सोमवार, 19 जनवरी 2009
क्षमा शोभती उस भुजंग को...
क्या हिन्दुस्तान की माँओं ने कायर और नामर्द जनना शुरू कर दिया है? नही॥ऐसा बिल्कुल नही,अब मुम्बई धमाकों के बाद सोनिया गाँधी का भाषण ही सुन लीजिये (आख़िर,वह भी एक मां हैं..) कि हम भारतीयों में बलिदान की उत्कृष्ट परम्परा रही है...क्या मायने हैं इसके ?क्या हम भारतीय सिर्फ़ गुमनाम मौत मरने के लिए ही पैदा होते हैं? चलिए दूसरे तरीके से बात करते हैं...अगर 26/11 की घटना मुम्बई की जगह वाशिंगटन में हुई होती तो क्या होता..पाकिस्तान अबतक इराक की शक्ल अख्तियार कर चुका होता..पर,भारत ऐसा नही कर पाता..आखिर क्या मज़बूरी आड़े आती है? सच कहते हैं पाकिस्तानी कि हमलोग बिल्कुल कायर और नामर्द।हमारा लहू कभी उबलता ही नही.हर एक घटना के बाद हमारे विदेशमंत्री एक ही राग अलापते हैं कि सारे विकल्प खुले हैं...क्या मतलब निकाले हम इसका ?क्या चुल्लू भर पानी में डूब मरने का विकल्प भी नहीं खुला है?मुम्बई हमले को दो महीने होने को आए और हम जहाँ के तहां हैं...कुछ हुआ है तो फकत लफ्फाजियां..हमारे हुक्मरान कहते हैं कि युद्ध की कोई संभावना नही,अरे,कौन चाहता है कि युद्ध हो? पर, कि पाकिस्तान यूँ हमारी निर्लज्ज कायरता के कारण वाक् ओवर पा जाए यह भी तो नही चाहते...दुर्भाग्य है कि ,अपने जख्मों का हिसाब लेने के लिए हम उम्मीद करते हैं उस अमेरिका से जिसने ख़ुद पाक में आतंक को पाला-पोषा है और बेइंतहा पैसा खर्च करके उसे अपना प्रिय पिट्ठू बनाया है, हम उम्मीद करते हैं उस अमेरिका से जिसे किसी भी सूरत में पाक-अफगान सीमा पर पाकिस्तान की मदद की दरकार है.यदि भारत-पाक युद्ध होता है तो पाकिस्तान अपनी सेना वहां से हटा लेगा जो कि अमेरिका के लिए किसी अंधे कुंए में गिरने से भी बदतर होगा...ऐसे में अमेरिका से मदद की उम्मीद हमारी किस मानसिक दशा को दर्शाता है?आज अगर हमारे पास मुम्बई की घटना में पाक के शामिल होने के पुख्ता सबूत हैं तो अमेरिका के आगे झोली फैलाने का क्या मतलब?क्या हम इस लायक भी नहीं कि छोटे-मोटे हिसाब ख़ुद क्लियर कर लें?हम चीखते हैं कि सारे सबूत पूरे दुनिया को दिखायेंगे,किसे दिखायेंगे,उन्हें जो अपनी आँखे जानबूझकर खोलना ही नहीं चाहते.क्या आंखों देखी को भी प्रमाण की जरुरत होती है?दुनिया में कौन ऐसा अँधा है जिसे पाक की आतंकी करतूतों की ख़बर नही? हमारी पीढी के लिए यह शायद पहलीबार है जब पूरे देश में नेताओं के विरुद्ध रोष की ऐसी लहर उठी है,अगर फिरभी सब-कुछ ऐसे ही चलता रहा तो बहुत जल्द ये लहर सुनामी का रूप धर लेगी,जिसकी तबाही से हमारे हुक्मरान भी बच नहीं पायेंगे...
आलोक सिंह "साहिल"
शनिवार, 17 जनवरी 2009
इंसान ग़लतियों का पुतला है...
आलोक सिंह "साहिल"
बुधवार, 31 दिसंबर 2008
ब्लॉगर साथियों माफ़ करना....
-हमें १६वीं सदी के पहले के साहित्य को बक्सों में बंद कर देना चाहिए क्योंकि उनसे आज की पीढी,यूँ कहें हिन्दी को कोई लाभ नहीं.उन्होंने ये नहीं कहा कि आप बिल्कुल उन्हें मत पढ़ें,ये आप की मर्जी.अपने बृज,अवधी और ऐसी तमाम भाषाओँ सम्बन्धी लिप्सा को जमकर बुझाईये पर इस चक्कर में इस पीढी या खासकर आनेवाली पीढी को तो कम से कम मत ही तंग करिए जिसके लिए पैदा होते ही लक्ष्य थमा दिया जाता है कि तुम्हे अंग्रेजी आनी चाहिए,उससे निपटे तो फ्रेंच,जर्मन और ऐसी तमाम भाषाओँ को भी जानना है,इसी बीच हिन्दी तो सीखनी ही है.फ़िर क्योंकर बोझ लादना? वैसे भी एक तरफ़ तो हम आधुनिकता का दम भरते हैं दूसरी तरफ़ रुढियों में जीने का शौक भी पाल रखे हैं.मुश्किल है जी.दोगलापन केवल हमारे नेतागणों को ही शोभा देता है.- दूसरी बात ,वे मंच पर बैठे हुए,अपनी पाईप से धुंए उडा रहे थे,अपना-अपना तकाजा है इस बात पर,हो सकता है कि आप ख़ुद ही खुन्दस खाए हों,अरे भाई कभी सुट्टा के चक्कर में पाकेट ढीली हुई हो,तो इसके लिए आप दुसरे को क्यों नोचने पर अमादा हैं.मैं ये नहीं कहता कि नियम तोड़कर सार्वजनिक जगह पर धुम्रपान अच्छी बात है,पर इसके लिए आप कान तो मत ही खाईये .इसके लिए हमारे स्वस्थ्य मंत्री ही काफ़ी नहीं क्या?
- तीसरी बात उन्होंने कही कि अगर हिन्दयुग्म के लोग सिखाने को तैयार हों तो इस उम्र में भी मैं ब्लॉगर बनना पसंद करूँगा ,क्योंकि दोजख की जबान भी तो यही होगी,अब इसमें क्या ग़लत है भाई?आप ख़ुद दिनभर नेट पर बैठकर टिपटिपीयाते रहते हैं पर जब एक उम्रदराज आदमी वही चीज सीखना चाहता है तो आपत्ति क्यों? समझ से परे है,ये सबकुछ अजी ,अब इतने retrogessive होकर रहेंगे तो तकलीफ होगी,वक्त के साथ,पजामा छोड़कर सूट और खडाऊं छोड़कर स्टायलिश जुटे पहनना तो मंजूर कर लिया पर भाषा की बात आते ही रुढियों की दुहाई... माफ़ी चाहूँगा,एक बात और मैंने पढ़ी थी उसका उल्लेख करना भूल गया.कुछ साथियों ने ये लिखा था की वे ट्राल हैं,अजी ,क्या कम से कम भारत में राजेन्द्र यादव को इसकी जरुरत है ?उल्टा चोर कोतवाल को दांते,ख़ुद राजेन्द्र यादव के साथ जुड़कर थोडी शोहरत बटोर पाने की जुगत में जाने कब आप ख़ुद ट्राल हो गए और दोष देते हैं॥यादव जी को,ये तो बेनियाजी है गुरु...कुछ बुरी लग सकने वाली बातों और शब्दों के लिए सभी ब्लॉगर साथियों से फ़िर माफ़ी...
आलोक सिंह "साहिल"
गुरुवार, 11 दिसंबर 2008
मानवाधिकार: अब तो अंगुली करने से बाज आ जाओ...
किसी का कद बड़ा कहना,किसी के कद को कम कहना,
आता नहीं हमें गैर मोहतरम को मोहतरम कहना,
चलो चलें सरहद पर देश के लिए जान देने,
बहुत आसान है बंद कमरे में वंदे मातरम कहना!
इंसानी सभ्यता के शुरुआत के समय से ही अर्थात जब मानव ने जंगली जीवन छोड़कर सामाजिक जीवन में कदम रखा तब से ही प्राकृतिक रूप से उसने अपने अधिकारों और कर्तव्यों के दायरे बना लिए।धीरे धीरे सामाजिक जीवन का विस्तार हुआ,समाज ने एक व्यवस्थित आकार लेना शुरू किया तो, कुछ कायदे क़ानून भी बन गए,जिनके अनुसार कुछ काम करना अनिवार्य हो गए तो वहीँ कुछ काम वर्ज्य बन गए.इन सबके बीच हमें इंसानी(मानवीय) अधिकार भी मिले जो आगे चलकर मानवाधिकार बन गए.
वैसे तो हर देश अपने नागरिकों को तमाम सारे अधिकार देता है और लगभग हर जगह मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थायें भी हैं.भारतीय संविधान में भी नागरिकों को तमाम सारे अधिकार दिए गए हैं,विश्व में शायद सबसे अधिक क्रियाशील मानवाधिकार आयोग भी है.पर ११ सितम्बर की घटना के बाद जब अमेरिकी सैनिकों द्वारा "अबू गारेब जेल" सहित अनेक जगहों पर कैदियों के साथ दरिन्दगी भरे बर्ताव की बातें सामने आयीं,इज़राइल.पलाऊ और मार्शल आईलैंड जैसे देशों में बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार की बातें उभरकर आयीं तो वैश्विक स्तर पर ऐसे किसी संगठन की जरुरत महसूस हुई जो इन सब बातों की देख रेख करे कि कोई भी देश अपने बंदियों या अपने नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार न करे.इस तरह 19 जून 2006 को जेनेवा में युनाईटेड नेशन आफ ह्यूमन राईट्स काउन्सिल का गठन किया गया जिसमें भारत सहित ५३ देश शामिल हैं.हालाँकि इसे अपने गठन के समय से ही अमेरिका,इज़राइल,पलाऊ और मार्शल आईलैंड जैसे देशों का विरोध झेलना पड़ा. खैर,ये तो रही मानवाधिकार आयोग के गठन और इतिहास की बातें,अब आतें हैं भारतीय परिदृश्य में मानवाधिकार आयोग की जमीनी हकीकत पर.भारत में यों तो नागरिकों को संविधान के माध्यम से ढेरों अधिकार और कर्त्यव्य दिए गए हैं इनके संरक्षण के महत्व को देखते हुए अलग से एक स्वच्छंद मानवाधिकार आयोग का गठन भी किया गया,तमाम बड़े अधिकारों से लब्ध यह आयोग जब चाहे जिसे अपने "स्केल" पर नाप सकता है और नपने वाला छींक तक नहीं ले सकता क्योंकि जबतक वो छींकने की जुर्रत करे तबतक उसे निमोनिया हो चुका होगा.हालाँकि ये जरुरी नही कि हर बार ऐसा ही हो पर कमबख्त आंकडों पर किसका जोर है.दुर्भाग्य से इनकी सबसे अधिक गाज गिरती है उन पुलिसकर्मियों पर जो पूरे समाज पर अपनी गाज गिराते फिरते हैं.
एक आतंकी जब ढेरों लोगो को हताहत करने के बाद पुलिस की गोलियों का शिकार होता है तो गहरी नीद में सोया मानवाधिकार आयोग जाग उठता है,जब एक वहशी दरिंदा एक नाबालिग़ के साथ दुष्कर्म करने के बाद बड़ी बेरहमी से उसे मौत के घाट उतार देता है तो सबकुछ शांत रहता है पर जब पुलिस उसी दरिन्दे पर लाठियां चलने लगती है तो आयोग जाग उठता है,निठारी में अनेक बच्चे(जिनकी सही गिनती भी नहीं) एक हैवान की हैवानियत का शिकार हो गए,आयोग ऊँघता रहा पर जब वो हैवान पुलिसिया शिकंजे में आ फंसा तो आयोग जाग उठा,अभी हाल ही में मुम्बई को आतंकियों ने दहला दिया,तब शायद ही कोई महामानव रहा हो जिसका कलेजा न फटा हो पर ये धमाके भी आयोग की कुम्भकर्णी नीद तोड़ने में असफल रहा,पर पकड़े गए एक आतंकी कसाब ने पुलिस पर थर्ड डिग्री का आरोप क्या लगाया झट आयोग जाग उठा,कमाल है जनाब,.......ये कैसी नीद है आपकी? दुनिया के सारे धर्म सम्प्रदाय कहते हैं जो किसी मानव की हत्या करता है वो मानव नहीं रह जाता,या फ़िर आतंकियों का कोई जात धर्म नही होता,वे इंसान ही नहीं होते,क्योंकि कोई भी इंसान किसी की हत्या करने के पहले हज़ार दफे सोचेगा,पर क्या आतंकी ऐसा सोचते हैं कभी.....नहीं,तो...वे कैसे मानव?पर,असल मानव तो वही हैं क्योंकि हमारा आयोग हरदम उन्ही की हिमायत में लगा रहता है.एक हाल की घटना का जिक्र करना लाजिमी होगा,बीते दिनों दिल्ली के बाटला हाउस इलाके में कुछ तथाकथित आतंकी(तथाकथित इसलिए कि हमारे पूज्य,अमर सिंह,कपिल सिब्बल,अर्जुन सिंह जैसे लोग उन्हें आतंकी मानने से इनकार करते हैं ) पुलिस इनकाउन्टर में मारे गए,इस मुठभेड़ में पुलिस के जाबाज अधिकारी एम.सी.शर्मा शहीद हो गए,कुछ अन्य जवान भी घायल हो गए,कमाल तो देखिये जनाब,जो शहीद हुए उनका कोई नही पर जो दुर्दांत मारे गए उनके लिए आयोग वाले गला फाड़ने लगे(यहाँ हम नेताओं की बात नहीं कर रहे हैं,कम से कम इंसानी बिरादरी से तो उन्हें दूर ही रखिये). हालाँकि यह कहना एकतरफा बात होगी कि मानवाधिकार आयोग ने सिर्फ़ बेगुनाहों को ही सजा दिलाई है,कभी कभी उन्होंने गुनाहगारों को भी सजा दिलाई है,ये अलग बात है कि ऐसे आंकड़े ही दुर्लभ होते हैं. ऐसे में यह सवाल बड़ा ही लाजिमी हो जाता है कि क्या मानवाधिकार सिर्फ़ आतंकियों या अपराधियों के ही होते हैं,वीर जवानों,ईमानदार पुलिसकर्मियों या निर्दोष जनता के नहीं ?ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ भारत में ही आतंकियों और अपराधियों के मानवाधिकार की बातें होती हैं,पश्चिमी देशों में भी ऐसी बातें होती हैं.पर वहां दोगलापन नहीं होता,हमारी तरह वहां के मानवाधिकार वाले पुलिस की राह में रोड़े नहीं होते बल्कि उनके सहायक होते हैं,शायद यह भी एक वजह है कि अमेरिका में ११ सितम्बर के बाद आतंकवाद के नाम पर पटाखे तक नहीं फूटे,पर भारत में........खुदा,खैर करे.और दिनों की तो बात नहीं कर सकता पर औपचारिक रूप से घोषित मानवाधिकार दिवस पर यह उम्मीद करते हैं कि शायद अपना आयोग आम जनता और पुलिस के मानवाधिकारों को लेकर भी सचेत रहेगी और बिना वजह अंगुली करने से बाज आएगी.
आलोक सिंह "साहिल"
शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008
सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी ऐय्याशियाँ....
बीते दिनों देश ने बड़े वीभत्स दृश्य देखे,ह्रदय को चीर देने वाली चीखें और गुहार सुनीं,जो एक असामान्य बात थी (जो कि अब सामान्य बात हो चुकी है) और उसके बाद एक बेहद सामान्य प्रक्रिया हुई (जो कि इस सरकार में अब तक असामान्य थी),इस्तीफों का दौर शुरू हुआ,बड़े-बड़े नपे या नापे गए।पर समस्या यह है कि जिन तथाकथित नैतिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए इस्तीफे दिए गए उनको कितना नैतिक माना जाए?
क्या देश,पूर्व गृहमंत्री शिवराज पाटिल को इतना काबिल मानता है कि उनके इस्तीफे को सम्मान की निगाह से देखे और उनकी कर्तव्य-परायणता की गाथा गढे?....शायद नहीं,बिल्कुल नहीं....बल्कि यह हास्यास्पद ही है कि एक ऐसा व्यक्ति नैतिक इस्तीफा देता है जिसे नैतिक जिम्मेदारियों का ककहरा तक नहीं पता,उसे पता है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी ऐय्याशियाँ.... नैतिक इस्तीफा देना एक बड़ी घटना होती है जिसका मतलब होता है कि आपने प्राणपण से कोशिश की पर कीन्ही कारणों से आप असफल रहे या फ़िर किसी घटना ने आपको नैतिक रूप से झकझोर दिया हो।पर इनमें से कोई भी शर्त शिवराज पाटिल पर लागू नहीं होती,ये बात कोई भी भारतीय दावे से कह सकता है.बल्कि उन्होंने तो उस बेहद सम्मानीय और स्वस्थ परम्परा की धज्जियाँ उडायीं जिसकी शुरुआत "लाल बहादुर शास्त्री" (रेल मंत्री के रूप में) जैसे महान लोगों ने की थी.ऐसे में इन इस्तीफों का क्या करें? बात असल अभी भी ज्यों की त्यों है,अभी भी पकिस्तान आतंकियों को बेरोक टोक पैदा करता जा रहा है,सुरक्षा तंत्र की स्थति किसी से छिपी नही है(जवानो की वीरता पर किसी को शक नही,पर तंत्र...),ऐसे में आज जो मुम्बई में हुआ कल कहीं और होगा,इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.तो क्या हम हाँथ पर हाँथ धरे बैठे रहे और इन्तजार करें अगली ऐसी ही किसी घटना का?क्या किसी बड़ी घटना की प्रतिक्रिया में कुछ नामुराद इस्तीफे ही काफ़ी हैं?
इसका जवाब राजनेताओं को ढूँढना था,जो की हो चुका.
अब वक्त है यह सोचने का कि इन राजनेताओं का क्या करें,और यह काम जनता को करना है...
आलोक सिंह "साहिल"
शनिवार, 29 नवंबर 2008
कहाँ है राज ठाकरे और उसकी बहादुर सेना...
आलोक सिंह "साहिल"
कहाँ है राज ठाकरे और उसकी बहादुर सेना...
आलोक सिंह "साहिल"
बुधवार, 19 नवंबर 2008
राजनीतिक नपुंसकता......चार चाँद लगाती रहेगी..?
आलोक सिंह "साहिल"
सोमवार, 3 नवंबर 2008
नसीरुद्दीन शाह, तालियाँ,कैमरों के फ्लैश और लोगों का हुजूम
आलोक सिंह "साहिल"
शनिवार, 27 सितंबर 2008
जो कागज़ के फूल सजे हों....
आज से लगभग ६ दशक पहले १४ सितम्बर को जब हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया तब राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने बड़े दिल से यह घोषणा की थी-
है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी,
हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी.
पर आज भी ये घोषणा साकार रूप लेने की बाट जोह रहा है.हमेशा से ही हिन्दी हमारे बोलचाल और संपर्क की भाषा रही है पर आज के समय में हिन्दी केवल उन लोगों की भाषा बनकर रह गई है जिन्हें या तो अंग्रेजी आती नहीं या फ़िर हिन्दी से कुछ ज्यादा ही लगाव है,ये वही लोग हैं जिन्हें पिछड़ा और सिरफिरा जैसे नाम दिए जाते हैं।
आज जब हमारा देश हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है,ऐसे में हमारी हिन्दी राजभाषा से राष्ट्रभाषा के सफर में कहाँ पिछड़ गई?क्या कुछ कमी रह गई इसके विकास में? आज दुनिया में जहाँ सभी विकसित और विकासशील देश अपनी भाषाओँ में काम करके दिनोंदिन प्रगति कर रहे हैं वहीँ हमारे देश में हिन्दी में काम करने से ही गुरेज किया जाता है,अधिकांश उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षण का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही है.ऐसे में ज्यादा कुछ अच्छा उम्मीद करना ही बेमानी है.आज हिन्दी मिडिया के प्रसार ने काफ़ी हद तक लोगों को हिन्दी तक पहुँचने में अहम् भूमिका निभाई है इसी तरह अगर प्रशासनिक स्तर के कार्य भी हिन्दी में होते तो शायद सरकारें,आमजनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह होतीं.पर.......
एक बड़ी अजीब बात है कि हमारे देश के संविधान का प्रारूप ही अंग्रेजी में बना,संविधान सभा की बहस का अधिकांश हिस्सा भी अंग्रेजी में ही प्रकाशित हुआ,यहाँ तक कि हिन्दी के प्रबल पक्षधर भी अंग्रेजी में ही बरसे.शायद यही कारण है कि आजादी के ६१ सालों बाद भी भारत का विधितंत्र अंग्रेजी और उर्दू में ही चलता है.यहाँ तक कि देश के उच्चतम और उच्च न्यायालयों का सारा काम सारा अंग्रेजी में ही होता है ऐसे में आमजनता कानूनी दांवपेंचों से वाकिफ नहीं हो पाती और कानून के दलदल में फंसती जाती है।
अंग्रेजी के कारण हमारा बहुत नुकसान हुआ तो उम्मीद से कहीं ज्यादा लाभ भी मिला इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि देश में हिन्दी का पठन पाठन ही बंद कर दिया जाए,उससे नफरत किया जाए,बल्कि उसे उतना ही महत्व दिया जाए कि हमारी हिन्दी भी बची रहे.आज जब पश्चिम के देशों में भी हिन्दी का डंका बज रहा है,यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को सातवीं भाषा के रूप में मान्यता देने की कवायद भी चल रही है,ऐसे में अपने ही देश में हिन्दी की उपेक्षा देखकर एक शेर याद आता है-
सच पूछो तो यूँ लगती है हिन्दी हिंदुस्तान में,
कागज के फूल सजे हों शीशे के गुलदान में.
आलोक सिंह "साहिल"
शुक्रवार, 26 सितंबर 2008
इस्लामी आतंकवाद....अधिक खतरनाक कौन?
जिस तरह इस्लामी आतंकवाद ने देश में असुरक्षा और दहशत का माहौल पैदा कर रखा है,उसी तरह इस नए वाले ने भी देश में रहने वाले एक खास संप्रदाय/धर्म के लोगों को खौफजदा कर रखा है,पहला वाला भी एक धर्म की आड़ में चलाया जा रहा है,तो दूसरे के मूल में भी कहीं न कहीं धर्म ही है।थोड़ा फर्क है दोनों में तो यह कि पहला वाला अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा किया जा रहा है तो दूसरा बहुसंख्यकों द्वारा,पहले वाले में आतंक फैलाने वाला संप्रदाय ख़ुद ही सकते में है तो दूसरे वाले में आतंक के शिकार संप्रदाय के लोग।
अब अगर नियम कानून,समाजशास्त्र आदि की बात करें तो आतंकवाद के सन्दर्भ में यह बात बहुत अजीब नहीं लगती कि एक अल्पसंख्यक समुदाय के लोग इसमें शामिल हों क्योंकि हो सकता है बहुसंख्यक नीत नीतियों ने किसी रूप में उनके साथ ज्यादती की हो या उनकी भावनाएं आहत हुई हों,ऐसा सम्भव है(जरुरी नहीं कि ऐसा ही होना चाहिए),शायद यही आतंकवाद को जन्म देने वाले कारक हैं,पर जब बहुसंख्यक समुदाय के लोग ऐसा करने लग जायें तो समझ नहीं आता कि क्या कारण हो सकता है,या कैसे इनसे बचा जाए?
अगर बात समझ नहीं आई तो पिछले कुछ समय से इसाई संप्रदाय के लोगो और उनके आस्था के केन्द्र चर्चों पर होने वाले लगता हमलों को जेहन में लाईये।अरे,दूर कहाँ जा रहे हैं,यहीं उडीसा,कर्नाटका वगैरह कहीं भी चले जाईये.
आखिरी सवाल- अब आखिरी सवाल यह है कि अधिक खतरनाक कौन,जिसे नाम दे दिया गया है वो या जो अभी भी बेनाम है?और क्या दूसरे वाले को भी एक नाम की दरकार है?
आलोक सिंह "साहिल"
शुक्रवार, 19 सितंबर 2008
मुठभेड़ चल रही,दो मारे गए,एक गिरफ्तार
आखिरकार दिल्ली पुलिस की मेहनत रंग लायी और जोरदार/मुकम्मल मुखबिरी ने पहुँचा दिया दिल्ली पुलिस को आतंकियों की गिरेबान तक।कई दिनों से चल रही खोजबीन और निशानदेही के परिणाम स्वरुप जब पुलिस को पता चला कि आतंकी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के बगल/पीछे जामिया नगर और बाटला हाउस इलाकों में छिपे हैं तो बेहद व्यस्थित तरीके से पूरी तयारी केसाथ आज सुबह ११ बजे पुलिस ने बाटला हाउस पर धावा बोला,दिल्ली पुलिस का साथ देने के लिए एन एस जी कि टीम भी पहुँच चुकी है। अभी तक इन धमाकों के तथाकथित मास्टर माईंड तौकीर का दाहिना हाँथ कहा जाने वाला अतीक तथा एक और आतंकी सैफ ढेर किए जा चुके हैं। जबकि जामिया नगर के खलीला मस्जिद के पास स्थित मकान नम्बर एल-१८ में छिपे आतंकियों से पुलिस की मुठभेड़ जारी है,एक अन्य सफलता के तौर पर एक आतंकी की गिरफ्तारी भी हो गई है।उम्मीद कि जा सकती है पूर्व कि घटनाओं से सबक लेते हुए दिल्ली पुलिस ने जो मेहनत कि है वो अंजाम तक जायेगी.
आलोक सिंह "साहिल"
शनिवार, 13 सितंबर 2008
धमाकों ने फ़िर किया बेहाल
आज शनिवार का दिन है,वीकेन्ड का पहला दिन।हफ्ते भर के काम काम के बोझ से थके लोगों के लिए राहत की साँस लेने का दिन।हफ्ते भर की भागमभाग से उबरकर मस्ती करने का दिन।वो दिन जब लोग अपने घरों से बाहर निकलकर सपरिवार घूमने-फिरने और मार्केटिंग करने का प्लान बनाते हैं,पर शायद इस देश के दुश्मनों को हमारा सुकून रास नहीं आता।अभी पिछले दिनों पूरे देश के विभिन्न जगहों पर हुए धमाकों के चोट से लोग उबर भी नहीं पाए थे कि इन नामुरादों कर डाला एकबार फ़िर धमाका और इस बार निशाने पर थे राजधानी दिल्ली के वो खास जगह जहाँ छुट्टी के दिनों में खासी भीड़ रहती है।
ये जगह हैं
१।करोल बाग का गफ्फार मार्केट
२।ग्रेटर कैलाश-१ का एम् ब्लाक
३।कनाट प्लेस के पास बारहखम्बा रोड और सेन्ट्रल पार्क।
अभी तक पुष्ट तौर पर किसी के हताहत होने की सूचना तो नही मिली है लेकिन कम से कम १० से अधिक लोगों के मारे जाने की आशंका है.पहला धमाका करोल बाग़ के गफ्फार मार्केट में हुआ जहाँ एक ऑटो के सीएनजी सिलिंडर फटने से धमाका हुआ.आशंका जताई जा रही थी कि शायद सिलिंडर फटने से मामूली विस्फोट हुआ हो,तभी ग्रेटर कैलाश-१ में धमाका हो गया,लोग कुछ समझ पाते तबतक अगला धमाका बारहखम्बा रोड पर गोपाल दास बिल्डिंग के पास हो चुका था.पुलिस मौके पर पहुँची घायलों को अस्पतालों तक ले जाने की कवायद में लगी ही हुई थी कि कनाट प्लेस के सेन्ट्रल पार्क और ग्रेटर कैलाश में धमाके हो गए।
ध्यान रहे कि कनाट प्लेस पर जहाँ धमाका हुआ वह मेट्रो स्टेसन के बिल्कुल करीब की जगह है,इससे यह साफ़ हो जाता है कि धामको का मकसद कितना भयानक था अभी पूरा पुलिस विभाग घायलों को अस्पतालों तक पहुँचने में लगा है.दुआ की जा सकती है कि अब धमाकों का सिलसिला कम से कम आज तक के लिए थम जाए ताकि घायलों को उपचार के लिए अस्पतालों तक पहुँचाया जा सके.
तक यह बात पता नहीं लग पाई है कि इस सीरियल ब्लास्ट का जिम्मेदार कौन है, पर इतने सालों के अनुभवों का ख्याल रखते हुए अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल काम नहीं.असल मुश्किल है उन नामुरादों को समझाना कि इंसानी खून बहाकर लोगो में दहशत पैदा कर के कोई भी खुशी हासिल नहीं की जा सकती.काश! कि उन्हें समझ आ जाता.
आलोक सिंह "साहिल"
शुक्रवार, 12 सितंबर 2008
१४४० मिनट....११३२ शिलाएं!!
आलोक सिंह "साहिल"
बुधवार, 3 सितंबर 2008
लालू का तमाशा:धूमिल हुई बाढ़ पीडितों की आशा
आज बाढ़ ने बिहार को बुरी तरह झकझोर कर रखा हुआ है।16 जिलों के 20 लाख से अधिक लोग सीधे तौर पर बाढ़ की चपेट में हैं,20 हजार से अधिक लोग लापता है,ढाई लाख एकड़ से अधिक की कृषि भूमि खाक हो चुकी है,राहत कैम्पों की हालत खस्ता है,लोग पत्ते खाकर जहरीले जानवरों के बीच जिंदगी को सहेज पाने की जद्दोजहद कर रहे हैं,और इस बीच वहां पैदा हो रहे बच्चे और उनकी माएं मूलभूत जरूरतों से भी महरूम हैं।
ऐसे हालात में,सेना और नौसेना के जवान प्राणपण से लोगों को बचाने में लगे हुए हैं,सीआरपीऍफ़ के जवान एक दिन की तनख्वाह दे रहे हैं,सार्वजनिक क्षेत्र की 12 कम्पनियाँ 30 करोड़ दे रही हैं,पंजाब,हरियाणा से लगाए देश के कोने कोने से सहायत मिल रही है,यहाँ तक कि सरहद के पार से भी मदद के लिए हाँथ आगे आ रहे हैं।
ऐसे में बिहार के अपने खासमखास,अपने राजनीतिक गोलगप्पे में बाढ़ का चटपटा पानी भरकर बेचने में लगे हुए हैं।
कहते हैं,राजनीति जो न कराये कम है।
एक तरफ़ जहाँ बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव,राहत कार्यों में देरी को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर दोषारोपण कर रहे हैं,वहीँ नीतीश कुमार,लालू पर बाढ़ की राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं.नेताओं के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं.पर,नैतिकता की पराकाष्ठा तो तब पार हो गई जब बाढ़-ग्रस्त बिहार के दौरे पर गए लालू यादव ने लग्जरी गाड़ी में बैठकर भूखे-नंगे बच्चों को 500 का नोट थमाकर लालू जिंदाबाद के नारे लगवाए।इसे क्या क्या कहा जा सकता है?
सच पूछिये तो,बाढ़ पीडितो के दर्द को यूँ तमाशा का रूप देना लालू जैसे बड़े नेताओं के बस की ही बात है.पर सवाल असल यह है कि वहां की जनता आस लगाये तो किससे,जब उनके अपने ही उनके ग़मों का माखौल उड़ाने पर अमादा हैं?
आलोक सिंह "साहिल"
मंगलवार, 26 अगस्त 2008
खेल अंगुली करने का...
इंसानी फितरत भी अजीब होती है,कभी कभी हमारी महत्वाकांक्षाएं इतनी प्रबल हो जाती हैं कि हम किसी को भी अंगुली करने से गुरेज नहीं करते,चाहे वो हमारा कितना भी ख़ास या सहयोगी क्यों न हो?
जैसाकि आपको पता होगा,बीते कुछ महीने पहले हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में दो महान विचारों के गठबंधन के फलस्वरूप लोकतंत्र नामक तंत्र स्थापित हो पाया था।बड़ी खुशी की बात थी,हमारे लिए भी,अजी,हम आदर्श पड़ोसी जो ठहरे।पर महत्वाकांक्षा की जो तलवारें पहले से वहां मौजूद थीं,वो हमेशा इस नए तंत्र के उपर सरसराती रहीं।
उस वक्त,जरदारी साहब ने अपनी अयोग्यता को महानता में तब्दील करते हुए ख़ुद की जगह युसूफ रजा को प्रधानमंत्री बनवाया,तो नवाज साहब को लगा कि शायद जेल की चाहरदीवारी में रहते रहते उनमे कुछ महान गुणों ने जन्म ले लिया हो,लग गए साथ में।पर मांगो की तलवार सरसराती ही रही,जिन मांगों को लेकर जरदारी को सहयोग किया उनको पूरा करने में जरदारी की तरफ़ से हीला हवाली जारी रही। नवाज साहब इसी चक्कर में पड़े रहे और रोज सुबह शाम अपनी मांग दोहराते फिरते रहे,इस बीच जरदारी साहब, अमेरिका से अपना हिसाब किताब सेट करते रहे,साथ ही साथ नवाज साहब को गोली भी देते रहे।नवाज साहब भी बड़े भोले आदमी बेचारे गोली खाते रहे।इधर, जब जरदारी साहब को लगा कि अब अमेरिका से सेटिंग मुकम्मल हो गई है तो अपना पत्ता खोलते हुए कर दिया मुशर्रफ़ साहब को अंगुली,नवाज साहब खुश,उन्हें लगता रहा।जरदारी ने उनकी पहली मांग पूरी की है,माजरा तो कुछ और ही था।
सभी लोग खुशी मना रहे थे इसी बीच पीपीपी की तरफ़ से मुनादी हो गई कि राष्ट्रपति पद के लिए उनके उम्मीदवार जरदारी होंगे,यह सुनकर नवाज चपेटे में आ गए,उनको लगा कि भइया, कुछ गड़बड़ जरुर है,इसी के मद्देनजर उन्होंने अपनी दूसरी मांग को पूरा कराने की मुहिम तेज कर दी,पर महान अन्गुलिबाज का खिताब पा चुके जरदारी को पता था कि नवाज उनका कुछ नहीं उखाड़ सकते,आख़िर अमेरिका अब उनके साथ है।इधर,हैरान परेशान नवाज ने आनन् फानन में जरदारी का साथ छोड़कर अंगुली कर दी,पर टूटी हुई अंगुली भला जरदारी जैसा कमाल कहाँ से दिखाती? बेचारे नवाज,अब करें भी तो क्या,फ़िर वही पुराना काम............
अल्ला हो अकबर अल्लाह...
खुदा उनकी सुने, आमीन।
आलोक सिंह "साहिल"
बुधवार, 20 अगस्त 2008
...शोहरत की तलब...
मंगलवार, 19 अगस्त 2008
एक आस,खुशहाली की...
आलोक सिंह "साहिल"
शनिवार, 16 अगस्त 2008
......स्वंतत्रता दिवस मुबारक
आलोक सिंह "साहिल"
बुधवार, 13 अगस्त 2008
.....मुझको अब महरूम ना कर.
.....मुझको अब महरूम ना कर.
गुरबत की बात हमसे ना छेडो दिलबर,
आँख मेरे रोये हैं विसाल में भी।
बावस्ता रहा हूँ मैं चाँद खुशियों से ही,
तन्हाई की अब रात ना दिखाओ दिलबर।
तेरी हर एक हँसी में घुला है मेरे जिगर का लहू,
मेरे जिगर के टुकड़े को यूँ नीलाम ना कर।
तुम हँसी हो बहुत छुपाने की नहीं बात सनम,
तेरे विसाल को तडपता रहा हूँ सदियों से।
मेरा ईमान भी लुट जाए तो जाने दो सनम,
तेरी बंदगी से मुझको अब महरूम ना कर.
आलोक सिंह "साहिल"