शनिवार, 27 सितंबर 2008

जो कागज़ के फूल सजे हों....

14 सितम्बर हमारे देश में हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है.हरसाल की तरह इस साल भी हिन्दी दिवस आया और आकर चला गया.हरसाल की तरह इस बार भी हिन्दी का जन्म दिवस बड़ी धूम धाम से मना,मसलन,हिन्दी में काम को बढावा देने वाली खोखली घोषनाएँ,भिन्न भिन्न तरह के सम्मलेन,आयोजन वगैरह वगैरह.पर असल सवाल इसबार भी अनसुलझा रह गया कि क्या यह गुजरा साल हिन्दी के इतिहास में एक साल और जोड़ गया या उसकी उम्र से एक साल कम कर गया।
आज से लगभग ६ दशक पहले १४ सितम्बर को जब हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया तब राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने बड़े दिल से यह घोषणा की थी-
है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी,
हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी.
पर आज भी ये घोषणा साकार रूप लेने की बाट जोह रहा है.हमेशा से ही हिन्दी हमारे बोलचाल और संपर्क की भाषा रही है पर आज के समय में हिन्दी केवल उन लोगों की भाषा बनकर रह गई है जिन्हें या तो अंग्रेजी आती नहीं या फ़िर हिन्दी से कुछ ज्यादा ही लगाव है,ये वही लोग हैं जिन्हें पिछड़ा और सिरफिरा जैसे नाम दिए जाते हैं।
आज जब हमारा देश हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है,ऐसे में हमारी हिन्दी राजभाषा से राष्ट्रभाषा के सफर में कहाँ पिछड़ गई?क्या कुछ कमी रह गई इसके विकास में? आज दुनिया में जहाँ सभी विकसित और विकासशील देश अपनी भाषाओँ में काम करके दिनोंदिन प्रगति कर रहे हैं वहीँ हमारे देश में हिन्दी में काम करने से ही गुरेज किया जाता है,अधिकांश उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षण का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही है.ऐसे में ज्यादा कुछ अच्छा उम्मीद करना ही बेमानी है.आज हिन्दी मिडिया के प्रसार ने काफ़ी हद तक लोगों को हिन्दी तक पहुँचने में अहम् भूमिका निभाई है इसी तरह अगर प्रशासनिक स्तर के कार्य भी हिन्दी में होते तो शायद सरकारें,आमजनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह होतीं.पर.......
एक बड़ी अजीब बात है कि हमारे देश के संविधान का प्रारूप ही अंग्रेजी में बना,संविधान सभा की बहस का अधिकांश हिस्सा भी अंग्रेजी में ही प्रकाशित हुआ,यहाँ तक कि हिन्दी के प्रबल पक्षधर भी अंग्रेजी में ही बरसे.शायद यही कारण है कि आजादी के ६१ सालों बाद भी भारत का विधितंत्र अंग्रेजी और उर्दू में ही चलता है.यहाँ तक कि देश के उच्चतम और उच्च न्यायालयों का सारा काम सारा अंग्रेजी में ही होता है ऐसे में आमजनता कानूनी दांवपेंचों से वाकिफ नहीं हो पाती और कानून के दलदल में फंसती जाती है।
अंग्रेजी के कारण हमारा बहुत नुकसान हुआ तो उम्मीद से कहीं ज्यादा लाभ भी मिला इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि देश में हिन्दी का पठन पाठन ही बंद कर दिया जाए,उससे नफरत किया जाए,बल्कि उसे उतना ही महत्व दिया जाए कि हमारी हिन्दी भी बची रहे.आज जब पश्चिम के देशों में भी हिन्दी का डंका बज रहा है,यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को सातवीं भाषा के रूप में मान्यता देने की कवायद भी चल रही है,ऐसे में अपने ही देश में हिन्दी की उपेक्षा देखकर एक शेर याद आता है-
सच पूछो तो यूँ लगती है हिन्दी हिंदुस्तान में,
कागज के फूल सजे हों शीशे के गुलदान में.
आलोक सिंह "साहिल"

शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

इस्लामी आतंकवाद....अधिक खतरनाक कौन?

आज जहाँ एक तरफ़ इस्लामी आतंकवाद ने देश को झकझोर कर रखा हुआ है वहीँ दूसरी तरफ़ एक अन्य तरह का आतंकवाद भी अपने लिए एक खास तरह की जमीन तैयार करने में लगा हुआ है।यह अलग बात है कि अभी तक इस नए तरह के आतंकवाद को आधिकारिक तौर पर आतंकवाद का टैग नहीं मिला है।
जिस तरह इस्लामी आतंकवाद ने देश में असुरक्षा और दहशत का माहौल पैदा कर रखा है,उसी तरह इस नए वाले ने भी देश में रहने वाले एक खास संप्रदाय/धर्म के लोगों को खौफजदा कर रखा है,पहला वाला भी एक धर्म की आड़ में चलाया जा रहा है,तो दूसरे के मूल में भी कहीं न कहीं धर्म ही है।थोड़ा फर्क है दोनों में तो यह कि पहला वाला अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा किया जा रहा है तो दूसरा बहुसंख्यकों द्वारा,पहले वाले में आतंक फैलाने वाला संप्रदाय ख़ुद ही सकते में है तो दूसरे वाले में आतंक के शिकार संप्रदाय के लोग।
अब अगर नियम कानून,समाजशास्त्र आदि की बात करें तो आतंकवाद के सन्दर्भ में यह बात बहुत अजीब नहीं लगती कि एक अल्पसंख्यक समुदाय के लोग इसमें शामिल हों क्योंकि हो सकता है बहुसंख्यक नीत नीतियों ने किसी रूप में उनके साथ ज्यादती की हो या उनकी भावनाएं आहत हुई हों,ऐसा सम्भव है(जरुरी नहीं कि ऐसा ही होना चाहिए),शायद यही आतंकवाद को जन्म देने वाले कारक हैं,पर जब बहुसंख्यक समुदाय के लोग ऐसा करने लग जायें तो समझ नहीं आता कि क्या कारण हो सकता है,या कैसे इनसे बचा जाए?
अगर बात समझ नहीं आई तो पिछले कुछ समय से इसाई संप्रदाय के लोगो और उनके आस्था के केन्द्र चर्चों पर होने वाले लगता हमलों को जेहन में लाईये।अरे,दूर कहाँ जा रहे हैं,यहीं उडीसा,कर्नाटका वगैरह कहीं भी चले जाईये.
आखिरी सवाल- अब आखिरी सवाल यह है कि अधिक खतरनाक कौन,जिसे नाम दे दिया गया है वो या जो अभी भी बेनाम है?और क्या दूसरे वाले को भी एक नाम की दरकार है?
आलोक सिंह "साहिल"

शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

मुठभेड़ चल रही,दो मारे गए,एक गिरफ्तार

दिल्ली में हुए हालिया बम धमाके, दिल्ली पुलिस समेत केन्द्रीय सत्ता तक के लिए सरदर्द बने हुए थे,कपड़े बदलने और विभिन्न तरह की लापरवाही के चलते भी गृहमंत्री शिवराज पाटिल की खासी किरकिरी हो रही थी,इन सबसे परे उधर दिल्ली पुलिस अपने अब तक के सबसे बड़े सरदर्द से गुजर रही थी और अपने दामन पर और कोई भी छींटा नहीं आने देना चाहती थी यही कारण था कि घटना के तकरीबन दो दिन बाद जाकर संदिग्धों का स्केच जारी किया गया जो अमूमन घटना के तत्काल बाद कर दिया जाता है,और जारी किए गए स्केच की खास बात यह रही की वह स्केच न होकर होकर पूरा का पूरा फोटो ही था जो विभिन्न कलाकारों की मदद से बनवाया गया था।था,जो चीख चीख कर कह रहे थे कि इसबार दिल्ली पुलिस के इरादे क्या हैं,वे कोई भी रिश्क नहीं लेना चाहते थे,इसीलिए हरकाम बहुत सफाई के साथ किया ।
आखिरकार दिल्ली पुलिस की मेहनत रंग लायी और जोरदार/मुकम्मल मुखबिरी ने पहुँचा दिया दिल्ली पुलिस को आतंकियों की गिरेबान तक।कई दिनों से चल रही खोजबीन और निशानदेही के परिणाम स्वरुप जब पुलिस को पता चला कि आतंकी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के बगल/पीछे जामिया नगर और बाटला हाउस इलाकों में छिपे हैं तो बेहद व्यस्थित तरीके से पूरी तयारी केसाथ आज सुबह ११ बजे पुलिस ने बाटला हाउस पर धावा बोला,दिल्ली पुलिस का साथ देने के लिए एन एस जी कि टीम भी पहुँच चुकी है। अभी तक इन धमाकों के तथाकथित मास्टर माईंड तौकीर का दाहिना हाँथ कहा जाने वाला अतीक तथा एक और आतंकी सैफ ढेर किए जा चुके हैं। जबकि जामिया नगर के खलीला मस्जिद के पास स्थित मकान नम्बर एल-१८ में छिपे आतंकियों से पुलिस की मुठभेड़ जारी है,एक अन्य सफलता के तौर पर एक आतंकी की गिरफ्तारी भी हो गई है।उम्मीद कि जा सकती है पूर्व कि घटनाओं से सबक लेते हुए दिल्ली पुलिस ने जो मेहनत कि है वो अंजाम तक जायेगी.

आलोक सिंह "साहिल"

शनिवार, 13 सितंबर 2008

धमाकों ने फ़िर किया बेहाल

धमाकों ने फ़िर दहलाया दिल्ली को।दिल्ली के ३ पाश जगहों पर हुए एक के बाद एक ५ धमाके।ढेरों घायल। एकबार फ़िर आतंकवादियों ने अपने नापाक मंसूबों को अंजाम दे दिया और दहल उठा हमारा देश।
आज शनिवार का दिन है,वीकेन्ड का पहला दिन।हफ्ते भर के काम काम के बोझ से थके लोगों के लिए राहत की साँस लेने का दिन।हफ्ते भर की भागमभाग से उबरकर मस्ती करने का दिन।वो दिन जब लोग अपने घरों से बाहर निकलकर सपरिवार घूमने-फिरने और मार्केटिंग करने का प्लान बनाते हैं,पर शायद इस देश के दुश्मनों को हमारा सुकून रास नहीं आता।अभी पिछले दिनों पूरे देश के विभिन्न जगहों पर हुए धमाकों के चोट से लोग उबर भी नहीं पाए थे कि इन नामुरादों कर डाला एकबार फ़िर धमाका और इस बार निशाने पर थे राजधानी दिल्ली के वो खास जगह जहाँ छुट्टी के दिनों में खासी भीड़ रहती है।
ये जगह हैं
१।करोल बाग का गफ्फार मार्केट
२।ग्रेटर कैलाश-१ का एम् ब्लाक
३।कनाट प्लेस के पास बारहखम्बा रोड और सेन्ट्रल पार्क।
अभी तक पुष्ट तौर पर किसी के हताहत होने की सूचना तो नही मिली है लेकिन कम से कम १० से अधिक लोगों के मारे जाने की आशंका है.पहला धमाका करोल बाग़ के गफ्फार मार्केट में हुआ जहाँ एक ऑटो के सीएनजी सिलिंडर फटने से धमाका हुआ.आशंका जताई जा रही थी कि शायद सिलिंडर फटने से मामूली विस्फोट हुआ हो,तभी ग्रेटर कैलाश-१ में धमाका हो गया,लोग कुछ समझ पाते तबतक अगला धमाका बारहखम्बा रोड पर गोपाल दास बिल्डिंग के पास हो चुका था.पुलिस मौके पर पहुँची घायलों को अस्पतालों तक ले जाने की कवायद में लगी ही हुई थी कि कनाट प्लेस के सेन्ट्रल पार्क और ग्रेटर कैलाश में धमाके हो गए।
ध्यान रहे कि कनाट प्लेस पर जहाँ धमाका हुआ वह मेट्रो स्टेसन के बिल्कुल करीब की जगह है,इससे यह साफ़ हो जाता है कि धामको का मकसद कितना भयानक था अभी पूरा पुलिस विभाग घायलों को अस्पतालों तक पहुँचने में लगा है.दुआ की जा सकती है कि अब धमाकों का सिलसिला कम से कम आज तक के लिए थम जाए ताकि घायलों को उपचार के लिए अस्पतालों तक पहुँचाया जा सके.
तक यह बात पता नहीं लग पाई है कि इस सीरियल ब्लास्ट का जिम्मेदार कौन है, पर इतने सालों के अनुभवों का ख्याल रखते हुए अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल काम नहीं.असल मुश्किल है उन नामुरादों को समझाना कि इंसानी खून बहाकर लोगो में दहशत पैदा कर के कोई भी खुशी हासिल नहीं की जा सकती.काश! कि उन्हें समझ आ जाता.

आलोक सिंह "साहिल"

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

१४४० मिनट....११३२ शिलाएं!!

दुनिया बहुत ही रंग-बिरंगी है।कब कहा क्या देखने सुनने को मिल जाए अंदाजा लगा पाना बहुत मुश्किल।ऐसा ही कुछ गुजरा आज मध्य प्रदेश के सागर के रहेली में,जहाँ के विधायक गोपाल भार्गव ने कर डाले एक ही साथ(एक ही दिन में,महज ८६४०० सेकेंड्स या यूँ कहें १४४० मिनटों में) ११३२ परियोजनाओं के शिलान्यास।मान्यवर भार्गव हाल फिलहाल एम।पी। के कृषि मंत्री हैं,साथ ही अन्य दो विभागों की जिम्मेदारी भी उनके मजबूत कन्धों पर है. बात करें अतीत की तो, भार्गव साहब, सन १९८५ से ही रहेली से विधायक बनते आ रहे हैं पर आज भी वहां सड़क,स्कूल,अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं का खासा अभाव है,आज तक जब कुछ नही हुआ तो फ़िर क्या जरुरत आन पड़ी कि उन्होंने एक ही दिन में इतने सारे शिलान्यास कर डाले? मुद्दा,या फ़िर बात यह नहीं कि महज एक दिन में किए गए इतने परियोजनाओं के लिए आवंटित फकत २०० करोड़ रुपयों से क्या कुछ हो पायेगा,बात दरअसल यह है कि जो काम आज तक नही कर पाये वो अभी यकायक इतनी जल्दबाजी में क्यों?कहीं ये कोई सियासी मज़बूरी तो नही? जी हाँ,आपको याद दिला दें कि आने वाले नवम्बर महीने में वहाँ विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं.तो,अगर उन्होंने सारे शिलान्यास नहीं किए तो फ़िर चुनाव आचार संहिता आड़े आ जायेगी.समस्या फ़िर भी यथावत कि विधायक तो पिछले पौने पॉँच सालों से हैं फ़िर अभी क्यों? यह जानने के लिए जरुरत है इस मामले को एक नौटंकी से परे हटकर देखने की.ऐसा करने पर हम पाएंगे कि इन सबके पीछे कहीं न कहीं हम भारतीय ख़ुद ही जिम्मेदार हैं.चौंकिए मत! एक सवाल का जवाब दीजिये, सब आसान हो जाएगा.आज तक के भारतीय इतिहास में एक-आध अपवाद घटनाओं(दुर्घटनाओ) को छोड़ दें तो कौन सा ऐसा चुनाव है जो विकास कार्यों के नाम पर जीता गया? आज की तारीख में कौन सा ऐसा नेता है जो फकत विकास कार्यों के नाम पर चुनाव जितने का माद्दा रखता है? जवाब- शायद,शायद क्या,कोई नहीं. अब कारण क्या है?अन्य देशों में तो ऐसा होता है फ़िर हमारे यहाँ क्यों नहीं?दरअसल, हम भारतीयों की याददाश्त बहुत ही कमजोर होती है,हमें बड़ी से बड़ी घटनाओं को भुला देने के लिए चंद हफ्ते या महीने ही काफ़ी होते हैं.ऐसे में कोई भी राजनीतिक शख्स जब कोई अच्छा कम तभी करता है जब चुनावी तौर पर कोई फायदा होने वाला हो. पर एक समस्या अब भी बची रह गई,की ठीक है काम करना था तो करते पर इतने सारे की क्या जरुरत थी? साधारण सी बात है.क्या आपको लगता है,सिर्फ़ २०० करोड़ रुपयों और फकत २ महीनो में सारे काम पूरे हो जायेंगे?अगर ऐसा लगता है तो माफ़ कीजियेगा पर आपको बहुत ग़लत लगता है. बात यह है कि,भार्गव साहब को पता है चुनाव होने तक में कोई भी परियोजना पूरी नहीं हो पाने वाली फ़िर फायदा क्या,तो उन्होंने उठा लिया एक ऐतिहासिक कदम.लोग काम के लिए न सही कम से कम इतनी बड़ी घटना के रूप में तो याद रखेंगे ही,और इतना काफ़ी है उनकी चुनावी नैया पार हो जाने के लिए.और चाहिए भी क्या? भगवान,उनकी इस नेक कामना को पूर्ण करे.

आलोक सिंह "साहिल"

बुधवार, 3 सितंबर 2008

लालू का तमाशा:धूमिल हुई बाढ़ पीडितों की आशा

लालू का तमाशा:धूमिल हुई बाढ़ पीडितों की आशा
आज बाढ़ ने बिहार को बुरी तरह झकझोर कर रखा हुआ है।16 जिलों के 20 लाख से अधिक लोग सीधे तौर पर बाढ़ की चपेट में हैं,20 हजार से अधिक लोग लापता है,ढाई लाख एकड़ से अधिक की कृषि भूमि खाक हो चुकी है,राहत कैम्पों की हालत खस्ता है,लोग पत्ते खाकर जहरीले जानवरों के बीच जिंदगी को सहेज पाने की जद्दोजहद कर रहे हैं,और इस बीच वहां पैदा हो रहे बच्चे और उनकी माएं मूलभूत जरूरतों से भी महरूम हैं।
ऐसे हालात में,सेना और नौसेना के जवान प्राणपण से लोगों को बचाने में लगे हुए हैं,सीआरपीऍफ़ के जवान एक दिन की तनख्वाह दे रहे हैं,सार्वजनिक क्षेत्र की 12 कम्पनियाँ 30 करोड़ दे रही हैं,पंजाब,हरियाणा से लगाए देश के कोने कोने से सहायत मिल रही है,यहाँ तक कि सरहद के पार से भी मदद के लिए हाँथ आगे आ रहे हैं।
ऐसे में बिहार के अपने खासमखास,अपने राजनीतिक गोलगप्पे में बाढ़ का चटपटा पानी भरकर बेचने में लगे हुए हैं।
कहते हैं,राजनीति जो न कराये कम है।
एक तरफ़ जहाँ बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव,राहत कार्यों में देरी को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर दोषारोपण कर रहे हैं,वहीँ नीतीश कुमार,लालू पर बाढ़ की राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं.नेताओं के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं.पर,नैतिकता की पराकाष्ठा तो तब पार हो गई जब बाढ़-ग्रस्त बिहार के दौरे पर गए लालू यादव ने लग्जरी गाड़ी में बैठकर भूखे-नंगे बच्चों को 500 का नोट थमाकर लालू जिंदाबाद के नारे लगवाए।इसे क्या क्या कहा जा सकता है?
सच पूछिये तो,बाढ़ पीडितो के दर्द को यूँ तमाशा का रूप देना लालू जैसे बड़े नेताओं के बस की ही बात है.पर सवाल असल यह है कि वहां की जनता आस लगाये तो किससे,जब उनके अपने ही उनके ग़मों का माखौल उड़ाने पर अमादा हैं?

आलोक सिंह "साहिल"

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

खेल अंगुली करने का...

कुछ हफ्तों पहले जब मैंने "सियासत के कुत्ते" लिखा था तो तमाम दोस्तों ने निजी तौर पर शिकायत की कि यार,लिखा तो मजेदार है पर बहुत छोटे में लिखा,तो मैंने झट से जवाब दिया,ऐसी कोई बात नहीं है,मैं इसकी सीरिज बनाना चाहता हूँ और बहुत जल्द इसके अगले अंक के साथ आऊंगा,पर इस बात का ख्याल ही नही रहा,आज फ़िर ख्याल आया तो चला आया कुछ लेकर। खेल अंगुली करने का...
इंसानी फितरत भी अजीब होती है,कभी कभी हमारी महत्वाकांक्षाएं इतनी प्रबल हो जाती हैं कि हम किसी को भी अंगुली करने से गुरेज नहीं करते,चाहे वो हमारा कितना भी ख़ास या सहयोगी क्यों न हो?
जैसाकि आपको पता होगा,बीते कुछ महीने पहले हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में दो महान विचारों के गठबंधन के फलस्वरूप लोकतंत्र नामक तंत्र स्थापित हो पाया था।बड़ी खुशी की बात थी,हमारे लिए भी,अजी,हम आदर्श पड़ोसी जो ठहरे।पर महत्वाकांक्षा की जो तलवारें पहले से वहां मौजूद थीं,वो हमेशा इस नए तंत्र के उपर सरसराती रहीं।
उस वक्त,जरदारी साहब ने अपनी अयोग्यता को महानता में तब्दील करते हुए ख़ुद की जगह युसूफ रजा को प्रधानमंत्री बनवाया,तो नवाज साहब को लगा कि शायद जेल की चाहरदीवारी में रहते रहते उनमे कुछ महान गुणों ने जन्म ले लिया हो,लग गए साथ में।पर मांगो की तलवार सरसराती ही रही,जिन मांगों को लेकर जरदारी को सहयोग किया उनको पूरा करने में जरदारी की तरफ़ से हीला हवाली जारी रही। नवाज साहब इसी चक्कर में पड़े रहे और रोज सुबह शाम अपनी मांग दोहराते फिरते रहे,इस बीच जरदारी साहब, अमेरिका से अपना हिसाब किताब सेट करते रहे,साथ ही साथ नवाज साहब को गोली भी देते रहे।नवाज साहब भी बड़े भोले आदमी बेचारे गोली खाते रहे।इधर, जब जरदारी साहब को लगा कि अब अमेरिका से सेटिंग मुकम्मल हो गई है तो अपना पत्ता खोलते हुए कर दिया मुशर्रफ़ साहब को अंगुली,नवाज साहब खुश,उन्हें लगता रहा।जरदारी ने उनकी पहली मांग पूरी की है,माजरा तो कुछ और ही था।
सभी लोग खुशी मना रहे थे इसी बीच पीपीपी की तरफ़ से मुनादी हो गई कि राष्ट्रपति पद के लिए उनके उम्मीदवार जरदारी होंगे,यह सुनकर नवाज चपेटे में आ गए,उनको लगा कि भइया, कुछ गड़बड़ जरुर है,इसी के मद्देनजर उन्होंने अपनी दूसरी मांग को पूरा कराने की मुहिम तेज कर दी,पर महान अन्गुलिबाज का खिताब पा चुके जरदारी को पता था कि नवाज उनका कुछ नहीं उखाड़ सकते,आख़िर अमेरिका अब उनके साथ है।इधर,हैरान परेशान नवाज ने आनन् फानन में जरदारी का साथ छोड़कर अंगुली कर दी,पर टूटी हुई अंगुली भला जरदारी जैसा कमाल कहाँ से दिखाती? बेचारे नवाज,अब करें भी तो क्या,फ़िर वही पुराना काम............
अल्ला हो अकबर अल्लाह...
खुदा उनकी सुने, आमीन।

आलोक सिंह "साहिल"

बुधवार, 20 अगस्त 2008

...शोहरत की तलब...

बहुत रुसवा करती है ये शोहरत की तलब...
कहते हैं जिसे शोहरत के कीड़े ने काट लिया,उसे तो अल्लाह ही बचाए।जी हाँ,ऐसा ही कुछ हुआ है महाराष्ट्र के एक सांसद रामदास अठावले के साथ।
पिछले दिनों COLORS चैनल पर शुरू हुए बिग बॉस-२ के १४ सदस्यीय टीम में जगह न मिलने और उनके जगह संजय निरुपम के शामिल कर लिए जाने से अठावले महोदय का पारा अठावन्वें तल पर पहुँच गया।
बार विधायक और ३ बार सांसद रह चुके आरपीआई पार्टी के सांसद का आरोप है कि,चूँकि वह दलित हैं इसलिए उन्हें बिग बॉस २ जगह नहीं दी गई,और वे चैनल के खिलाफ अदालत में भी जायेंगे। इधर,इस वाकये से भड़के उनके पार्टी के सदस्यों और समर्थकों ने COLORS टी वी चैनल के दफ्तर में जमकर तोड़ फोड़ की और साथ ही साथ ठाडे,नागपुर और मुंबई में धरना प्रदर्शन भी किया।इतना ही नहीं बिग बॉस,यानी शिल्पा शेट्टी का पुतला भी फूंका।आलम यह रहा कि इनके प्रदर्शन के कारण घंटों सड़कें जाम रहीं और यात्रियों को श्रीमान अठावले के जूनून का शिकार बनना पड़ा।
अगर सामान्य तौर पर देखें तो यह एक खिसियाई बिल्ली का कारनामा है जो COLORS को नोचने में लगी हुई है,परन्तु, जो दुखद पहलू है इस घटना का,यह कि जिस जनप्रतिनिधि को आम जनता की बात करनी चाहिए,महंगाई से परेशान जनता के हित में प्रदर्शन करना चाहिए वह फकत अपने शोहरत के कीड़े के कारण अपने पद की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने से भी बाज नहीं आया।यह एक शर्मसार कर देने वाली घटना है।
परन्तु, मेरा मानना है कि इस घटना को एक सांसद रामदास अठावले से न जोड़कर,एक आम इंसान रामदास अठावले से जोड़कर देखा जाना चाहिए,वैसे भी कीड़े कभी पद पूछकर नहीं काटते...
आलोक सिंह "साहिल"

मंगलवार, 19 अगस्त 2008

एक आस,खुशहाली की...

आज जब, एक के बाद एक धडाधड न्यूज और मनोरंजन के चैनल्स खुलते जा रहे हैं और हमारा आम दर्शक कन्फ्यूज हो चला है कि, क्या देखें और किसे देखें?इसी देश में एक ऐसा वर्ग भी है जो आज भी टी वी के सामने ख़ुद को असहाय महसूस करता है।जी हाँ,पुरबिया (भोजपुरिया) वर्ग।ऐसे में १५ से २० करोड़ की इस आबादी को लक्ष्य कर शुरू किया गया भोजपुरी भाषा का पहला चैनल "महुआ" काफ़ी सुकून देनेवाला है। बात करें क्षेत्रीय भाषा के चैनल्स की तो,आज की तारीख में बांग्ला से लगाये गुजरती,मराठी,पंजाबी,तमिल,तेलगु,मलयालम आदि लगभग हर भाषा के चैनल्स मौजूद हैं,जिनका प्रभाव क्षेत्र कतई अपेक्षाकृत अधिक नहीं है।ऐसे में,इतनी बड़ी आबादी को हमेशा नजरअंदाज किया गया,तब जबकि भोजपुरी का प्रभुत्व भारत से बाहर फीजी,मारीशस और सूरीनाम जैसे देशो तक है। एक अदद भोजपुरी चैनल की इस कमी को देखते हुए मीडिया जगत से जुड़े श्री पी के तिवारी ने तमाम तरह के रिस्कों को दरकिनार करते हुए पहल की।यह निश्चय ही एक बेहद साहसिक और प्रशंसनीय कदम है।इसके लिए श्री तिवारी बधाई के पात्र हैं। साथ ही सभी पुरबिया लोगों के लिए यह एक अविश्वसनीय सी लगने वाली खुशी है। श्री तिवारी के इस हौसले और साहस को देखते हुए बालीबुड में अपनी धमक रखने वाले एक और पुरबिया,प्रख्यात फ़िल्म मेकर प्रकाश झा भी बेहद उत्साहित हैं और उन्होंने ख़ुद को "महुआ" से जोड़ लिया है।ख़बर यह भी है कि वे महुआ के लिए धारावाहिकों का निर्माण भी करेंगे।इससे बड़ी सौगात पुरबिया लोगो के लिए शायद ही कुछ और हो।आशा करते हैं कि जिस तरह महुआ बूंद बूंद टपकता है उसी तरह "महुआ" हरपल खुशहाली टपकाती रहे,मनोरंजन टपकाती रहे। तो,पुरबिया साथियों!हो जायिए तैयार...

आलोक सिंह "साहिल"

शनिवार, 16 अगस्त 2008

......स्वंतत्रता दिवस मुबारक

फ़िर वो दिन आया और चला गया जब पुराने संदूकों के मुरचा खाए ताले खुले,कुछ रंग बिरंगी आयताकार आकृतियाँ बहार निकलीं,कुछ साफ़ सुथरे कपड़ा पहने सभ्य लोगों ने सुबह सुबह तमाम जगहों पर ३ रंगों वाली आयताकार आकृति को तिरंगे का नाम देकर गौरवपूर्ण अंदाज में फहराया,कुछ फूल धरती पर गिरे,तालियों की गडगडाहट और फ़िर कुछ मिष्ठान के नाम पर लम्बी धक्का पेल लाईनें,और ठीक इसके पहले कुछ घंटों तक हमारे साफ़ सुथरे लोगों ने अपनी साल भर की बचायी हुई जुबानी जमाखर्च का जमकर मुजाहिरा किया,और साथ ही क्षणेक के लिए जागृत हो उठा देश के हर नागरिक के दिल में सरफरोशी की तमन्ना।जी हाँ,आखिरकार कल हमारे आजादी का दिन जो था। इस झंडे वाली सुबह की ठीक पहले वाली रात को होती रही मैसेजिंग की भरमार और आधी रात से ही झंडे वाले पूरे दिन तक मोबाईल की सारी लाईनें व्यस्त रहीं।शाम को जब दिनभर की मेहनत से फुर्सत पाकर जब टी वी/ रेडियो आन किया तो अप्रत्याशित तौर पर धमाकों और हताहतों की खबरें समाचारों से नदारद थीं,उनकी जगह ले रखी थी हमारे नेतागणों की भावानाफोदू भाषण-बाजियों ने जिसे सुनकर रगों का लहू उबाल लेने लगा,पर बरसाती मौसम में पंखे और कूलर की ठंडक लगते ही हमारी पेशियाँ सिकुड़ने लगीं तबतक वक्त हो आया था सपनों में खोने का।हो गया,"स्वतंत्रता दिवस मुबारक" आपको भी,६१वें स्वतंत्रता दिवस की ढेरों शुभकामनाएं.
आलोक सिंह "साहिल"

बुधवार, 13 अगस्त 2008

.....मुझको अब महरूम ना कर.

.....मुझको अब महरूम ना कर.
गुरबत की बात हमसे ना छेडो दिलबर,

आँख मेरे रोये हैं विसाल में भी।

बावस्ता रहा हूँ मैं चाँद खुशियों से ही,

तन्हाई की अब रात ना दिखाओ दिलबर।

तेरी हर एक हँसी में घुला है मेरे जिगर का लहू,

मेरे जिगर के टुकड़े को यूँ नीलाम ना कर।

तुम हँसी हो बहुत छुपाने की नहीं बात सनम,

तेरे विसाल को तडपता रहा हूँ सदियों से।

मेरा ईमान भी लुट जाए तो जाने दो सनम,

तेरी बंदगी से मुझको अब महरूम ना कर.
आलोक सिंह "साहिल"

मंगलवार, 12 अगस्त 2008

हिन्दुस्तान: धमाकों का देश

!!8 साल 69 से अधिक जिहादी धमाके,1200 से अधिक मौतें!!
हिन्दुस्तान: धमाकों का देश
सोने की चिडिया,जगत का सिरमौर हमारा हिन्दुस्तान आज जिहादियों की ऐशगाह और शांतिप्रिय नागरिकों की मौतगाह बनता जा रहा है. कभी जम्मू कश्मीर,असम,छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश जैसे राज्यों तक सिमटा जिहादी आतंकवाद आज देशव्यापी हो गया है.तो ऐसे में क्या दिल्ली,क्या वाराणसी,क्या हैदराबाद,क्या जयपुर और क्या अहमदाबाद?सब बराबर हो गया है.कभी कभी लगता है कि समानता और समरसता की जो भावना सदियों से आजतक हम हिन्दुस्तानियों में नही जागृत हो पाई आज वो जिहादियों ने पैदा कर दी.आज की तारीख में पूरा हिन्दुस्तान एक समान हो गया है क्योंकि मौत हर जगह बराबर में मिलती है. आइये पिछले तीन सालों के आंकडों पर नजर डालें-
तारीख वर्ष जगह मौतें
१. २५ अगस्त २००५ मुंबई ४६
२. २९ अक्तूबर २००५ दिल्ली
. ७ मार्च २००६ वाराणसी २१ ४. ११ जुलाई २००६ मुंबई २०९५. ८ सितम्बर २००६ मालेगांव ४०६. १९ फरवरी २००७ पानीपत ६६७. १८ मई २००७ हैदराबाद १२८. २५ अगस्त २००७ हैदराबाद ४२९. १३ मई २००८ जयपुर ६३१०.२५ जुलाई २००८ बंगलौर ०१ ११. २६ जुलाई २००८ अहमदाबाद ५३
ये आंकड़े इस बात को चीख चीख कर बयां कर रहे हैं कि अब हिंदुस्तान सुरक्षित नहीं रहा.एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इस्लामी आतंकी गतिविधियों में होने वाली मौतों में पूरे विश्व में हिन्दुस्तान का इराक़ के बाद दूसरा स्थान है,जो हमें नख से शिख तक शर्मसार कर देने के लिए काफ़ी है. बात करें हमारे रहनुमाओं की तो आज भी उनकी प्रतिक्रियाएं वैसी ही हैं जैसे पहले आती थीं.जब वे सत्ता में होते हैं तो जिहाद का रोना रोते हैं और मुआवजे बाँटते हैं और जब विपक्ष में होते हैं तो आरोपों की झडी लगा देते हैं.पर हकीकत यह है कि हैं सभी एक ही तवे के सेंके हुए. फ़िर भी हम बात करते हैं सर्वशक्तिमान बनने की,अमेरिका की बराबरी करने की,अरे, हमें तो किसी गटर में डूब मरना चाहिए.क्या आपको नहीं पता है कि ९/११ के बाद अमेरिका में जिहाद के नाम पर पटाखे तक नही फूटे वहीँ इस दरम्यान हमारे देश में तकरीबन १२०० लोग जिहाद के नाम पर हलाक हो गए.ये फर्क है सर्वशक्तिमान अमेरिका और शेखचिल्ली सा ख्वाब सजाये हिन्दुस्तान में. कहते हैं हर अति की इति होती है,पर यह क्या,यहाँ तो किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती.सभी मस्त हैं अपनी राजनीति बजाने में.कोई अमरनाथ श्राईन बोर्ड मसाले पर,कोई सेतुसमुद्रम पर,कोई नंदीग्राम पर तो कोई कलावती पर. आख़िर,हम गुहार लगायें तो किससे?जागो अब तो जागो....
आज अगर खामोश रहे तो कल सन्नाटा छायेगा,
हर बस्ती में आग लगेगी,हर बस्ती जल जाएगा।
सन्नाटों के पीछे से तब एक सदा ये आयेगी।
कोई नही है,कोई नही है,कोई नही है कोई नही.
आलोक सिंह "साहिल"

बुधवार, 16 जुलाई 2008

.....ख्वाब में जीता रहूँ!!

.....ख्वाब में जीता रहूँ!!
तुमसे मिलना तो पहले इत्तफाक ही था,
पर क्या इत्तफाक कि इत्तफाक से मोहब्बत हो गई।
ढूंढ़ता रहता हूँ तुझे हर वक्त,हर घड़ी गली - गली,
पर अजीब इत्तफाक ,आज फ़िर तू ख्वाबों में ही मिली।
तेरा मिलना भी यूँ तो कम खुशगवार नहीं,
काश तू समझती,ख्वाबों से इतर भी दुनिया हसीं होती है।
रहता है इंतजार हर पहर तेरे ख्वाबों का,
ख्वाबों से बाहर आना तेरा मुनासिब जो नहीं।
चाहता हूँ तुझको बसा लूँ अपने पलकों पर,
हर वक्त नजरें बंद हों और ख्वाब में जीता रहूँ.
आलोक सिंह "साहिल"

शनिवार, 12 जुलाई 2008

मैया मैं तो...परमाणु लैन्ह्यो

हमारा प्यारा भारतवर्ष एक प्रगतिशील देश है जिसकी प्रगतिशीलता का अंदाजा ११.६३ फीसदी की मंहगाई दर से ही लगाया जा सकता है.शायद लोगों को पता नहीं कि हमारे पीएम से लगाये योजना आयोग के उपाध्यक्ष और वित्तमंत्री सभी अर्थशास्त्री हैं.फ़िर भी लोग तो लोग हैं कि झुठ्मुथ में मंहगाई का रोना रो रहे हैं. खैर,किसी भी देश के अधिकाधिक विकास के लिए सबसे बड़ी जरुरत होती है उर्जा की.सच्ची बात तो यह है कि सभी मिलकर सबसे जरुरी काम पर अपना दिमाग खपा रहे हैं.अब उर्जा जैसी बड़ी समस्या से निपटने के लिए मंहगाई जैसी छोटी मोटी समस्याओं को इग्नोर तो करना ही पड़ता है .आख़िर बात देश के विकास की जो ठहरी.वैसे भी अगर मंहगाई है तो यह भी तो एक सूचक ही है कि हमारे यहाँ मंहगे मंहगे सामान बिकते हैं इसके मायने है कि हम अमीर हो रहे हैं,आखिरकार पैसा घूमफिरकर देश में ही तो रह रहा है. एक कहावत आपने सुनी होगी अंधे के हाँथ बटेर लगना.जी हाँ,हमारे रहनुमा अभी विचार मंथन में लगे ही हुए थे कि कैसे इंडिया को चमकाया जाए,कि एक पुराने शुभेच्छु देश ने एक उर्जावान प्रस्ताव दे दिया.भूखे को क्या चाहिए दो जून की रोटी ही न!फ़िर क्या था सभी आन्ख्मुन्दकर चिल्लाने लगे कि अगर फलां डील हो गया तो हम भी अमेरिका जैसे हो जायेंगे.ये तो पता ही है कि उर्जा आएगी तो लाईट आएगा और लाईट आएगा तो देश चमकेगा ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका चमकता है.इतनी सी फंडामेंटल थ्योरी है.अजी कहने वाले तो कहते रहें कि देश की सुरक्षा के लिए जरुरी परमाणु परीक्षणों पर रोक लग जायेगी,देश उस सहयोगी का पिट्ठू बन जाएगा पाकिस्तान की तरह,वगैरह वगैरह...लोग भी अजीब हैं,अरे भाई जब डील के बाद जब हम अमेरिका बन ही जायेंगे तो क्या जरुरत है किसी परिक्षण वरिक्षण की.लोग भी न... हाँ जी,तो हमारी सरकार को लगा कि भइया ४ साल बिता दिए पर कुछ भी ऐसा नहीं उखाड़ पाए कि अगले चुनाव में गा सकें,चलो इसी बहाने एक नया गाना तो मिल जाएगा गाने को.पर हमारे बायें वाले भइया लोग पता नही क्या खुन्नस है हमारे मनोहारी साहब से. तो साहब आज तक़रीबन डेढ़ साल होने को है जब से हमारे पीएम साहब निरंतर रोना लगाये हैं कि मैया(भइया) मैं तो चन्द्र खिलौना(परमाणु) लैह्यों.पर भाई जी लोग माने ही नही तभी उत्तर कि तरफ़ से से एक भाई साहब सायिकिल पर बैठे हाँथ में लालटेन लटकाए चले आए,अब जाके हमारे पीएम साहब को आशा की किरण दिखी कि अब तो कुछ भी हो जाए सयिकिल पर बैठकर परमाणु तो लायेंगे ही.धन्य है श्रृष्टि के परम अणु.
आलोक सिंह "साहिल"

शुक्रवार, 4 जुलाई 2008

नमूने...एक से बढ़कर एक!!

नमूने...एक से बढ़कर एक!! भारत एक स्वतंत्र गणराज्य है,यहाँ के नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली हुई है.हर एक व्यक्ति की अपनी शैली है,अपना अंदाज है.कोई तो स्लैंग्स का प्रयोग ज्यादा करता है तो कोई रुक रुक कर बोलता है.पर कहीं न कहीं सबका एक ही मकसद होता है ख़ुद को अधिक माडर्न या औरों से अलग सिद्ध करना. इस मामले में हमारे टीवी चैनल वाले और हमारे फिल्मी हीरो भी पीछे नहीं हैं.आख़िर हों भी कैसे?आपने वह सूक्ति नहीं पढ़ी क्या,सिनेमा समाज का आईना होता है. आते हैं मुद्दे पर.हाल ही में हमारे एक मनोरंजन चैनल ZTV ने एक नया कार्यक्रम शुरू किया.reallity shows की रंगरूट दौड़ में एक नया रंगरूट.शो शुरू करने के पहले कार्यक्रम के निर्माता निर्देशकों के सामने बड़ी समस्या थी कि आजकल तो बहुतेरे स्टार टीवी पर reallity shows प्रस्तुत करते हैं,फ़िर इसे अलग कैसे बनाया जाए,उनकी इच्छा थी कि कार्यक्रम को नमूना बना दिया जाए.इसके लिए उन्हें तलाश थी एक नमूना दिखने वाले चेहरे की तो लो जी उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के स्टार रविकिशन को पकड़ लिया और शुरू कर दिया नाचने गाने वाला एक reallity show. मैंने पहले ही कहा हर इन्सान की अपनी शैली होती है तो रविकिशन भाई का भी अपना अंदाज है,(आखिरकार वो भी स्टार हैं).आजतक उनकी जो पहचान बनी वो भोजपुरी फिल्मों से बनी पर यहाँ तो हिन्दी/अंग्रेजी बोलने उतार दिया वो भी सीधे मंच पर.कार्यक्रम के संचालन से पहले उन्होंने ढेर सारा भोजपुरी का हिन्दी अनुवाद और हिन्दी का अंग्रेजी अनुवाद रटा पर जब मंच पर उतरे तो अपनी असलियत नहीं छुपा सके.शुरू हो गए एक घटिया खिचाडिया अंदाज में.अब उनको कौन समझाए कि ये मॉरिशस नहीं इंडिया है.अरे भाई हम मानते हैं कि भोजपुरी पसंद करने वालों का एक बड़ा वर्ग हमारे यहाँ है पर जो कार्यक्रम पूरे देश में एक साथ चल रहा हो वहां इत्ती घटिया भोजपुरी नहीं शोभती न.अब आप लालू प्रसाद यादव तो हैं नहीं. वैसे ही हमारी भोजपुरी अभी तक एक भाषा का दर्जा नहीं पा सकी है,आज भी उसे आठंवी अनुसूची में स्थान दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी जा रही है,उस पर से तुर्रा ये कि आप उसे आम लोगों के बीच इतने गंदे तरीके से पेश कर रहे हैं.....ग़लत बात.वैसे भी बात किसी भाषा की नहीं है.आप हिन्दी बोलें, भोजपुरी बोलें,अंग्रेजी बोलें या फ़िर कुछ और ही बोलें मुझे कोई आपत्ति नही,पर कृपा करके किसी भी भाषा की टांग न तोडें. आलोक सिंह "साहिल"

सोमवार, 30 जून 2008

एक नज्म...आपके नाम..

एक नज्म...आपके नाम॥
अब तो आ जा, बहुत तडपाती है तेरी दूरी।
सहरा में चलते चलते प्यास तो लग ही जाती है।
या खुदा काश! वो दिन भी कभी आ जाए,
कारवां आपका मेरे भी रूह में ठहरे।
कह न पाए अब तलक जो लब मेरे,
बात वो मेरी नजर कह गुजरे।
धीरे धीरे आप पर भी हो असर,
जिस गम-ए-इश्क से हैं हम गुजरे।
बिन पिये ये कैसा नशा है साकी?
बन के शैदा वो मेरे ही कातिल निकले.

आलोक सिंह "साहिल"

मंगलवार, 24 जून 2008

आज मैं बाईस का...अलविदा...

आज मैं बाईस का...अलविदा... हरबार की तरह इसबार भी कुछ आशाओं,कुछेक निराशाओं ,कुछ अजीज सफलताओं तो कुछ क्षणिक विफलताओं के पुलिंदे को गट्ठर बनाकर जब अपने यादों के पिटारे में डालने के लिए उसे खोला तो पाया सभी पुलिंदों ने अपने चेहरों पर मुस्कराहट सजा रखी है.पता नहीं उनकी मुस्कराहट क्या बयां कर रही थी?शायद यही कि बेटा खुश हो ले,आज तूने एक और साल खो दिया. यह बात मन में आते ही मैंने विरोध करना चाहा,कि नहीं...नहीं....मैंने खोया नहीं बल्कि..इसे जिया है,तब तक बहुत देर हो चुकी थी.पिटारा ख़ुद बखुद बंद हो चुका था.शायद अगले साल खुलने की तयारी करने. खैर,थोड़ा तस्कीन से जब सोंचने बैठा तो तमाम उमंगें जवां होने लगी,शायद सफलता की कुछ बहुप्रतीक्षित इबारतें इसबार लिखी जायें.पर फ़िर भी मैं ख़ुद को किसी एक बात पे संतुष्ट नहीं कर पा रहा हूँ कि मैं खुश हूँ या उदास?अब बात ये भी है कि खुशी किस बात की?या उदासी का क्या सबब हो सकता है? एक बड़ी खुशी जो हो सकती थी वो तो पिछली बार ही पिटारे में पहुँच चुकी थी तब मैं वयस्क हुआ था. आज रह रहकर वो पल मुझे गुदगुदा रहे हैं,जब मैं २१ का हुआ था.तब मैं खासा प्रसन्न था वरन उससे अधिक उत्साहित था.बचपन से ही मन में फैन्तेशी थी कि कब मैं बड़ा होऊं और बड़ों के बड़े बड़े काम बेझिझक कर सकूँ? मैं अपने घर में सबसे छोटा हूँ तो शायद इसलिए भी यह ग्रंथि मन में थी कि अब मैं बच्चा नहीं हूँ बड़ा हूँ.कोई चाहकर भी मुझे बच्चा नहीं कह सकेगा. पर आज मैं दुखी हूँ,मुझे मेरा बचपन आज बहुत आकर्षित कर रहा है,रह रहकर मुझे चिढा रहा है.अब मैं पहले जितना आजाद नहीं रहा.तमाम जिमेदारियां,तमाम चिंताएँ.जी करता है सारी मर्यादाएं तोड़कर एकबार फ़िर अपने शुरूआती पुलिंदों में खो जाऊँ.पर मर्यादाविहीन होकर भी जिया जा सकता है क्या...? शायद तब मैं यह नहीं सोंचता था,क्योंकि मर्यादा नामक चीज तब मेरे पल्ले ही नहीं पड़ती थी. पर धीरे धीरे इस एक साल में मैंने हकीकत के साथ समझौता कर लिया है ( इंसानी जिंदगी में कितने ही समझौते करने पड़ते हैं,काश हम angel होते!!)जान लिया कि यही सच्चाई है और इसी के साथ जीना है.जीना है उसे जिसे हम जीवन कहते हैं.दुहाई हो ऐसे जीवन की. अब तो घंटी बज चुकी है.मेरे प्रिय पुलिंदे, तुझे जाना ही होगा क्योंकि अब कोई और तेरी जगह लेने को बेकरार है.न चाहते हुए भी तुझसे अलविदा कहना पड़ेगा,क्योंकि चाहते हुए भी तुझसे मिलने का वक्त नहीं निकल पाउँगा,क्योंकि जन्दगी में रिवर्स प्रोसेस नहीं होता.मैं कोशिश करूँगा कि इस नए वाले के साथ ताल्लुकात अच्छे बना सकूँ और कभी क्षणभर के लिए ही सही ख्यालों और कल्पनाओं में ही सही तुझसे गलबहियां कर सकूँ. खुशी है कि आज तक तूने हर वक्त मुझे हंसने और खुश होने का मौका दिया,बदले में मैंने भी तुझे बेपनाह प्यार किया.तुम मुझे ग़लत न समझना क्योंकि धन्यवाद कहकर तुझे शर्मिंदा नहीं कर सकता.अरे.............मैं किस्से बात कर रहा हूँ?तू तो कबका पिटारे में जा चुका है.ओह...तेरी यादें...कमबख्त...अलविदा अलविदा अलविदा....... शेर मेरे कहाँ थे किसी के लिए, मैंने सबकुछ लिखे थे तुम्हारे लिए. अपने सुख दुःख बड़े खुबसूरत रहे,हम जिए भी तो एक दूसरे के लिए.
आलोक सिंह "साहिल"

सोमवार, 23 जून 2008

हमारी हिन्दी और डोपिंग... बदलती हुई दुनिया के साथ कदमताल मिलाने के चक्कर में हमने पश्चिमी सभ्यता को इस तरह अपनाना शुरू कर दिया कि,अब दूर से ही हमसे पश्चिम की बू आने लगी है.यूँ कहें,हम ख़ुद ही आधे अधूरे पश्चिमी हो गए हैं. बात हमारे पहनावे की हो,खान पान की आदतों की या फ़िर हमारी भाषा की,हर लिहाज से हम बिचबिचवा(दोयम) पश्चिमी लगते हैं. बात भाषा की- हैं तो हम मूलरूप से हिन्दीभाषी,पर अंग्रेजी की डोपिंग(मिलावट) इस कदर हो गई है कि यह समझ पाना मुश्किल हो चला है कि अमुक व्यक्ति हिन्दी बोल रहा है या अंग्रेजी?चलिए,एक अच्छी सुविधा तो हुई,नई भाषा के लिए नया नामकरण,"हिंग्रेजी" किसी भी भाषा को ग्राह्य बनाने के लिए डोपिंग समझ में आती है पर ऐसी भी क्या की मूल भाषा ही धूंधनी पड़ जाए. इसे एक उदहारण से समझा जा सकता है,ग्वाले(दूध बेचने वाले) भाईयों का जन्मसिद्ध अधिकार है दूध में पानी मिलाना,यह बहुत कुछ वैसा ही जैसे नेताओं द्वारा घोटालों को अंजाम देना.जी हाँ,तो पहले के ग्वाले दूध में पानी मिलाते थे पर आधुनिक कल्चर में ख़ुद को ढालते हुए आजकल वे पानी में दूध मिलाने लगे हैं. तो बात स्पष्ट है,पहले हमारी हिन्दी को अधिक लोकप्रिय और ग्राह्य बनाने के लिए उसमें अरबी,फारसी,उर्दू,पोश्तो आदि के साथ अंग्रेजी भी मिलाया जाने लगा पर अब तो लगता है कि एक सिर-पूंछविहीन खिचडी भाषा को और रोचक व् मसालेदार बनाने के लिए उसमें हिन्दी भी मिला लिया जाता है,सनद रहे,नाम फ़िर भी हिन्दी ही रहता है. हिन्दी की बात चल रही है तो एक घटना यद् आ रही है.आस्ट्रेलियाई क्रिकेटर ब्रेट ली ने अपने भारत प्रेम को और अधिक पुख्ता करने के लिए यहाँ की प्रचलित भाषा हिन्दी सीखने के लिए बहुत दिनों महीनों तक मेहनत की पर असफल रहे.एक पत्रकार ने जब उनसे इस बाबत पूछा तो उनका जवाब था-"यार,मैं आजतक हिन्दी नहीं सीख पाया.यहाँ के लोग हिन्दी बोलते ही कहाँ हैं?हिन्दी में तो अधिकतर अंग्रेजी ही रहती है.सीखूं तो सीखूं कैसे?" बात अब पहले से अधिक स्पष्ट हो चुकी होगी.तो अब समस्या यह है कि आख़िर वजह क्या है, तो कहीं न कहीं यह हमारी अमेरिकी या यूरोपीय न होने की कुंठा में ही निहित है(हम भारत में क्यों जन्मे?हम औरों से बेहतर हैं.जाने किससे....?). मैं मानता हूँ कि किसी भी भाषा के विकास के लिए उसका अपभ्रंशित होना कहीं न कहीं फायदेमंद होता है,पर ऐसा भी क्या अपभ्रंश कि हमारी हिन्दी का अंश भी तलाशना मुश्किल हो जाए.
आलोक सिंह "साहिल"

शनिवार, 21 जून 2008

दस का दम,...पानी फ़िर भी कम...

दस का दम:शोर पुरजोर पर पानी फ़िर भी कम
भारतीय इलेक्ट्रोनिक मीडिया का यह शैशवकाल है,इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है।इस अवस्था में वृद्धि बहुत तेजी से होती है,तमाम आयामों में विस्तार भी द्रुतगामी होते हैं.पर दुर्भाग्य से उस वक्त आप यह नहीं तय कर सकते कि विस्तार किस दिशा में हो,बस विस्तार हो जो कि हो रहा है. इलेक्ट्रोनिक मीडिया में,बात करें मनोरंजन के चैनलों की तो सालों तक सास-बहू के झमेले दिखाने और इससे पैसे बनाने के बाद उनको हिट होने का एक नया शिगूफा मिल गया है,reallity shows.कभी बिग बी ने लोगों को करोड़पति बनाया(लोग बने या न बने,ख़ुद दिवालियेपन से उबरकर अरबपति बन गए.) तो कभी किंग खान ने गद्दी हथियाई.कभी गोविंदा तो कभी संजू. कभी कोई तो कभी कोई. इन दिनों स्टार वालों ने शाहरुख़ को लेकर "क्या आप पांचवीं पास से तेज हैं?"शुरू किया तो बालीबुड के दूसरे खान यानि हमारे सल्लू मियां ने भी कमर कस ली,उनका साथ दिया सोनी इंटरटेनमेंट वालों ने,और साथ ही दिया हर एपिसोड के तकरीबन एक करोड़ रुपये,नाम रखा "दस का दम". चूँकि,इसके माध्यम से सलमान पहलीबार छोटे पर्दे पर उतर रहे थे तो दर्शकों में रोमांच भी बहुत था कि कोई explosive package ही होगा.धीरे धीरे इसके प्रोमो ने टीवी चैनलों पर अपना जलवा दिखाना शुरू किया.लोगों को लगा ओजी,ये तो बम है.तरह तरह से इसको प्रचारित प्रसारित किया गया.कभी सल्लू बनियान में दिखते तो कभी माथे पर सब्जी लिए. खैर,वह शुभघड़ी (शायद) भी आ गई जब "दस का दम" का पहला एपिसोड दर्शकों के सामने परोसा गया.हमने भी अपने चश्मे को दुरुस्त करते हुए नजरें टीवी पर गडा दीं,क्योंकि हम नहीं चाहते थे कि इस कार्यक्रम का कोई भी पहलू हमसे छुट जाए.पर ये क्या?इसमें तो केवल शोर ही शोर है.भौंडे सवालों और घटिया व् बेशर्म जवाबों की भरमार है.बुरा लगा,पर क्या करें,अब सलमान से इससे अधिक की अपेक्षा करना भी बेमानी ही है. यही क्या कम है कि बेचारा अपनी reallity को छोटे परदे पर भी कायम रखा? बेचारे चैनल वाले भी क्या करें?उन्हें भी तो भेंडचाल में ख़ुद को बनाये रखना है.आख़िर ये उनके अस्तित्व कि लडाई जो ठहरी.वैसे भी उनका दबाव समझा जा सकता है.किसी एक दिन के ६,७ घंटे के लिए डेढ़ दो-करोड़ रुपये खर्च करना मायने रखता है.अब इतना खर्च करने पर इसकी भरपाई भी तो होनी ही चाहिए.यही कारण है कि अश्लील भाषा से लेकर अश्लील हरकतें(तथाकथित माडर्न भाषा शैली.) तक सभी कुछ झोंक दिया पर फ़िर भी पानी कम. सच कहें तो टीआरपी की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में और कुछ हुआ हो या न हुआ हो पर मनोरंजन नामक बला की बुरी तरह बज चुकी है.टीआरपी के नाम पर सब जायज है.अब ख़ुद मनोरंजन को भी ख़ुद पे शर्म आती होगी कि वह कितने ही चैनलों और स्टारों के मानसिक दिवालियेपन की वजह बन बैठा. इस कार्यक्रम में सबकुछ रखा गया जो की किसी कार्यक्रम के हिट होने के लिए अपेक्षित है फ़िर भी देखने के बाद यही लगा... दस का दम:शोर पुरजोर पर पानी फ़िर भी कम...

आलोक सिंह "साहिल"

शुक्रवार, 20 जून 2008

राजनीति की सलीब...

राजनीति की सलीब... पिछले दिनों भारत की दूसरी बड़ी राजनितिक पार्टीभाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने संवैधानिक तौर पर धर्मनिरपेक्ष शब्द की वैधानिकता पर सवाल खड़ा कर दिया। थोड़ा मूल में चलें तो,जब नवम्बर १९४९ को हमारे स्वतंत्र देश भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ तो इसकी प्रस्तावना (preamble) में मूलरूप से भारत को एक प्रभुसत्ता संपन्न लोकतान्त्रिक गणराज्य(sovereign,democratic,republic) का दर्जा दिया गया।संविधान सभा के अध्यक्ष बाबा साहब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने भी कहा था "इसे संविधान की आत्मा समझा जाय,किसी अनुच्छेद के लिए कोई भ्रम हो तो उसे संविधान की प्रस्तावना के परिप्रेक्ष्य में देखकर निर्णय लिया जाय।" परंतुहमारे देश के रहनुमाओं ने इसे अपने फायदे के अनुसार उलट पलट कर इस्तेमाल किया।सन १९७६ में इंदिरा गांधी की सरकार ने ४२ वाँ संविधान संशोधन करके संविधान की मुल्प्रस्तावाना में secular और socialist शब्द जोड़ दिया जिससे भारतीय संविधान की आत्मा का रूप बदलकर sovereign,secular,socialist,democratic,republic हो गया। ऐसा नहीं है की इस बदलाव के पहले संविधान में socialism या secularism की बात नहीं थी।अनुच्छेद २५ से ३० तक में secularism निहित है तथा संविधान के भाग ४,नीतिनिदेशक तत्वों में socialism की व्याख्या भी है,परन्तु इस बदलाव के तहत इसे उभारा गया। इस बदलाव का मकसद साफ़ था,वोटबैंक आधारित राजनीति । संविधान में निहित secular का मतलब था सर्वधर्म समभाव परन्तु secular शब्द को धर्मनिरपेक्षता का अर्थ देकर खुलेआम धर्म आधारित राजनीति की गई वरन अब भी जारी है.आज कुछ एक दलों को छोड़ दें तो कांग्रेस,वामदल,बसपा,सपा,जनता दल,राजद से लगाए लगभग सभी राजनितिक दल ख़ुद को secular यानि धर्मनिरपेक्ष सिद्ध करते हुए वोटबैंक बढ़ाने में लगे हुए हैं. जबकि तकनिकी या राजनीतिक दृष्टि से secular का अर्थ धर्मनिरपेक्ष नहीं होता.यहाँ तक कि संशोधित संविधान की जो हिन्दी प्रति छपवाई गई उसमे भी secular की जगह पंथनिरपेक्षता रखा गया है.परन्तु वोट की राजनीति की खातिर सभी राजनीतिक दलों ने तथाकथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष होने का स्वांग रचा और निरंतर भारत की भोली जनता को उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करते रहे. अगर गौर करें तो इस शब्द का लाभ लेकर केवल कांग्रेस या वामदल जैसे दलों ने ही मलाई नही काटी वरन धर्म का तमगा लेकर चलने वाली भाजपा ने भी इससे मजे किए. कभी तो जम्मू कश्मीर में धारा ३७० तो कभी एकसमान नागरिक संहिता की बात पर बवाल मचाया.वक्त के साथ साथ रंग बदलते हुए कभी एकात्म मानववाद तो कभी प्रचंड राष्ट्रवाद का नारा बुलंद कर अपने वोट की झोली का वजन बढाते रहे. पर अब जबकि भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की तो फ़िर एकबार इसके निशाने पर अपना चुनावी उल्लू सीधा करना ही है.जाने कबतक इस क्षनिक राजनीतक लाभों की सलीब पर हमारी राष्ट्रिय एकता बलि चढ़ती रहेगी. आलोक सिंह "साहिल"