शुक्रवार, 20 जून 2008

राजनीति की सलीब...

राजनीति की सलीब... पिछले दिनों भारत की दूसरी बड़ी राजनितिक पार्टीभाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने संवैधानिक तौर पर धर्मनिरपेक्ष शब्द की वैधानिकता पर सवाल खड़ा कर दिया। थोड़ा मूल में चलें तो,जब नवम्बर १९४९ को हमारे स्वतंत्र देश भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ तो इसकी प्रस्तावना (preamble) में मूलरूप से भारत को एक प्रभुसत्ता संपन्न लोकतान्त्रिक गणराज्य(sovereign,democratic,republic) का दर्जा दिया गया।संविधान सभा के अध्यक्ष बाबा साहब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने भी कहा था "इसे संविधान की आत्मा समझा जाय,किसी अनुच्छेद के लिए कोई भ्रम हो तो उसे संविधान की प्रस्तावना के परिप्रेक्ष्य में देखकर निर्णय लिया जाय।" परंतुहमारे देश के रहनुमाओं ने इसे अपने फायदे के अनुसार उलट पलट कर इस्तेमाल किया।सन १९७६ में इंदिरा गांधी की सरकार ने ४२ वाँ संविधान संशोधन करके संविधान की मुल्प्रस्तावाना में secular और socialist शब्द जोड़ दिया जिससे भारतीय संविधान की आत्मा का रूप बदलकर sovereign,secular,socialist,democratic,republic हो गया। ऐसा नहीं है की इस बदलाव के पहले संविधान में socialism या secularism की बात नहीं थी।अनुच्छेद २५ से ३० तक में secularism निहित है तथा संविधान के भाग ४,नीतिनिदेशक तत्वों में socialism की व्याख्या भी है,परन्तु इस बदलाव के तहत इसे उभारा गया। इस बदलाव का मकसद साफ़ था,वोटबैंक आधारित राजनीति । संविधान में निहित secular का मतलब था सर्वधर्म समभाव परन्तु secular शब्द को धर्मनिरपेक्षता का अर्थ देकर खुलेआम धर्म आधारित राजनीति की गई वरन अब भी जारी है.आज कुछ एक दलों को छोड़ दें तो कांग्रेस,वामदल,बसपा,सपा,जनता दल,राजद से लगाए लगभग सभी राजनितिक दल ख़ुद को secular यानि धर्मनिरपेक्ष सिद्ध करते हुए वोटबैंक बढ़ाने में लगे हुए हैं. जबकि तकनिकी या राजनीतिक दृष्टि से secular का अर्थ धर्मनिरपेक्ष नहीं होता.यहाँ तक कि संशोधित संविधान की जो हिन्दी प्रति छपवाई गई उसमे भी secular की जगह पंथनिरपेक्षता रखा गया है.परन्तु वोट की राजनीति की खातिर सभी राजनीतिक दलों ने तथाकथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष होने का स्वांग रचा और निरंतर भारत की भोली जनता को उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करते रहे. अगर गौर करें तो इस शब्द का लाभ लेकर केवल कांग्रेस या वामदल जैसे दलों ने ही मलाई नही काटी वरन धर्म का तमगा लेकर चलने वाली भाजपा ने भी इससे मजे किए. कभी तो जम्मू कश्मीर में धारा ३७० तो कभी एकसमान नागरिक संहिता की बात पर बवाल मचाया.वक्त के साथ साथ रंग बदलते हुए कभी एकात्म मानववाद तो कभी प्रचंड राष्ट्रवाद का नारा बुलंद कर अपने वोट की झोली का वजन बढाते रहे. पर अब जबकि भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की तो फ़िर एकबार इसके निशाने पर अपना चुनावी उल्लू सीधा करना ही है.जाने कबतक इस क्षनिक राजनीतक लाभों की सलीब पर हमारी राष्ट्रिय एकता बलि चढ़ती रहेगी. आलोक सिंह "साहिल"

2 टिप्‍पणियां:

rajan ने कहा…

बहुत ही सटीक बात लिखी है बंधू आपने,मेरी तमन्ना है की और भी अधिक बहस हो इसपर.

rashmi ने कहा…

सब वोट की महिमा है जी.