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रविवार, 28 मार्च 2010

नया गुजरात बनने तक...



देश के सबसे ताकतवर मुख्यमंत्री...अपेक्षाकृत बौने जांच दल के सामने पेश हो ही गए...जांच दल ने जीभरकर अपनी सालों की प्यास बुझाई...और घंटों हाल-चाल किए...एक-दो नहीं पूरे 9 घंटे तक हाल-चाल होता रहा...वह भी एक नहीं दो-दो सत्रों में....क्योंकि देश के सबसे उज्जवल प्रदेश के मुख्यमंत्री के पास रोज-रोज इतना वक्त थोड़े है कि वह रोज ऐसे आलतू-फालतू कामों के लिए समय निकालता फिरे.....
खैर, अब इससे एक बात तो साफ हो ही गई कि मोदी जी की क़ानून और संविधान में गहरी आस्था है...और साथ ही भारतीय संविधान में घोर विश्वास भी...तभी तो....वह एक अदने से जांच दल के सामने पेश होने में भी नहीं हिचकिचाए (अपने कद का ख्याल किए बिना)...क्योंकि SIT इतना ताकतवर आयोग नहीं कि उसके सामने पेश होना एकदम से मजबूरी ही हो...साथ ही भाजपा का भी एक ऐसी पार्टी होने का अहं बरकरार रहा, जो संविधान में सर्वाधिक आस्था रखती है...
बहरहाल, दूसरे चरण की पूछताछ के बाद जब रात के एक बजे करीब मोदी जी व्यापक हाल-चाल करके बाहर निकले तो काफी खुश और संतुष्ट दिखे...शायद मीटिंग सफल रही थी...और वैसे भी चाहे नानावटी हों या टाटा...या फिर अमिताभ ही क्यों न हो...आज तक रिकॉर्ड है, मोदी जी की मीटिंग कभी भी असफल नहीं हुई...अगर होती, तो गुजरात के अल्पसंख्यक आज वहीं थोड़े होते...और न ही वहां के बहुसंख्यक वैसी अवस्था में होते...
वैसे इस घटना से कई फायदे हुए...एक तरफ जहां कांग्रेस को इस घटना के बाद जनता के सामने भोकाल बनाने का मौका मिल गया...कि उसने आखिरकार मोदी को आठ सालों में पहली बार ही सही...किसी आयोग के सामने खड़ा तो कर ही दिया...उधर भाजपा में नया प्रशासनिक तंत्र बनने और फिर से अयोध्या मसले के उजागर होने के बाद कुछ ठोस चाहिए था...जो उसे मिल गया...बाकी काम तो उनके पढ़े-लिखे प्रवक्ता गण कर ही देंगे...सबका हित सध गया...
लेकिन कुछ लोगों का हित अभी बचा है...सहमे-सहमे और इंसानों की परछाईं तक से कांप जाने वाले कुछ जले-जलाए लोगों का इंतजार अभी भी बाकी है...जिनकी जिंदगी....उसी वक्त काली होनी शुरू हो गई थी, जिस दिन ट्रेन के कुछ डिब्बों और माचिस की कुछ तीलियों से निकली राख ने गुजरात को चमकाना शुरू कर दिया था...
इंतजार खत्म होगा..., कभी तो खत्म होगा...शायद तराजू लिए मूर्ति पर बंधी काली पट्टी एक दिन आंसुओं में भिंगकर उन जले हुए लोगों पर जमी कालिख पोतने के काम आएगी...और फिर शायद यह इंतजार हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा...या शायद तब तक के लिए, जब तक कोई दूसरा गुजरात जन्म न ले ले...

आलोक साहिल

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

कहां मर गईं संवेदनाएं...


अगर कोई छोटा-सा बच्चा किसी अन्य बच्चे को मार दे, तो आप क्या करेंगे ?...उसे डांटेंगे, थपकी लगाएंगे और समझाएंगे...शायद यही करेंगे न...वह भी जब उस बच्चे की उम्र महज 5 साल हो, तो शायद आप इनमें से कोई भी काम न करके सीधे उसे गोद में लेंगे और प्यार से समझाएंगे...

लेकिन इसके उलट अमेरिका की एक स्कूल टीचर ने अपने स्टूडेंट को ऐसी सजा सुनाई कि सोच कर मन सिहर जाता है कि आखिर मूल्यों के कुछ मायने रह भी गए हैं या नहीं...उस 5 साल के बच्चे की खता फकत इतनी थी कि उसने अपने क्लासमेट को मार दिया....उसपर टीचर ने क्लास के दसियों स्टूडेंट्स को उस मारने वाले लड़के के मुंह पर घूंसे मारने का आदेश दे दिया...ये सब सज़ा के नाम पर...जिसका कि उस मासूम को मतलब भी नहीं पता होगा...

टीचर-स्टूडेंट की बात होने के बावजूद मैं यहां...गुरू-शिष्य परंपरा की बात नहीं करूंगा...क्योंकि मुझे पता है अब पहले जैसी बात नहीं रही, लेकिन थोड़ी-सी इंसानियत तो जुटाई ही जा सकती है, जो ये फर्क करा सके कि किसी मासूम के साथ कैसा सलूक किया जाय...मैं नहीं जानता कि इस घटना के बाद उस बच्चे को सज़ा का मतलब पता पाएगा या नहीं...लेकिन इतना ज़रूर है कि इसके बाद उसे नफरत का पाठ ज़रूर कंठस्थ हो गया होगा...

यह घटना कोई नई या अनोखी नहीं है, हां तकलीफदेह ज़रूर हो सकती है...ऐसी ही तमाम घटनाएं अपने देश में भी समय-समय पर घटती रही हैं...अभी कुछ दिनों पहले ही एक टीचर ने एक मासूम छात्रा को ऐसी सजा सुनाई कि बच्ची की मौत ही हो गई...आनन-फानन में कोर्ट-कचहरी सब हुआ...लेकिन परिणाम कुछ नहीं आया...सच तो यह है कि इन घटनाओं में आनन-फानन में उठाए गए किसी भी कदम का कोई परिणाम निकल ही नहीं सकता...क्योंकि इसके लिए व्यापक तौर पर काम करने की ज़रूरत है...

ये रूटीन सी बात हो गई है...जब भी ऐसी घटनाएं घटती हैं, तुरत-फुरत में नए क़ानूनों को बनाने, सजा का प्रवधान करने और जागरुकता लाने जैसी न जाने कितनी बातें एकसाथ होने लगती हैं...और फिर मामला ठंडा होते ही...सबकुछ फेडआउट....

हालांकि तकरीबन हर देश में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए नियम-क़ानून बनाए गए हैं, लेकिन क़ानून के मायने सिर्फ उनके लिए होते हैं...जिन्हें भगवान जैसी सत्ता में विश्वास...या उनसे डर होता है...(क़ानून का तो डर ही नहीं होता किसी में)...और ऐसे लोगों की संख्या के बारे में कोई भी कयास यथार्थ को इंगित नहीं कर सकता....परिणाम यह होता है कि ऐसी घटनाएं बदस्तूर जारी रहती हैं...

ऐसे में खुद से एक सवाल उठता है, क्या ज़रूरी नहीं कि बहुत क़ाबिल, बहुत सफल और महान बनने की दौड़ में अपने अंदर की थोड़ी संवेदना को भी बचा लें!

आलोक साहिल

गुरुवार, 25 मार्च 2010

बच्चन की तो भद पिट गई


भई आज तो घर से नहा धो कर निकले थे...फिर चूक कहां हो गई...आज तो मां के दर्शन भी किए थे...फिर भी...अमां निकले ही क्यों थे...नहीं निकलते, तो काम नहीं चलता क्या (वैसे भी हाथ में बहुत फिल्में तो हैं नहीं)...खामखां इस भद पिटाई से तो बच जाते....
यही सोच रहे होंगे...सदी के महानायक और बॉलीवुड के शहंशाह...अमिताभ बच्चन...
मुंबई में बांद्रा-वर्ली सी लिंक के दूसरे चरण के उद्घाटन में मुख्य अतिथि बनने के लिए जब अमिताभ को आमंत्रित किया गया, तो किसी को रत्तीभर भी इस बात की भनक नहीं थी कि अगले कुछ-एक घंटे में क्या कुछ होने वाला है...और मिस्टर बच्चन के लिए तो यह चार दशकों में संभवतः कदाचित पहला मौका था...मुंबई सरकार के किसी भी आयोजन में अतिथि बनकर पहुंचने का...सबकुछ बढ़िया-बढ़िया चल रहा था...चैनलों में खबरें लिखी जानें लगीं कि...'फिर से बच्चन और गांधी परिवार में नजदीकियां बढ़ने लगीं'...' यह सी लिंक नहीं दोस्ती का लिंक है' वगैरह-वगैरह.....अभी यह सब रिहर्सल चल ही रहा था कि महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष (जिनको टीवी और टीवी को वे बहुत रास आते हैं) ने सब गुड़ गोबर कर दिया...मोर्चा खोल दिया...कि किसने बुलाया अमिताभ को...मेरी राय नहीं ली गई..

उधर, बहुत सारे ऐसे लोग भी थे, जो इसी ताक में थे कि कोई आगे आकर भाड़ में सिर डाले, बस वे भी शुरू हो गए...
अब तो जैसे तमाशा बन गया...दिल्ली से महाराष्ट्र तक में कांग्रेस में खलबली मच गई कि 'किसने बुलाया' तो 'किसने बुलाया'
अजी, कोई भी बुलाए, अमिताभ इतने बड़े अभिनेता हैं, बिन बुलाए तो पहुंचेंगे नहीं...आलम यह था कि सीएम साहब भी रट लगाने लगे...मुझे तो पता ही नहीं था कि कार्यक्रम में अमिताभ आने वाले हैं (जाने क्या सोचकर कांग्रेस ने ऐसे शख्स को सीएम बनाया, जिसे कुछ पता ही नहीं रहता)...
बन गया पूरा माहौल, शुरू हो गया आरोप-प्रत्यारोप का दौर...और इन सब के बीच में शालीनता से बैठा एक शख्स (बच्चन) यह सोच रहा था...कि भैया बहुत खूब, कमबख्त घर बुलाकर बेइज्जत करने के लिए हम ही मिले थे...
हद तो तब हो गई जब समारोह में उपस्थित राज्य के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण कहते हैं कि 'मैं तो...समारोह में अमिताभ बच्चन को देखकर शॉक्ड हो गया'...
दरअसल, दोपहर तक जनपथ इस बात से अंजान रहा कि बोफोर्स मामले के समय साथ छोड़ने वाला, उनकी पार्टी शासित राज्य में किसी सरकारी टाइप के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनने वाला है...ऊपर से यह वही शख्स है जिसे गुजरात (भाजपा शासित) ने अपना ब्रांड एम्बेस्डर बनाया है...एक दर्द और भी तो था...ये वही अमिताभ है, जो उस वक्त किसी स्वयंभू ठाकरे के घर जाकर अपनी फिल्म दिखा रहा था, जब युवराज की महाराष्ट्र यात्रा के विरोध में ठाकरे के गुर्गो गला फाड़ रहे थे...

अब इतना सब के बाद भी एंग्री यंग मैन को अपनी दशकों पुरानी दोस्ती याद आ गई, तो भैया गलती हमारी तो नहीं ही है...

आलोक साहिल

सोमवार, 11 मई 2009

शर्म की बात है मोइली साहब!!!


अगर आज के यूथ की भाषा में बोलें तो नपना एक स्वाभिवक प्रक्रिया है....हर कोई कभी न कभी, कहीं न कहीं नपता जरूर है। सबका हक है भई...तो, लो जी कल तक हर समय गाहे-बगाहे टीवी पर कर..कर..करने वाले मोइली साहब तो बड़े भाग्यशाली निकले ..ऐसे ही थोड़े न उनकी पार्टी के लोग उनके खिलाफ बीज बोने में लगे थे...मैडम की असीम अनुकम्पा जो उनपर है...तो चुनाव चल ही रहा है..लेकिन नंबर ज्यादा होने के कारण सबसे पहले मोइली साहब ही नपे।
ऐसे तो यह इतिहास रहा है कि हर चुनाव के बाद कुछ लोग नपते जरूर हैं लेकिन ऐसी भी क्या तेजी कि आखिरी चरण का चुनाव सर पे है और पार्टी के मीडिया विभाग के प्रमुख नप गये।
बहरहाल, इसबार के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी के साथ ऐसी कई बातें खास थीं जो खटकीं...वीरप्पा मोइली साहब की बोलती बंद होना भी उन खास बातों में से एक है। अब कुछ तो लोग कहेंगे ही॥अजी, उनका काम ही जो कहना है...मसलन,कांग्रेस के मीडिया विभाग में बहुत सारी गड़बड़ियां थीं, उसमें ऐसे लोग थे जो बड़बोलेपन के शिकार थे और कुछ भी अनाप-शनाप बोलते रहते थे, वगैरह...वगैरह।
अब जरा सोचिए जब पार्टी का युवराज किसी बिहार के मुख्यमंत्री को अच्छा कह दिया तो वह अच्छा है न...अब आपके मंत्रीमंडल का कोई वरिष्ठ मंत्री आपको नहीं पसंद तो न सही...लेकिन मैडम (और अब तो सर भी) की आज्ञा के बगैर आप कुछ भी बोल देंगे, ये कोई सलीका थोड़े न है। इतने दिनों से राजनीति कर रहे हैं... (अब तो आप खुद भी वरिष्ठ हो गये हैं) और आपको यह भी नहीं पता कि राजनीति में कब किसके बारे में क्या कहना है...शर्म की बात है मोइली साहब!!!

आलोक सिंह "साहिल"

रविवार, 10 मई 2009

इन्तजार कर लेना ही मुफीद होगा...

महंगाई और आर्थिक मंदी के पहिये पर रेंगता हुआ, गठबंधन के जंजाल में जकडा भारतीय लोकतंत्र एकबार फिर से अंगडाई लेते हुए नया करवट बदलने को आतुर है। लेकिन कई सारे ऐसे पहलू हैं जो इसबार के आमचुनाव को ख़ास बनाते हैं...

अब तक के भारतीय इतिहास में संभवतः यह पहलीबार है जब प्रधानमन्त्री पद के दावेदार को लेकर चुनाव पूर्व ही इतनी साड़ी बिसातें बिछ गयी हैं...गांधी टाईटल वाले नेताओं को छोड़ दें तो यह पहलीबार है जब कांग्रेस ने चुनाव के पहले ही अपना कैंडिडेट घोषित कर रखा है. पिछले आम चुनावों को देखें तो कांग्रेस पार्टी अब तक अपने आलाकमान/ गांधी नाम पर ही चुनाव लड़ती थी...लेकिन इसबार मनमोहन सिंह को आगे कर चुनाव लड़ रही है...वह भी तब जब उसके स्थायी युवराज पूरे देश में पैर जमाने की जुगत में लगे हैं...ऐसे में पूरे जोरदार ढंग से मनमोहन को अपना कैंडिडेट बताकर कांग्रेस क्या सिद्ध करना चाहती है, इसे समझना बहुत कठिन नहीं है...यह मजेदार रहस्य इस वाक़ये से और भी स्पष्ट हो जाता है- आज तक भाजपा के पीएम इन वेटिंग (तथाकथित मजबूत नेता) लालकृष्ण आडवाणी द्वारा बेइंतहा खरी खोटी सुनने और लगाए गए ढेरों आरोप मसलन, इतिहास के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री और मैडम के पिट्ठू...वगैरह...वगैरह...का जवाब आखिरकार मित/ मृदु भाषी समझे जाने वाले मनमोहन ने दे ही दिया...

हालांकि उनका जवाब देना कोई बड़ी बात नहीं थी तब जबकि उनके प्रतिद्वंदी आडवाणी अमेरिकी तर्ज पर भारतीय लोकतंत्र का फैसला टीवी के डिबेट से करना चाह रहे हों...लेकिन चूँकि मैडम सोनिया की सरपरस्ती में फूंक-फूंक कर कदम रखने वाले मनमोहन सिंह ने ऐसा किया...बात बड़ी लगती है। लेकिन इससे भी मजेदार बात तो यह है कि जब उनसे इस बाबत पूछा गया कि भई, इतने दिनों से आरोप लगते रहे तो जवाब आज ही क्यों...तो उनका कहना था कि...चूँकि आजतक मुझे विश्वास नहीं था कि मुझे कैंडिडेट बनाया जायेगा या नही...लेकिन आज जब मुझे विश्वास हो गया है कि मैं ही कांग्रेस का पी एम इन वेटिंग हूँ...तो जवाब दे दिया। ध्यान देने की बात यह है कि मनमोहन के फार्म में आने के महीनों पहले से ही आलाकमान की तरफ से ये बात बार-बार कही जा रही थी कि उनके कैंडिडेट वे ही होंगे। लेकिन क्या करें भले -मानस लोगों में इज्जत की पुंगी बजने का दर कुछ ज्यादा ही रहता है...सो, कुछ कांग्रेसियों द्वारा प्रधानमन्त्री पद के दावेदार बताये जा रहे राहुल गांधी द्वारा बार-बार आश्वासन मिलने पर भी कि मनमोहन ही कैंडिडेट हैं...उन्हें अपनी कमजोरी का एहसास सताता रहा।

इस बहस को यहीं छोड़ते हैं...आते हैं दूसरी बड़ी पार्टी भाजपा पर, तो इसबार कुछ भी बहुत नया नहीं नजर आ रहा है...शिवाय इसके कि आजतक वाजपेयी के मुखौटे पर वोट मांगने वाली भाजपा आज आडवानी का नाम लेने पर मजबूर है...बाकी हरबार कि तरह इसबार भी भाजपा ने पहले से अपना कैंडिडेट घोषित कर रखा है...आडवानी, पी एम इन वेटिंग! लेकिन आडवानी के पेशानी कि लकीरों में झाँका जाये तो उसमें कहीं न कहीं मोदी और मुरली मनोहर जोशी कि तस्वीर साफ़-साफ़ झलकती है तब जबकि मोदी खुलेआम इसबात का ढिंढोरा पीट रहे हैं कि इसबार ही नहीं बल्कि 2014 का चुनाव भी आडवाणी जी के नेतृत्व में ही लड़ा जायेगा (कौन समझाए उन्हें नेतृत्व में लड़ना और बात होती है और पीएम बनना और) लेकिन कभी- कभी मजबूत और निर्णायक लोग भी काँप जाते हैं, इसे पचाना कोई तकलीफ कि बात नहीं...अब ऐसी भी क्या बात है इज्जत केवल म्रिदुभाशियों कि ही थोड़े होती है... एक बात और जो ख़ास है, 96 के चुनावों को देखें तो, तब तीसरा मोर्चा बना था , जो उस वक्त तक के लिए ख़ास था..लेकिन इसबार तो चौथा मोर्चा भी मोर्चेबंदी में लग गया है। हद तो यह है की महाराष्ट्र में अपने पार्टी के लिए एक अदद मुख्यमंत्री भी न जुगाड़ पाने वाले शरद पवार से लगाए बहन जी तक इस जमात में शामिल हैं...

वहीँ राहुल गांधी के शब्दों में 'आर्थिक सुधार व विकासवादी' व्यक्तित्व वाले बिहार तक ही सीमित रहे बिहार के ,मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपरोक्ष रूप से ही सही इस घुड़दौड़ में शामिल हैं...लेकिन एनडीए के घटक के रूप में उनके लिए यह दिवास्वप्न सरीखा ही है...वे भी इस जुगत में हैं की चुनाव बाद यूपीए से गलबहियां कर कुछ तो उखाड़ ही लें। लेकिन एनडीए कि प्रमुझ घटक किसी भी सूरत में ऐसा होने देने के मूड में नहीं है। क्योंकि पहले ही अपने एक बड़े घटक बीजद के अलग होने के बाद भाजपा इस मामले में ज्यादा सतर्क है...लेकिन राजनीति में कुछ भी संभव है। जब यूपीए के कद्दावर सहयोगी लालू-पासवान और मुलायम यह सपना देख सकते हैं तो फिर नीतीश क्यों नहीं. आखिर हैं तो सब गुरुभाई ही... खैर, चार चरणों के मतदान हो चुके हैं. आखिरी चरण का चुनाव भी बहुत दूर नहीं , तो १६ मई का इन्तजार कर लेना ही मुफीद होगा...फिर किसी हजाम से इसपर बहस करने कि गुन्जायिश ही नहीं बचेगी कि माथे पर कितने बाल हैं. जैसे ही वोटिंग मशीनें अपने अन्दर छिपे राज उगलने शुरू करेंगी...बालों कि गिनती स्पष्ट होती चली जायेगी और पीएम इन वेटिंग/ सेटिंग का सिलसिला भी ख़त्म हो जायेगा।

आलोक सिंह "साहिल"

सोमवार, 19 जनवरी 2009

क्षमा शोभती उस भुजंग को...

ऐसे तो हिन्दुस्तान धमाकों का देश बन चुका है,कोई भी जगह ऐसी नहीं बची जिसे सुरक्षित माना जाए...चाहे वो संसद ही क्यों न हो....पर मुम्बई में हुए धमाकों ने हमारी एक और अदा की बानगी पेश की॥हमारी बुझदिली! मुम्बई में धमाके क्या हुए ,मानो क़यामत ही आ गई...लोग गला फाड़ने लगे,लोगों का काम ही है गला फाड़ना।बेचारे कर भी क्या सकते हैं,कोई भी ख़ुद को लाचार और असुरक्षित महसूस करने वाला इंसान थक-हारकर गला फाड़ने लगता है,तो ये कोई नई बात नही...ऐसा तो हर धमाके के बाद ही होता है.पर जो बात इसबार अजीब हुई कि लोगों( आम जनता) ने तो अपना काम किया ही(इस मामले में हम भारतीय बहुत ईमानदार हैं)आश्चर्यजनक तरीके से हमारे सुख-दुःख के नियंता,हमारे नेतागण भी गला फाड़ने लगे....देने लगे पाकिस्तान को चेतावनी,उधर पाक अपनी मनमानी करता रहा...इसबीच गृहमंत्री बार बार कहते रहे,इसबार मार फ़िर बताता हूँ.कभी तो आतंकियों के पाकिस्तानी होने का सबूत पाक को दिखाते तो कभी विश्व समुदाय को दिखाने की बात करते...थक हारकर अमेरिका की शरण में आ गिरते...उखड़ता कुछ नही.. क्या हो गया हमें? कहीं हमने अपनी धार तो नहीं खो दी (दुर्भाग्य से वो कभी थी ही नही..)क्योंकि जिसके पास कुछ करने का बूता होता है वो धमकियाँ नहीं देता, क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,उसको क्या जो दंत-विहीन विषरहित विनीत सरल होक्या हुआ अमेरिका में..एक धमाका हुआ और उसने खड़े-खड़े अफगानस्तान को नेस्तोनाबूद कर दिया ग़लत किया कि सही यह अलग विवाद का मसला हो सकता है..पर असल बात यह है कि उसने अपने जख्म पर मरहम लगाने के लिए भारत या किसी अन्य देश के आगे गुहार नहीं लगाई नही,जो करना था कर गुजरा..हमें आजाद हुए ६ दशक से भी ज्यादा हो गए,इस बीच हम बहुत बड़ी परमाणु शक्ति भी बन बैठे,फ़िर भी आज भी किसी भी छोटी-बड़ी समस्या पर दूसरो के आगे टेसुयें बहाने की आदत नहीं गई. ऐसा क्यों? क्या पाक और अमेरिका के माँओं के सीने से ही दूध निकलता है,हमारी माएं पानी पिलाती हैं?
क्या हिन्दुस्तान की माँओं ने कायर और नामर्द जनना शुरू कर दिया है? नही॥ऐसा बिल्कुल नही,अब मुम्बई धमाकों के बाद सोनिया गाँधी का भाषण ही सुन लीजिये (आख़िर,वह भी एक मां हैं..) कि हम भारतीयों में बलिदान की उत्कृष्ट परम्परा रही है...क्या मायने हैं इसके ?क्या हम भारतीय सिर्फ़ गुमनाम मौत मरने के लिए ही पैदा होते हैं? चलिए दूसरे तरीके से बात करते हैं...अगर 26/11 की घटना मुम्बई की जगह वाशिंगटन में हुई होती तो क्या होता..पाकिस्तान अबतक इराक की शक्ल अख्तियार कर चुका होता..पर,भारत ऐसा नही कर पाता..आखिर क्या मज़बूरी आड़े आती है? सच कहते हैं पाकिस्तानी कि हमलोग बिल्कुल कायर और नामर्द।हमारा लहू कभी उबलता ही नही.हर एक घटना के बाद हमारे विदेशमंत्री एक ही राग अलापते हैं कि सारे विकल्प खुले हैं...क्या मतलब निकाले हम इसका ?क्या चुल्लू भर पानी में डूब मरने का विकल्प भी नहीं खुला है?मुम्बई हमले को दो महीने होने को आए और हम जहाँ के तहां हैं...कुछ हुआ है तो फकत लफ्फाजियां..हमारे हुक्मरान कहते हैं कि युद्ध की कोई संभावना नही,अरे,कौन चाहता है कि युद्ध हो? पर, कि पाकिस्तान यूँ हमारी निर्लज्ज कायरता के कारण वाक् ओवर पा जाए यह भी तो नही चाहते...दुर्भाग्य है कि ,अपने जख्मों का हिसाब लेने के लिए हम उम्मीद करते हैं उस अमेरिका से जिसने ख़ुद पाक में आतंक को पाला-पोषा है और बेइंतहा पैसा खर्च करके उसे अपना प्रिय पिट्ठू बनाया है, हम उम्मीद करते हैं उस अमेरिका से जिसे किसी भी सूरत में पाक-अफगान सीमा पर पाकिस्तान की मदद की दरकार है.यदि भारत-पाक युद्ध होता है तो पाकिस्तान अपनी सेना वहां से हटा लेगा जो कि अमेरिका के लिए किसी अंधे कुंए में गिरने से भी बदतर होगा...ऐसे में अमेरिका से मदद की उम्मीद हमारी किस मानसिक दशा को दर्शाता है?आज अगर हमारे पास मुम्बई की घटना में पाक के शामिल होने के पुख्ता सबूत हैं तो अमेरिका के आगे झोली फैलाने का क्या मतलब?क्या हम इस लायक भी नहीं कि छोटे-मोटे हिसाब ख़ुद क्लियर कर लें?हम चीखते हैं कि सारे सबूत पूरे दुनिया को दिखायेंगे,किसे दिखायेंगे,उन्हें जो अपनी आँखे जानबूझकर खोलना ही नहीं चाहते.क्या आंखों देखी को भी प्रमाण की जरुरत होती है?दुनिया में कौन ऐसा अँधा है जिसे पाक की आतंकी करतूतों की ख़बर नही? हमारी पीढी के लिए यह शायद पहलीबार है जब पूरे देश में नेताओं के विरुद्ध रोष की ऐसी लहर उठी है,अगर फिरभी सब-कुछ ऐसे ही चलता रहा तो बहुत जल्द ये लहर सुनामी का रूप धर लेगी,जिसकी तबाही से हमारे हुक्मरान भी बच नहीं पायेंगे...
आलोक सिंह "साहिल"

शनिवार, 17 जनवरी 2009

इंसान ग़लतियों का पुतला है...

मुम्बई की घटना जहाँ एक तरफ़ पूरे देश को एकजुट करने के काम आई,वहीँ दूसरी तरफ़ इसने कई लोगों की राजनीतिक हैसियत भी चमकाई.जी हाँ, हम बात कर रहे हैं अल्पसंख्यक मामलों के केन्द्रीय मंत्री अब्दुल रहमान अंतुले की.साथ ही देश के अन्य छोटे-बड़े नेताओं की भी जिनकी राजनीतिक हैसियत सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्म और जाति पर ही टिकी हुई है.मुम्बई धमाके होते ही प्रधानमन्त्री से लगाए गृहमंत्री सभी ने संसद और संसद के बाहर आतंकवाद के विरूद्ध लम्बी-लम्बी लफ्फाजियां शुरू कर दीं.यह सबकुछ बेरोक-टोक चल ही रहा था कि अंतुले महोदय ने एटीएस के पूर्व प्रमुख हेमंत करकरे और अन्य दो अधिकारियों की मौत की अलग-अलग जांच की मांग कर दी.ये तीनो एक ही गाड़ी में बैठे हुए आतंकी हमले में मारे गए.अंतुले साहब का मानना था कि इन अधिकारियों की मौत हिंदू आतंकियों की साजिश है.क्योंकि करकरे मालेगाँव ब्लास्ट मामले में हिंदू नेत्री साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की भूमिका की जांच कर रहे थे .उनका बयान था- "वे (हेमंत करकरे) आतंकवाद के शिकार हुए या आतंकवादियों के साथ-साथ किसी और चीज के भी,मैं नहीं कह सकता......लेकिन उन्हें पता लगा था कि कुछ आतंकी गतिविधियों में गैर-मुस्लिम भी शामिल हैं.और आतंकवाद की जड़ में जाने वाला हर शख्स निशाने पर रहता है."पूरा का पूरा मामला ही एकदम से उलट गया.धमाके से तमतमाए कांग्रेसी नेता और प्रधानमन्त्री झट बचाव की मुद्रा में आ गए.यह बचाव आतंकवाद से देश का नहीं बल्कि ख़ुद का इस बयान से था.कहने लगे-"इंसान गलतियों का पुतला है,सो,हमें इस मामले को तूल नहीं देना चाहिए."उधर रोज ही जुबानी जमा खर्च में लगे रहने वाले राहुल गाँधी और उनकी माता सोनिया जी ने मानों मौन ही धारण कर लिया,वो तो भला हो पत्रकार साथियों का जो मुंह में अंगुली करके बयान ले ही लेते है,तो युवराज को कहना पड़ा "कांग्रेस के दुसरे बड़े नेता इसपर आपस में विचार-विमर्श करेंगे".इसके बाद हमेश कि तरह मसले को सुलझाने के लिए प्रणब मुखर्जी को आगे किया गया,पर जब फ़िर भी बात नहीं बनी तो गृहमंत्री पि.चिदंबरम ने पाँच पेज का एक लंबा चौडा स्पष्टीकरण पेश किया(वित्त बजट कि ही तरह नापा तुला और चतुराय से भरा हुआ) जिसमें उन्होंने कहा "करकरे द्वारा कि गई जाँच और उनकी मौत कि परिस्थितियों पर अंगुली उठाना ग़लत बात है और यह बहुत अफसोसजनक है."स्पष्टीकरण के आते ही अंतुले महोदय बेहयाई हँसी के साथ नरम पड़ गए पर शिवराज पाटिल कि तरह इस्तीफा देने कि गुस्ताखी से बचे रहे.दे भी कैसे सकते थे जब दिग्विजय सिंह जैसे उनके अनन्य सहयोगी कहते हैं "यदि अंतुले ने जांच के लिए कह भी दिया तो क्या ग़लत किया?अंतुले जैसे राष्ट्रवादी और धर्मनिरपेक्ष नेता को राष्ट्रविरोधी कहा जा रहा है."अब इस पूरे मामले को क्या कहा जाए?हिम्मत है तो कह दीजिये,सब वोट कि राजनीति है!!
आलोक सिंह "साहिल"

बुधवार, 31 दिसंबर 2008

ब्लॉगर साथियों माफ़ करना....

विलम्ब के लिए माफ़ी,क्योंकि तमाम ब्लॉगर साथियों ने जिस मुद्दे पर कोहराम मचा रखा है उसमें मैं पिछड़ गया.मैंने कल ढेरों ब्लॉग पढ़े और लगभग सभी में एक सी ही बातें और प्रतिक्रियाएं थीं.वो क्या थीं बताना अब जरुरी नहीं रह गया.सोंचा मैं भी इस जमात का हिस्सा बन जाऊं. कुछ लोगों ने इसे दुर्भाग्य करार दिया.उनका कहना था कि वैसे तो वे दिल्ली में नहीं थे या किन्ही कारणों से नहीं थे और अगर मौके पर मौजूद होते तो भी वे हिन्दयुग्म के उस वार्षिकोत्सव में नहीं जाते जहाँ,कलम के स्वामी माननीय राजेन्द्र यादव जी मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे और अपने आशीर्वचनों से सभी हिन्दी प्रेमियों को अभिभूत कर दिया.औरों का तो मैं नहीं जानता पर मेरे लिए यह परम सौभाग्य की बात थी कि मैं उस सफल आयोजन का हिस्सा था. बहुत बवाल मचा कि राजेंद्र जी ने ये कहा,वो कहा,वगैरह वगैरह..असल बात यह है कि ये सारा बवाल उनलोगों ने खड़ा किया जो ख़ुद मौके पर मौजूद नहीं थे और सुनी सुनाई बातों पर ही कान देते रह गए.अब इतनी बात हो ही गई तो ये उल्लेख कर ही देते हैं कि उन्होंने कहा क्या...वैसे तो उन्होंने काफ़ी कुछ कहा पर उसमें ढेर सारा हिन्दयुग्म के बारे में था,अब बात करते हैं उन बातों का जिन पर उत्पात मचा हुआ है,उन्होंने कहा-
-हमें १६वीं सदी के पहले के साहित्य को बक्सों में बंद कर देना चाहिए क्योंकि उनसे आज की पीढी,यूँ कहें हिन्दी को कोई लाभ नहीं.उन्होंने ये नहीं कहा कि आप बिल्कुल उन्हें मत पढ़ें,ये आप की मर्जी.अपने बृज,अवधी और ऐसी तमाम भाषाओँ सम्बन्धी लिप्सा को जमकर बुझाईये पर इस चक्कर में इस पीढी या खासकर आनेवाली पीढी को तो कम से कम मत ही तंग करिए जिसके लिए पैदा होते ही लक्ष्य थमा दिया जाता है कि तुम्हे अंग्रेजी आनी चाहिए,उससे निपटे तो फ्रेंच,जर्मन और ऐसी तमाम भाषाओँ को भी जानना है,इसी बीच हिन्दी तो सीखनी ही है.फ़िर क्योंकर बोझ लादना? वैसे भी एक तरफ़ तो हम आधुनिकता का दम भरते हैं दूसरी तरफ़ रुढियों में जीने का शौक भी पाल रखे हैं.मुश्किल है जी.दोगलापन केवल हमारे नेतागणों को ही शोभा देता है.- दूसरी बात ,वे मंच पर बैठे हुए,अपनी पाईप से धुंए उडा रहे थे,अपना-अपना तकाजा है इस बात पर,हो सकता है कि आप ख़ुद ही खुन्दस खाए हों,अरे भाई कभी सुट्टा के चक्कर में पाकेट ढीली हुई हो,तो इसके लिए आप दुसरे को क्यों नोचने पर अमादा हैं.मैं ये नहीं कहता कि नियम तोड़कर सार्वजनिक जगह पर धुम्रपान अच्छी बात है,पर इसके लिए आप कान तो मत ही खाईये .इसके लिए हमारे स्वस्थ्य मंत्री ही काफ़ी नहीं क्या?
- तीसरी बात उन्होंने कही कि अगर हिन्दयुग्म के लोग सिखाने को तैयार हों तो इस उम्र में भी मैं ब्लॉगर बनना पसंद करूँगा ,क्योंकि दोजख की जबान भी तो यही होगी,अब इसमें क्या ग़लत है भाई?आप ख़ुद दिनभर नेट पर बैठकर टिपटिपीयाते रहते हैं पर जब एक उम्रदराज आदमी वही चीज सीखना चाहता है तो आपत्ति क्यों? समझ से परे है,ये सबकुछ अजी ,अब इतने retrogessive होकर रहेंगे तो तकलीफ होगी,वक्त के साथ,पजामा छोड़कर सूट और खडाऊं छोड़कर स्टायलिश जुटे पहनना तो मंजूर कर लिया पर भाषा की बात आते ही रुढियों की दुहाई... माफ़ी चाहूँगा,एक बात और मैंने पढ़ी थी उसका उल्लेख करना भूल गया.कुछ साथियों ने ये लिखा था की वे ट्राल हैं,अजी ,क्या कम से कम भारत में राजेन्द्र यादव को इसकी जरुरत है ?उल्टा चोर कोतवाल को दांते,ख़ुद राजेन्द्र यादव के साथ जुड़कर थोडी शोहरत बटोर पाने की जुगत में जाने कब आप ख़ुद ट्राल हो गए और दोष देते हैं॥यादव जी को,ये तो बेनियाजी है गुरु...कुछ बुरी लग सकने वाली बातों और शब्दों के लिए सभी ब्लॉगर साथियों से फ़िर माफ़ी...
आलोक सिंह "साहिल"

गुरुवार, 11 दिसंबर 2008

मानवाधिकार: अब तो अंगुली करने से बाज आ जाओ...

किसी का कद बड़ा कहना,किसी के कद को कम कहना,

आता नहीं हमें गैर मोहतरम को मोहतरम कहना,

चलो चलें सरहद पर देश के लिए जान देने,

बहुत आसान है बंद कमरे में वंदे मातरम कहना!


इंसानी सभ्यता के शुरुआत के समय से ही अर्थात जब मानव ने जंगली जीवन छोड़कर सामाजिक जीवन में कदम रखा तब से ही प्राकृतिक रूप से उसने अपने अधिकारों और कर्तव्यों के दायरे बना लिए।धीरे धीरे सामाजिक जीवन का विस्तार हुआ,समाज ने एक व्यवस्थित आकार लेना शुरू किया तो, कुछ कायदे क़ानून भी बन गए,जिनके अनुसार कुछ काम करना अनिवार्य हो गए तो वहीँ कुछ काम वर्ज्य बन गए.इन सबके बीच हमें इंसानी(मानवीय) अधिकार भी मिले जो आगे चलकर मानवाधिकार बन गए.

वैसे तो हर देश अपने नागरिकों को तमाम सारे अधिकार देता है और लगभग हर जगह मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थायें भी हैं.भारतीय संविधान में भी नागरिकों को तमाम सारे अधिकार दिए गए हैं,विश्व में शायद सबसे अधिक क्रियाशील मानवाधिकार आयोग भी है.पर ११ सितम्बर की घटना के बाद जब अमेरिकी सैनिकों द्वारा "अबू गारेब जेल" सहित अनेक जगहों पर कैदियों के साथ दरिन्दगी भरे बर्ताव की बातें सामने आयीं,इज़राइल.पलाऊ और मार्शल आईलैंड जैसे देशों में बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार की बातें उभरकर आयीं तो वैश्विक स्तर पर ऐसे किसी संगठन की जरुरत महसूस हुई जो इन सब बातों की देख रेख करे कि कोई भी देश अपने बंदियों या अपने नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार न करे.इस तरह 19 जून 2006 को जेनेवा में युनाईटेड नेशन आफ ह्यूमन राईट्स काउन्सिल का गठन किया गया जिसमें भारत सहित ५३ देश शामिल हैं.हालाँकि इसे अपने गठन के समय से ही अमेरिका,इज़राइल,पलाऊ और मार्शल आईलैंड जैसे देशों का विरोध झेलना पड़ा. खैर,ये तो रही मानवाधिकार आयोग के गठन और इतिहास की बातें,अब आतें हैं भारतीय परिदृश्य में मानवाधिकार आयोग की जमीनी हकीकत पर.भारत में यों तो नागरिकों को संविधान के माध्यम से ढेरों अधिकार और कर्त्यव्य दिए गए हैं इनके संरक्षण के महत्व को देखते हुए अलग से एक स्वच्छंद मानवाधिकार आयोग का गठन भी किया गया,तमाम बड़े अधिकारों से लब्ध यह आयोग जब चाहे जिसे अपने "स्केल" पर नाप सकता है और नपने वाला छींक तक नहीं ले सकता क्योंकि जबतक वो छींकने की जुर्रत करे तबतक उसे निमोनिया हो चुका होगा.हालाँकि ये जरुरी नही कि हर बार ऐसा ही हो पर कमबख्त आंकडों पर किसका जोर है.दुर्भाग्य से इनकी सबसे अधिक गाज गिरती है उन पुलिसकर्मियों पर जो पूरे समाज पर अपनी गाज गिराते फिरते हैं.
एक आतंकी जब ढेरों लोगो को हताहत करने के बाद पुलिस की गोलियों का शिकार होता है तो गहरी नीद में सोया मानवाधिकार आयोग जाग उठता है,जब एक वहशी दरिंदा एक नाबालिग़ के साथ दुष्कर्म करने के बाद बड़ी बेरहमी से उसे मौत के घाट उतार देता है तो सबकुछ शांत रहता है पर जब पुलिस उसी दरिन्दे पर लाठियां चलने लगती है तो आयोग जाग उठता है,निठारी में अनेक बच्चे(जिनकी सही गिनती भी नहीं) एक हैवान की हैवानियत का शिकार हो गए,आयोग ऊँघता रहा पर जब वो हैवान पुलिसिया शिकंजे में आ फंसा तो आयोग जाग उठा,अभी हाल ही में मुम्बई को आतंकियों ने दहला दिया,तब शायद ही कोई महामानव रहा हो जिसका कलेजा न फटा हो पर ये धमाके भी आयोग की कुम्भकर्णी नीद तोड़ने में असफल रहा,पर पकड़े गए एक आतंकी कसाब ने पुलिस पर थर्ड डिग्री का आरोप क्या लगाया झट आयोग जाग उठा,कमाल है जनाब,.......ये कैसी नीद है आपकी? दुनिया के सारे धर्म सम्प्रदाय कहते हैं जो किसी मानव की हत्या करता है वो मानव नहीं रह जाता,या फ़िर आतंकियों का कोई जात धर्म नही होता,वे इंसान ही नहीं होते,क्योंकि कोई भी इंसान किसी की हत्या करने के पहले हज़ार दफे सोचेगा,पर क्या आतंकी ऐसा सोचते हैं कभी.....नहीं,तो...वे कैसे मानव?पर,असल मानव तो वही हैं क्योंकि हमारा आयोग हरदम उन्ही की हिमायत में लगा रहता है.एक हाल की घटना का जिक्र करना लाजिमी होगा,बीते दिनों दिल्ली के बाटला हाउस इलाके में कुछ तथाकथित आतंकी(तथाकथित इसलिए कि हमारे पूज्य,अमर सिंह,कपिल सिब्बल,अर्जुन सिंह जैसे लोग उन्हें आतंकी मानने से इनकार करते हैं ) पुलिस इनकाउन्टर में मारे गए,इस मुठभेड़ में पुलिस के जाबाज अधिकारी एम.सी.शर्मा शहीद हो गए,कुछ अन्य जवान भी घायल हो गए,कमाल तो देखिये जनाब,जो शहीद हुए उनका कोई नही पर जो दुर्दांत मारे गए उनके लिए आयोग वाले गला फाड़ने लगे(यहाँ हम नेताओं की बात नहीं कर रहे हैं,कम से कम इंसानी बिरादरी से तो उन्हें दूर ही रखिये). हालाँकि यह कहना एकतरफा बात होगी कि मानवाधिकार आयोग ने सिर्फ़ बेगुनाहों को ही सजा दिलाई है,कभी कभी उन्होंने गुनाहगारों को भी सजा दिलाई है,ये अलग बात है कि ऐसे आंकड़े ही दुर्लभ होते हैं. ऐसे में यह सवाल बड़ा ही लाजिमी हो जाता है कि क्या मानवाधिकार सिर्फ़ आतंकियों या अपराधियों के ही होते हैं,वीर जवानों,ईमानदार पुलिसकर्मियों या निर्दोष जनता के नहीं ?ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ भारत में ही आतंकियों और अपराधियों के मानवाधिकार की बातें होती हैं,पश्चिमी देशों में भी ऐसी बातें होती हैं.पर वहां दोगलापन नहीं होता,हमारी तरह वहां के मानवाधिकार वाले पुलिस की राह में रोड़े नहीं होते बल्कि उनके सहायक होते हैं,शायद यह भी एक वजह है कि अमेरिका में ११ सितम्बर के बाद आतंकवाद के नाम पर पटाखे तक नहीं फूटे,पर भारत में........खुदा,खैर करे.और दिनों की तो बात नहीं कर सकता पर औपचारिक रूप से घोषित मानवाधिकार दिवस पर यह उम्मीद करते हैं कि शायद अपना आयोग आम जनता और पुलिस के मानवाधिकारों को लेकर भी सचेत रहेगी और बिना वजह अंगुली करने से बाज आएगी.
आलोक सिंह "साहिल"

बुधवार, 19 नवंबर 2008

राजनीतिक नपुंसकता......चार चाँद लगाती रहेगी..?

डान फ़िल्म देखी है आपने?अरे वही जिसमें छोरा गंगा किनारे वाला बनारसी पान चबाते हुए बम्बई पहुँचता है और उसके कसीदे पढ़ते हुए गाता है 'ई है बम्बई नगरिया तू देख बबुआ'.जी हाँ,तब मुम्बई,बम्बई हुआ करती थी,उन्ही दिनों इडली,साम्भर,डोसा की बदबू से परेशान बम्बई का एक भूमिपुत्र हांथों में "छड़ी" लेकर पैदा हुआ और तमाम लुन्गीवालों को दक्षिण का रास्ता दिखा ताकि उसे वहां की राजनीति में एक रास्ता मिल जाए,मिला भी और वह छड़ी के बल पर ही किंगमेकर बन बैठा.तब बम्बई विकास के पहियों पर बहुत तेजी से दौड़ रही थी,बहुत विकास हुआ,इतना कि बम्बई,वर्णक्रम में दो कदम आगे बढ़कर 'ब' से 'म' पर आ गई और मुम्बई हो गई. अब वो "छड़ी" पुरानी हो गई थी,बिल्कुल घिसी हुई और कमजोर.तब उसे दरकार थी एक और नई छड़ी की पर उसे सँभालने के लिए नए,मजबूत हाँथ भी चाहिए थे.तब पुत्रमोह और बंटवारों के बीच वो "छड़ी" उसी भूमिपुत्र के भतीजे ने उठा ली,फर्क और भी आया,तब रुख दक्षिण का था अब उत्तर का. अब कहानी से आगे बढ़कर आज के मुद्दे पर आते हैं.आज राज ठाकरे(वही भतीजा) जैसा २००(सक्रिय) कार्यकर्ताओं की पार्टी चलाने वाला बन्दा मुम्बई से उत्तर भारतीयों को खदेड़ने पर अमादा है.कारण इसबार भी वही राजनीतिक हैसियत बना पाने की जद्दोजहद.इसके चलते देशभर में क्षेत्रीयता की आग लपटें लेने लगी,भाषा और क्षेत्र आधारित राजनीति सर उठाने लगी है. क्षेत्रीयता का जो राजनीतिक सबक मुम्बई से चल पड़ा है वह सरेआम उस लोकतंत्र की ऐसी तैसी कर रहा है,जिसके बूते आजादी के वक्त सरदार पटेल ने क्षेत्रीयता और बिखराव के तमाम रुझानों को नाकाम किया था. जब सरदार पटेल ने साढे पाँच सौ सूबों में बँटे हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरोने का काम शुरू किया तो तीन रियासतों से विरोध हुआ जिनमें एक जूनागढ़ भी था जो उन्ही के गृह प्रदेश गुजरात का हिस्सा था.जब वहां का निजाम साम दाम से नहीं माना तो उन्होंने सैनिक कार्रवाई से जूनागढ़ को गुजरात का अभिन्न हिस्सा बना दिया. अगर इस किस्से/घटना को ध्यान रखें तो यह सोचना बिल्कुल ग़लत है कि अगर केन्द्र सरकार चाहे तो भी इस क्षेत्रीयता की लपटों को शांत नहीं कर सकती.विडम्बना है कि आज देश का गृह मंत्री उसी महाराष्ट्र से आता है जहाँ क्षेत्रीयता की राजनीति चरम पर है.उस राज्य में सरकार भी उसी पार्टी की है जो केन्द्र में बैठी है,पर फ़िर भी कोई कुछ कहने को तैयार नहीं........अधिक दुखद/हास्यास्पद यह है कि आज जबकि सारा विश्व आर्थिक मंदी से जूझ रहा है वहीँ हमारा देश भाषा और क्षेत्रीयता की क्षुद्र राजनीति में व्यस्त है जिसे तक़रीबन दो दशक पहले दबा दिया गया था.सवाल यह कि,आख़िर कब तक इच्छाशक्ति की कमी से उपजी राजनीतिक नपुंसकता राजनेताओं की हैसियत में चार चाँद लगाती रहेगी,जाने कब तक?
आलोक सिंह "साहिल"

सोमवार, 3 नवंबर 2008

नसीरुद्दीन शाह, तालियाँ,कैमरों के फ्लैश और लोगों का हुजूम

जामिया मिल्लिया इस्लामिया का अंसारी ऑडिटोरियम दर्शकों से खचाखच भरा था,तमाम छोटे बड़े लोग आपनी-अपनी सीटों पर काबिज थे,कुछ, जिनको सीटें मयस्सर नहीं हो सकीं तो सीटों के नीचे कालीन पर ही बैठ लिए,बाकी कुछ जगह जहाँ कहीं बची थी उसे कैमरा वालों और खबरचियों ने भर रखा था.एक कौतूहल सा भर गया था पूरे वातावरण में.इसी बीच मंच पर हलकी सी कुछ सरसराहट हुई,क्षणेक के लिए व्याप्त सन्नाटे के बाद एकाएक पूरा ऑडिटोरियम शोर,तालियों और कैमरे के फ्लैश से भर उठा.मंच पर एक बेहद परिचित और संजीदा सा लगने वाला आदमकद आ चुका था,जिसके दोनों हाँथ बार बार लबों पर जाकर दर्शकों की तरफ़ फ्लाईंग किस उछालने में व्यस्त थे.तबतक पीछे बैठे किसी ने जोर से गला फाडा,"नसीर भाई,सलाम वालेकुम",शायद आवाज उनतक पहुँच नहीं सकी होगी,क्योंकि वे जवाब देने की बजाय मंच पर रखे सोफे पर पसर चुके थे. मंच पर पहले से मौजूद एक प्रस्तोता ने मिसेज किदवई को आवाज लगायी कि वे आयें और 'नसीरुद्दीन शाह' साहब का परिचय कराएं जिनके परिचय की जरुरत इस तीसरी दुनिया में तो कम से कम नहीं ही है.खैर,कुछ एक बेहद भारतीय सरीखे औपचारिकताओं के बाद नसीर साहब कमर कस चुके थे,क्योंकि आज उन्हें वहां दर्शकों से सीधे मुखातिब होकर उनकी तमाम जिज्ञासाओं को शांत करना था.इस मौके पर उन्होंने निजी जिंदगी से लगाये फिल्मों,थियेटर और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर जवाब दिए.उन्होंने कहा कि मैं मूलतः थियेटर का इन्सान नहीं हूँ पर मेरी पहली पसंद वही है क्योंकि इसमें सीधे दर्शकों से संवाद करने का मौका मिलता है(हालाँकि ऐसे,मुझे लोगों को फेस करने में असुविधा होती है).एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहाकि आजकल के नए निर्देशकों में काफ़ी क्षमता है और वे सामाजिक सरोकारों वाली फिल्में भी बना रहे हैं.बेशक,७० के दशक में भी सामाजिक सरोकारों वाली फिल्में बनीं लेकिन वे मास्टर पीस कत्तई नहीं थी.चूँकि उस समय के निर्माताओं में आलोचना सहने की क्षमता नहीं होती थी इसीलिए तथाकथित समांतर सिनेमा का अवसान हो गया.जबकि आजकल के निर्माताओं में प्रयोग करने का साहस और आलोचना सहने की क्षमता भी है.यही वजह है कि आज भारतीय सिनेमा फ़कत नाच गाने वाला एक ड्रामा नहीं रहा गया है बल्कि बाहर वाले भी इसे गंभीरता से लेने लगे हैं. जब एक छात्र ने फंडामेंटलिज्म की बात छेड़ी तो उनका कहना था फंडामेंटलिज्म वे लोग हैं जिनके पास अपने ख़ुद के विचार नहीं हैं.साथ ही उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि आज जरुरत इस बात की है कि इस्लाम को जानने के लिए कुरान को न सिर्फ़ पढ़ा जाए बल्कि सही तरीके से समझा जाए और इसके ग़लत इंटरप्रीटेसन से भी बचा जाए. जैसे जैसे नसीर साहब सवालों का जवाब देते गए लोगों में सवाल पूछने के लिए होड़ मचने लगी.ऑडिटोरियम में बैठे सभी के पास कुछ न कुछ पूछने के लिए था.पर वक्त की कमी ने इस सिलसिले को थमने पर मजबूर कर दिया.फ़िर आने का वादा कर नसीर साहब ने रुखसत ली और जाते जाते एक बार फ़िर दर्शकों की तरफ़ फ्लाईंग किस उछालकर उनके प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया.इस तरह जामिया मिल्लिया इस्लामिया और वहां उपस्थित लोगों के लिए वह दिन एक तारीख बन गया.
आलोक सिंह "साहिल"

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

खेल अंगुली करने का...

कुछ हफ्तों पहले जब मैंने "सियासत के कुत्ते" लिखा था तो तमाम दोस्तों ने निजी तौर पर शिकायत की कि यार,लिखा तो मजेदार है पर बहुत छोटे में लिखा,तो मैंने झट से जवाब दिया,ऐसी कोई बात नहीं है,मैं इसकी सीरिज बनाना चाहता हूँ और बहुत जल्द इसके अगले अंक के साथ आऊंगा,पर इस बात का ख्याल ही नही रहा,आज फ़िर ख्याल आया तो चला आया कुछ लेकर। खेल अंगुली करने का...
इंसानी फितरत भी अजीब होती है,कभी कभी हमारी महत्वाकांक्षाएं इतनी प्रबल हो जाती हैं कि हम किसी को भी अंगुली करने से गुरेज नहीं करते,चाहे वो हमारा कितना भी ख़ास या सहयोगी क्यों न हो?
जैसाकि आपको पता होगा,बीते कुछ महीने पहले हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में दो महान विचारों के गठबंधन के फलस्वरूप लोकतंत्र नामक तंत्र स्थापित हो पाया था।बड़ी खुशी की बात थी,हमारे लिए भी,अजी,हम आदर्श पड़ोसी जो ठहरे।पर महत्वाकांक्षा की जो तलवारें पहले से वहां मौजूद थीं,वो हमेशा इस नए तंत्र के उपर सरसराती रहीं।
उस वक्त,जरदारी साहब ने अपनी अयोग्यता को महानता में तब्दील करते हुए ख़ुद की जगह युसूफ रजा को प्रधानमंत्री बनवाया,तो नवाज साहब को लगा कि शायद जेल की चाहरदीवारी में रहते रहते उनमे कुछ महान गुणों ने जन्म ले लिया हो,लग गए साथ में।पर मांगो की तलवार सरसराती ही रही,जिन मांगों को लेकर जरदारी को सहयोग किया उनको पूरा करने में जरदारी की तरफ़ से हीला हवाली जारी रही। नवाज साहब इसी चक्कर में पड़े रहे और रोज सुबह शाम अपनी मांग दोहराते फिरते रहे,इस बीच जरदारी साहब, अमेरिका से अपना हिसाब किताब सेट करते रहे,साथ ही साथ नवाज साहब को गोली भी देते रहे।नवाज साहब भी बड़े भोले आदमी बेचारे गोली खाते रहे।इधर, जब जरदारी साहब को लगा कि अब अमेरिका से सेटिंग मुकम्मल हो गई है तो अपना पत्ता खोलते हुए कर दिया मुशर्रफ़ साहब को अंगुली,नवाज साहब खुश,उन्हें लगता रहा।जरदारी ने उनकी पहली मांग पूरी की है,माजरा तो कुछ और ही था।
सभी लोग खुशी मना रहे थे इसी बीच पीपीपी की तरफ़ से मुनादी हो गई कि राष्ट्रपति पद के लिए उनके उम्मीदवार जरदारी होंगे,यह सुनकर नवाज चपेटे में आ गए,उनको लगा कि भइया, कुछ गड़बड़ जरुर है,इसी के मद्देनजर उन्होंने अपनी दूसरी मांग को पूरा कराने की मुहिम तेज कर दी,पर महान अन्गुलिबाज का खिताब पा चुके जरदारी को पता था कि नवाज उनका कुछ नहीं उखाड़ सकते,आख़िर अमेरिका अब उनके साथ है।इधर,हैरान परेशान नवाज ने आनन् फानन में जरदारी का साथ छोड़कर अंगुली कर दी,पर टूटी हुई अंगुली भला जरदारी जैसा कमाल कहाँ से दिखाती? बेचारे नवाज,अब करें भी तो क्या,फ़िर वही पुराना काम............
अल्ला हो अकबर अल्लाह...
खुदा उनकी सुने, आमीन।

आलोक सिंह "साहिल"