 04:39:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-09-02T21:48:41.933-07:00</atom:updated><title>लालू का तमाशा:धूमिल हुई बाढ़ पीडितों की आशा</title><description>&lt;strong&gt;लालू का तमाशा:धूमिल हुई बाढ़ पीडितों की आशा&lt;/strong&gt;   &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;             आज&lt;/span&gt; बाढ़ ने बिहार को बुरी तरह झकझोर कर रखा हुआ है।16 जिलों के 20 लाख से अधिक लोग सीधे तौर पर बाढ़ की चपेट में हैं,20 हजार से अधिक लोग लापता है,ढाई लाख एकड़ से अधिक की कृषि भूमि खाक हो चुकी है,राहत कैम्पों की हालत खस्ता है,लोग पत्ते खाकर जहरीले जानवरों के बीच जिंदगी को सहेज पाने की जद्दोजहद कर रहे हैं,और इस बीच वहां पैदा हो रहे बच्चे और उनकी माएं मूलभूत जरूरतों से भी महरूम हैं।       &lt;br /&gt;        ऐसे हालात में,सेना और नौसेना के जवान प्राणपण से लोगों को बचाने में लगे हुए हैं,सीआरपीऍफ़ के जवान एक दिन की तनख्वाह दे रहे हैं,सार्वजनिक क्षेत्र की 12 कम्पनियाँ 30 करोड़ दे रही हैं,पंजाब,हरियाणा से लगाए देश के कोने कोने से सहायत मिल रही है,यहाँ तक कि सरहद के पार से भी मदद के लिए हाँथ आगे आ रहे हैं।          &lt;br /&gt;          ऐसे में बिहार के अपने खासमखास,&lt;em&gt;अपने राजनीतिक गोलगप्पे में बाढ़ का चटपटा पानी भरकर बेचने में लगे हुए हैं।           &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;    कहते&lt;/span&gt; हैं,&lt;em&gt;राजनीति जो न कराये कम है।&lt;/em&gt;             &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                एक&lt;/span&gt; तरफ़ जहाँ बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव,राहत कार्यों में देरी को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर दोषारोपण कर रहे हैं,वहीँ नीतीश कुमार,लालू पर बाढ़ की राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं.नेताओं के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं.पर,नैतिकता की पराकाष्ठा तो तब पार हो गई जब &lt;strong&gt;&lt;em&gt;बाढ़-ग्रस्त बिहार के दौरे पर गए  लालू यादव ने लग्जरी गाड़ी में बैठकर भूखे-नंगे बच्चों को 500 का नोट थमाकर लालू जिंदाबाद के नारे लगवाए।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;इसे क्या क्या कहा जा सकता है?      &lt;br /&gt;         सच पूछिये तो,बाढ़ पीडितो के दर्द को यूँ तमाशा  का रूप देना लालू जैसे बड़े नेताओं के बस की ही बात है.पर सवाल असल यह है कि वहां की जनता आस लगाये तो किससे,जब उनके अपने ही उनके ग़मों का माखौल उड़ाने पर अमादा हैं?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-7158663585965160360?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/09/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-3396121186575044956</guid><pubDate>Tue, 26 Aug 2008 14:10:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-26T07:32:54.901-07:00</atom:updated><title>खेल अंगुली करने का...</title><description>कुछ हफ्तों पहले जब मैंने "सियासत के कुत्ते" लिखा था तो तमाम दोस्तों ने निजी तौर पर शिकायत की कि यार,लिखा तो मजेदार है पर बहुत छोटे में लिखा,तो मैंने झट से जवाब दिया,ऐसी कोई बात नहीं है,मैं इसकी सीरिज बनाना चाहता हूँ और बहुत जल्द इसके अगले अंक के साथ आऊंगा,पर इस बात का ख्याल ही नही रहा,आज फ़िर ख्याल आया तो चला आया कुछ लेकर।                                   &lt;strong&gt;खेल अंगुली करने का&lt;/strong&gt;...     &lt;br /&gt;                 इंसानी फितरत भी अजीब होती है,कभी कभी हमारी महत्वाकांक्षाएं इतनी प्रबल हो जाती हैं कि हम किसी को भी अंगुली करने से गुरेज नहीं करते,चाहे वो हमारा कितना भी ख़ास या सहयोगी क्यों न हो?          &lt;br /&gt;             जैसाकि आपको पता होगा,बीते कुछ महीने पहले हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में दो महान विचारों के गठबंधन के फलस्वरूप लोकतंत्र नामक तंत्र स्थापित हो पाया था।बड़ी खुशी की बात थी,हमारे लिए भी,अजी,हम आदर्श पड़ोसी जो ठहरे।पर महत्वाकांक्षा की जो तलवारें पहले से वहां मौजूद थीं,वो हमेशा इस नए तंत्र के उपर सरसराती रहीं।             &lt;br /&gt;             उस वक्त,जरदारी साहब ने अपनी अयोग्यता को महानता में तब्दील करते हुए ख़ुद की जगह युसूफ रजा को प्रधानमंत्री बनवाया,तो नवाज साहब को लगा कि शायद जेल की चाहरदीवारी में रहते रहते उनमे कुछ महान गुणों ने जन्म ले लिया हो,लग गए साथ में।पर मांगो की तलवार सरसराती ही रही,जिन मांगों को लेकर जरदारी को सहयोग किया उनको पूरा करने में जरदारी की तरफ़ से हीला हवाली जारी रही। नवाज साहब इसी चक्कर में पड़े रहे और रोज सुबह शाम अपनी मांग दोहराते फिरते रहे,इस बीच जरदारी साहब, अमेरिका से अपना हिसाब किताब सेट करते रहे,साथ ही साथ नवाज साहब को गोली भी देते रहे।नवाज साहब भी बड़े भोले आदमी बेचारे गोली खाते रहे।इधर, जब जरदारी साहब को लगा कि अब अमेरिका से सेटिंग मुकम्मल हो गई है तो अपना पत्ता खोलते हुए कर दिया मुशर्रफ़ साहब को अंगुली,नवाज साहब खुश,उन्हें लगता रहा।जरदारी ने उनकी पहली मांग पूरी की है,माजरा तो कुछ और ही था।           &lt;br /&gt;                  सभी लोग खुशी मना रहे थे इसी बीच पीपीपी की तरफ़ से मुनादी हो गई कि राष्ट्रपति पद के लिए उनके उम्मीदवार जरदारी होंगे,यह सुनकर नवाज चपेटे में आ गए,उनको लगा कि भइया, कुछ गड़बड़ जरुर है,इसी के मद्देनजर उन्होंने अपनी दूसरी मांग को पूरा कराने की मुहिम तेज कर दी,पर महान अन्गुलिबाज का खिताब पा चुके जरदारी को पता था कि नवाज उनका कुछ नहीं उखाड़ सकते,आख़िर अमेरिका अब उनके साथ है।इधर,हैरान परेशान नवाज ने आनन् फानन में जरदारी का साथ छोड़कर अंगुली कर दी,पर टूटी हुई अंगुली भला जरदारी जैसा कमाल कहाँ से दिखाती?                                                                                                                                                        बेचारे नवाज,अब करें भी तो क्या,फ़िर वही पुराना काम............&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                           अल्ला&lt;/span&gt; हो अकबर अल्लाह...     &lt;br /&gt;खुदा उनकी सुने, आमीन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-3396121186575044956?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/08/blog-post_26.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-7101175038156747827</guid><pubDate>Wed, 20 Aug 2008 14:04:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-20T07:10:20.046-07:00</atom:updated><title>...शोहरत की तलब...</title><description>&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;बहुत रुसवा करती है ये शोहरत की तलब...&lt;/strong&gt;  &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;                कहते&lt;/span&gt; हैं जिसे शोहरत के कीड़े ने काट लिया,उसे तो अल्लाह ही बचाए।जी हाँ,ऐसा ही कुछ हुआ है महाराष्ट्र के एक सांसद रामदास अठावले के साथ।   &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;             पिछले&lt;/span&gt; दिनों COLORS चैनल पर शुरू हुए बिग बॉस-२ के १४ सदस्यीय टीम में जगह न मिलने और उनके जगह संजय निरुपम के शामिल कर लिए जाने से अठावले महोदय का पारा अठावन्वें तल पर पहुँच गया।     &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;        ३&lt;/span&gt; बार विधायक और ३ बार सांसद रह चुके आरपीआई पार्टी के सांसद का आरोप है कि,चूँकि वह दलित हैं इसलिए उन्हें बिग बॉस २ जगह नहीं दी गई,और वे चैनल के खिलाफ अदालत में भी जायेंगे।      इधर,इस वाकये से भड़के उनके पार्टी के सदस्यों और समर्थकों ने COLORS टी वी चैनल के दफ्तर में जमकर तोड़ फोड़ की और साथ ही साथ ठाडे,नागपुर और मुंबई में धरना प्रदर्शन भी किया।इतना ही नहीं बिग बॉस,यानी शिल्पा शेट्टी का पुतला भी फूंका।आलम यह रहा कि इनके प्रदर्शन के कारण घंटों सड़कें जाम रहीं और यात्रियों को श्रीमान अठावले के जूनून का शिकार बनना पड़ा।             &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;          अगर&lt;/span&gt; सामान्य तौर पर देखें तो यह एक खिसियाई बिल्ली का कारनामा है जो COLORS को नोचने में लगी हुई है,परन्तु, जो दुखद पहलू है इस घटना का,यह कि जिस जनप्रतिनिधि को आम जनता की बात करनी चाहिए,महंगाई से परेशान जनता के हित में प्रदर्शन करना चाहिए वह फकत अपने शोहरत के कीड़े के कारण अपने पद की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने से भी बाज नहीं आया।यह एक शर्मसार कर देने वाली घटना है।        &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;        परन्तु&lt;/span&gt;, मेरा मानना है कि इस घटना को एक सांसद रामदास अठावले से न जोड़कर,एक आम इंसान रामदास अठावले से जोड़कर देखा जाना चाहिए,वैसे भी कीड़े कभी पद पूछकर नहीं काटते...  &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;     &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-7101175038156747827?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/08/blog-post_20.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-1678571893876306811</guid><pubDate>Tue, 19 Aug 2008 14:27:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-19T07:34:16.073-07:00</atom:updated><title>एक आस,खुशहाली की...</title><description>&lt;strong&gt;        &lt;/strong&gt;आज जब, एक के बाद एक धडाधड न्यूज और मनोरंजन के चैनल्स खुलते जा रहे हैं और हमारा आम दर्शक कन्फ्यूज हो चला है कि, क्या देखें और किसे देखें?इसी देश में एक ऐसा वर्ग भी है जो आज भी टी वी के सामने ख़ुद को असहाय महसूस करता है।जी हाँ,पुरबिया (भोजपुरिया) वर्ग।ऐसे में १५ से २० करोड़ की इस आबादी को लक्ष्य कर शुरू किया गया भोजपुरी भाषा का पहला चैनल "महुआ" काफ़ी सुकून देनेवाला है।                                                                                                                                      बात करें क्षेत्रीय भाषा के चैनल्स की तो,आज की तारीख में बांग्ला से लगाये गुजरती,मराठी,पंजाबी,तमिल,तेलगु,मलयालम आदि लगभग हर भाषा के चैनल्स मौजूद हैं,जिनका प्रभाव क्षेत्र कतई अपेक्षाकृत अधिक नहीं है।ऐसे में,इतनी बड़ी आबादी को हमेशा नजरअंदाज किया गया,तब जबकि भोजपुरी का प्रभुत्व भारत से बाहर फीजी,मारीशस और सूरीनाम जैसे देशो तक है।                  एक अदद भोजपुरी चैनल की इस कमी को देखते हुए मीडिया जगत से जुड़े श्री पी के तिवारी ने तमाम तरह के रिस्कों को दरकिनार करते हुए पहल की।यह निश्चय ही एक बेहद साहसिक और प्रशंसनीय कदम है।इसके लिए श्री तिवारी बधाई के पात्र हैं। साथ ही सभी पुरबिया लोगों के लिए यह एक अविश्वसनीय सी लगने वाली खुशी है।                                                                           श्री तिवारी के इस हौसले और साहस को देखते हुए बालीबुड में अपनी धमक रखने वाले एक और पुरबिया,प्रख्यात फ़िल्म मेकर प्रकाश झा भी बेहद उत्साहित हैं और उन्होंने ख़ुद को "महुआ" से जोड़ लिया है।ख़बर यह भी है कि वे महुआ के लिए धारावाहिकों का निर्माण भी करेंगे।इससे बड़ी सौगात पुरबिया लोगो के लिए शायद ही कुछ और हो।आशा करते हैं कि जिस तरह महुआ बूंद बूंद टपकता है उसी तरह "महुआ" हरपल खुशहाली टपकाती रहे,मनोरंजन टपकाती रहे।                                            तो,पुरबिया साथियों!हो जायिए तैयार...        &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-1678571893876306811?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/08/blog-post_19.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-4734468168082904041</guid><pubDate>Sat, 16 Aug 2008 06:21:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-15T23:27:21.753-07:00</atom:updated><title>......स्वंतत्रता दिवस मुबारक</title><description>फ़िर वो दिन आया और चला गया जब पुराने संदूकों के मुरचा खाए ताले खुले,कुछ रंग बिरंगी आयताकार आकृतियाँ बहार निकलीं,कुछ साफ़ सुथरे कपड़ा पहने सभ्य लोगों ने सुबह सुबह तमाम जगहों पर ३ रंगों वाली आयताकार आकृति को तिरंगे का नाम देकर गौरवपूर्ण अंदाज में फहराया,कुछ फूल धरती पर गिरे,तालियों की गडगडाहट और फ़िर कुछ मिष्ठान के नाम पर लम्बी धक्का पेल लाईनें,और ठीक इसके पहले कुछ घंटों तक हमारे साफ़ सुथरे लोगों ने अपनी साल भर की बचायी हुई जुबानी जमाखर्च का जमकर मुजाहिरा किया,और साथ ही क्षणेक के लिए जागृत हो उठा देश के हर नागरिक के दिल में सरफरोशी की तमन्ना।जी हाँ,आखिरकार कल हमारे आजादी का दिन जो था।              इस झंडे वाली सुबह की ठीक पहले वाली रात को होती रही मैसेजिंग की भरमार और आधी रात से ही झंडे वाले पूरे दिन तक मोबाईल की सारी लाईनें व्यस्त रहीं।शाम को जब दिनभर की मेहनत से फुर्सत पाकर जब टी वी/ रेडियो आन किया तो अप्रत्याशित तौर पर धमाकों और हताहतों की खबरें समाचारों से नदारद थीं,उनकी जगह ले रखी थी हमारे नेतागणों की भावानाफोदू भाषण-बाजियों ने जिसे सुनकर रगों का लहू उबाल लेने लगा,पर बरसाती मौसम में पंखे और कूलर की ठंडक लगते ही हमारी पेशियाँ सिकुड़ने लगीं तबतक वक्त हो आया था सपनों में खोने का।हो गया,"स्वतंत्रता दिवस मुबारक"              &lt;em&gt;आपको भी,६१वें स्वतंत्रता दिवस की ढेरों शुभकामनाएं.&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt; आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-4734468168082904041?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/08/blog-post_15.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-6043671934790140761</guid><pubDate>Wed, 13 Aug 2008 05:16:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-12T22:17:53.066-07:00</atom:updated><title>.....मुझको अब महरूम ना कर.</title><description>&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;strong&gt;.....मुझको अब महरूम ना कर.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;गुरबत की बात हमसे ना छेडो दिलबर,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;आँख मेरे रोये हैं विसाल में भी।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;बावस्ता रहा हूँ मैं चाँद खुशियों से ही,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;तन्हाई की अब रात ना दिखाओ दिलबर।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;तेरी हर एक हँसी में घुला है मेरे जिगर का लहू,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;मेरे जिगर के टुकड़े को यूँ नीलाम ना कर।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;तुम हँसी हो बहुत छुपाने की नहीं बात सनम,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;तेरे विसाल को तडपता रहा हूँ सदियों से।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;मेरा ईमान भी लुट जाए तो जाने दो सनम,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;तेरी बंदगी से मुझको अब महरूम ना कर.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-6043671934790140761?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/08/blog-post_12.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-7626512891718803575</guid><pubDate>Tue, 12 Aug 2008 12:18:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-12T05:25:21.752-07:00</atom:updated><title>हिन्दुस्तान: धमाकों का देश</title><description>&lt;em&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;             !!8 साल 69 से अधिक जिहादी धमाके,1200 से अधिक मौतें!!&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;                                  &lt;/span&gt;&lt;strong&gt;हिन्दुस्तान&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;: धमाकों का देश&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;              सोने&lt;/span&gt; की चिडिया,जगत का सिरमौर हमारा हिन्दुस्तान आज जिहादियों की ऐशगाह और शांतिप्रिय नागरिकों की मौतगाह बनता जा रहा है. कभी जम्मू कश्मीर,असम,छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश जैसे राज्यों तक सिमटा जिहादी आतंकवाद आज देशव्यापी हो गया है.तो ऐसे में क्या दिल्ली,क्या वाराणसी,क्या हैदराबाद,क्या जयपुर और क्या अहमदाबाद?सब बराबर हो गया है.कभी कभी लगता है कि समानता और समरसता की जो भावना सदियों से आजतक हम हिन्दुस्तानियों में नही जागृत हो पाई आज वो जिहादियों ने पैदा कर दी.आज की तारीख में पूरा हिन्दुस्तान एक समान हो गया है क्योंकि मौत हर जगह बराबर में मिलती है. आइये पिछले तीन सालों के आंकडों पर नजर डालें-&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;       तारीख&lt;/span&gt;          वर्ष     जगह मौतें&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; १. २५ अगस्त २००५ मुंबई ४६&lt;br /&gt;२. २९ अक्तूबर २००५ दिल्ली&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;. ७ मार्च २००६ वाराणसी २१ ४. ११ जुलाई २००६ मुंबई २०९५. ८ सितम्बर २००६ मालेगांव ४०६. १९ फरवरी २००७ पानीपत ६६७. १८ मई २००७ हैदराबाद १२८. २५ अगस्त २००७ हैदराबाद ४२९. १३ मई २००८ जयपुर ६३१०.२५ जुलाई २००८ बंगलौर ०१ ११. २६ जुलाई २००८ अहमदाबाद ५३&lt;br /&gt;ये आंकड़े इस बात को चीख चीख कर बयां कर रहे हैं कि अब हिंदुस्तान सुरक्षित नहीं रहा.एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि&lt;em&gt; इस्लामी आतंकी गतिविधियों में होने वाली मौतों में पूरे विश्व में हिन्दुस्तान का इराक़ के बाद दूसरा स्थान है,&lt;/em&gt;जो हमें नख से शिख तक शर्मसार कर देने के लिए काफ़ी है. बात करें हमारे रहनुमाओं की तो आज भी उनकी प्रतिक्रियाएं वैसी ही हैं जैसे पहले आती थीं.जब वे सत्ता में होते हैं तो जिहाद का रोना रोते हैं और मुआवजे बाँटते हैं और जब विपक्ष में होते हैं तो आरोपों की झडी लगा देते हैं.पर हकीकत यह है कि हैं सभी एक ही तवे के सेंके हुए. फ़िर भी हम बात करते हैं सर्वशक्तिमान बनने की,अमेरिका की बराबरी करने की,अरे, हमें तो किसी गटर में डूब मरना चाहिए.क्या आपको नहीं पता है कि ९/११ के बाद अमेरिका में जिहाद के नाम पर पटाखे तक नही फूटे वहीँ इस दरम्यान हमारे देश में तकरीबन १२०० लोग जिहाद के नाम पर हलाक हो गए.ये फर्क है सर्वशक्तिमान अमेरिका और शेखचिल्ली सा ख्वाब सजाये हिन्दुस्तान में. कहते हैं हर अति की इति होती है,पर यह क्या,यहाँ तो किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती.सभी मस्त हैं अपनी राजनीति बजाने में.कोई अमरनाथ श्राईन बोर्ड मसाले पर,कोई सेतुसमुद्रम पर,कोई नंदीग्राम पर तो कोई कलावती पर. आख़िर,हम गुहार लगायें तो किससे?जागो अब तो जागो.... &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;        &lt;em&gt;आज&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;em&gt; अगर खामोश रहे तो कल सन्नाटा छायेगा, &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;       हर&lt;/span&gt; बस्ती में आग लगेगी,हर बस्ती जल जाएगा। &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;      सन्नाटों&lt;/span&gt; के पीछे से तब एक सदा ये आयेगी। &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;      कोई&lt;/span&gt; नही है,कोई नही है,कोई नही है कोई नही.&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-7626512891718803575?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/08/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-4417802043474919616</guid><pubDate>Wed, 16 Jul 2008 14:38:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-07-16T07:43:42.622-07:00</atom:updated><title>.....ख्वाब में जीता रहूँ!!</title><description>&lt;strong&gt;.....ख्वाब में जीता रहूँ!!&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;तुमसे मिलना तो पहले इत्तफाक ही था,&lt;br /&gt;पर क्या इत्तफाक  कि इत्तफाक से मोहब्बत हो गई।&lt;br /&gt;ढूंढ़ता रहता हूँ तुझे हर वक्त,हर घड़ी गली - गली,&lt;br /&gt;पर अजीब इत्तफाक ,आज फ़िर तू ख्वाबों में ही मिली।&lt;br /&gt;तेरा मिलना भी यूँ तो कम खुशगवार नहीं,&lt;br /&gt;काश तू समझती,ख्वाबों से इतर भी दुनिया हसीं होती है।&lt;br /&gt;रहता है इंतजार हर पहर तेरे ख्वाबों का,&lt;br /&gt;ख्वाबों से बाहर आना तेरा मुनासिब जो नहीं।&lt;br /&gt;चाहता हूँ तुझको बसा लूँ अपने पलकों पर,&lt;br /&gt;हर वक्त नजरें बंद हों और ख्वाब में जीता रहूँ.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-4417802043474919616?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/07/blog-post_16.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5314673316124728276.post-7601483613315577099</guid><pubDate>Sat, 12 Jul 2008 15:11:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-07-12T08:27:44.683-07:00</atom:updated><title>मैया मैं तो...परमाणु लैन्ह्यो</title><description>हमारा प्यारा भारतवर्ष एक प्रगतिशील देश है जिसकी प्रगतिशीलता का अंदाजा ११.६३ फीसदी की मंहगाई दर से ही लगाया जा सकता है.शायद लोगों को पता नहीं कि हमारे पीएम से लगाये योजना आयोग के उपाध्यक्ष और वित्तमंत्री सभी अर्थशास्त्री हैं.फ़िर भी लोग तो लोग हैं कि झुठ्मुथ में मंहगाई का रोना रो रहे हैं.                       खैर,किसी भी देश के अधिकाधिक विकास के लिए सबसे बड़ी जरुरत होती है उर्जा की.सच्ची बात तो यह है कि सभी मिलकर सबसे जरुरी काम पर अपना दिमाग खपा रहे हैं.अब उर्जा जैसी बड़ी समस्या से निपटने के लिए मंहगाई जैसी छोटी मोटी समस्याओं को इग्नोर तो करना ही पड़ता है .आख़िर बात देश के विकास की जो ठहरी.वैसे भी अगर मंहगाई है तो यह भी तो एक सूचक ही है कि हमारे यहाँ मंहगे मंहगे सामान बिकते हैं इसके मायने है कि हम अमीर हो रहे हैं,आखिरकार पैसा घूमफिरकर देश में ही तो रह रहा है.                      एक कहावत आपने सुनी होगी अंधे के हाँथ बटेर लगना.जी हाँ,हमारे रहनुमा अभी विचार मंथन में लगे ही हुए थे कि कैसे इंडिया को चमकाया जाए,कि एक पुराने शुभेच्छु देश ने एक उर्जावान प्रस्ताव दे दिया.भूखे को क्या चाहिए दो जून की रोटी ही न!फ़िर क्या था सभी आन्ख्मुन्दकर चिल्लाने लगे कि अगर फलां डील हो गया तो हम भी अमेरिका जैसे हो जायेंगे.ये तो पता ही है कि उर्जा आएगी तो लाईट आएगा और लाईट आएगा तो देश चमकेगा ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका चमकता है.इतनी सी फंडामेंटल थ्योरी है.अजी कहने वाले तो कहते रहें कि देश की सुरक्षा के लिए जरुरी परमाणु परीक्षणों पर रोक लग जायेगी,देश उस सहयोगी का पिट्ठू बन जाएगा पाकिस्तान की तरह,वगैरह वगैरह...लोग भी अजीब हैं,अरे भाई जब डील के बाद जब हम अमेरिका बन ही जायेंगे तो क्या जरुरत है किसी परिक्षण वरिक्षण की.लोग भी न...                     हाँ जी,तो हमारी सरकार को लगा कि भइया ४ साल बिता दिए पर कुछ भी ऐसा नहीं उखाड़ पाए कि अगले चुनाव में गा सकें,चलो इसी बहाने एक नया गाना तो मिल जाएगा गाने को.पर हमारे बायें वाले भइया लोग पता नही क्या खुन्नस है हमारे मनोहारी साहब से.                     तो साहब आज तक़रीबन डेढ़ साल होने को है जब से हमारे पीएम साहब निरंतर रोना लगाये हैं कि मैया(भइया) मैं तो चन्द्र खिलौना(परमाणु) लैह्यों.पर भाई जी लोग माने ही नही तभी उत्तर कि तरफ़ से से एक भाई साहब सायिकिल पर बैठे हाँथ में लालटेन लटकाए चले आए,अब जाके हमारे पीएम साहब को आशा की किरण दिखी कि अब तो कुछ भी हो जाए सयिकिल पर बैठकर परमाणु तो लायेंगे ही.धन्य है श्रृष्टि के परम अणु.&lt;br /&gt;         &lt;strong&gt;आलोक सिंह "साहिल"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5314673316124728276-7601483613315577099?l=navpravah.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://navpravah.blogspot.com/2008/07/blog-post_12.html</link><author>noreply@blogger.com (आलोक सिंह "साहिल")</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item></channel></rss>