Monday, May 11, 2009
शर्म की बात है मोइली साहब!!!
ऐसे तो यह इतिहास रहा है कि हर चुनाव के बाद कुछ लोग नपते जरूर हैं लेकिन ऐसी भी क्या तेजी कि आखिरी चरण का चुनाव सर पे है और पार्टी के मीडिया विभाग के प्रमुख नप गये।
बहरहाल, इसबार के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी के साथ ऐसी कई बातें खास थीं जो खटकीं...वीरप्पा मोइली साहब की बोलती बंद होना भी उन खास बातों में से एक है। अब कुछ तो लोग कहेंगे ही॥अजी, उनका काम ही जो कहना है...मसलन,कांग्रेस के मीडिया विभाग में बहुत सारी गड़बड़ियां थीं, उसमें ऐसे लोग थे जो बड़बोलेपन के शिकार थे और कुछ भी अनाप-शनाप बोलते रहते थे, वगैरह...वगैरह।
अब जरा सोचिए जब पार्टी का युवराज किसी बिहार के मुख्यमंत्री को अच्छा कह दिया तो वह अच्छा है न...अब आपके मंत्रीमंडल का कोई वरिष्ठ मंत्री आपको नहीं पसंद तो न सही...लेकिन मैडम (और अब तो सर भी) की आज्ञा के बगैर आप कुछ भी बोल देंगे, ये कोई सलीका थोड़े न है। इतने दिनों से राजनीति कर रहे हैं... (अब तो आप खुद भी वरिष्ठ हो गये हैं) और आपको यह भी नहीं पता कि राजनीति में कब किसके बारे में क्या कहना है...शर्म की बात है मोइली साहब!!!
आलोक सिंह "साहिल"
Sunday, May 10, 2009
इन्तजार कर लेना ही मुफीद होगा...
अब तक के भारतीय इतिहास में संभवतः यह पहलीबार है जब प्रधानमन्त्री पद के दावेदार को लेकर चुनाव पूर्व ही इतनी साड़ी बिसातें बिछ गयी हैं...गांधी टाईटल वाले नेताओं को छोड़ दें तो यह पहलीबार है जब कांग्रेस ने चुनाव के पहले ही अपना कैंडिडेट घोषित कर रखा है. पिछले आम चुनावों को देखें तो कांग्रेस पार्टी अब तक अपने आलाकमान/ गांधी नाम पर ही चुनाव लड़ती थी...लेकिन इसबार मनमोहन सिंह को आगे कर चुनाव लड़ रही है...वह भी तब जब उसके स्थायी युवराज पूरे देश में पैर जमाने की जुगत में लगे हैं...ऐसे में पूरे जोरदार ढंग से मनमोहन को अपना कैंडिडेट बताकर कांग्रेस क्या सिद्ध करना चाहती है, इसे समझना बहुत कठिन नहीं है...यह मजेदार रहस्य इस वाक़ये से और भी स्पष्ट हो जाता है- आज तक भाजपा के पीएम इन वेटिंग (तथाकथित मजबूत नेता) लालकृष्ण आडवाणी द्वारा बेइंतहा खरी खोटी सुनने और लगाए गए ढेरों आरोप मसलन, इतिहास के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री और मैडम के पिट्ठू...वगैरह...वगैरह...का जवाब आखिरकार मित/ मृदु भाषी समझे जाने वाले मनमोहन ने दे ही दिया...
हालांकि उनका जवाब देना कोई बड़ी बात नहीं थी तब जबकि उनके प्रतिद्वंदी आडवाणी अमेरिकी तर्ज पर भारतीय लोकतंत्र का फैसला टीवी के डिबेट से करना चाह रहे हों...लेकिन चूँकि मैडम सोनिया की सरपरस्ती में फूंक-फूंक कर कदम रखने वाले मनमोहन सिंह ने ऐसा किया...बात बड़ी लगती है। लेकिन इससे भी मजेदार बात तो यह है कि जब उनसे इस बाबत पूछा गया कि भई, इतने दिनों से आरोप लगते रहे तो जवाब आज ही क्यों...तो उनका कहना था कि...चूँकि आजतक मुझे विश्वास नहीं था कि मुझे कैंडिडेट बनाया जायेगा या नही...लेकिन आज जब मुझे विश्वास हो गया है कि मैं ही कांग्रेस का पी एम इन वेटिंग हूँ...तो जवाब दे दिया। ध्यान देने की बात यह है कि मनमोहन के फार्म में आने के महीनों पहले से ही आलाकमान की तरफ से ये बात बार-बार कही जा रही थी कि उनके कैंडिडेट वे ही होंगे। लेकिन क्या करें भले -मानस लोगों में इज्जत की पुंगी बजने का दर कुछ ज्यादा ही रहता है...सो, कुछ कांग्रेसियों द्वारा प्रधानमन्त्री पद के दावेदार बताये जा रहे राहुल गांधी द्वारा बार-बार आश्वासन मिलने पर भी कि मनमोहन ही कैंडिडेट हैं...उन्हें अपनी कमजोरी का एहसास सताता रहा।
इस बहस को यहीं छोड़ते हैं...आते हैं दूसरी बड़ी पार्टी भाजपा पर, तो इसबार कुछ भी बहुत नया नहीं नजर आ रहा है...शिवाय इसके कि आजतक वाजपेयी के मुखौटे पर वोट मांगने वाली भाजपा आज आडवानी का नाम लेने पर मजबूर है...बाकी हरबार कि तरह इसबार भी भाजपा ने पहले से अपना कैंडिडेट घोषित कर रखा है...आडवानी, पी एम इन वेटिंग! लेकिन आडवानी के पेशानी कि लकीरों में झाँका जाये तो उसमें कहीं न कहीं मोदी और मुरली मनोहर जोशी कि तस्वीर साफ़-साफ़ झलकती है तब जबकि मोदी खुलेआम इसबात का ढिंढोरा पीट रहे हैं कि इसबार ही नहीं बल्कि 2014 का चुनाव भी आडवाणी जी के नेतृत्व में ही लड़ा जायेगा (कौन समझाए उन्हें नेतृत्व में लड़ना और बात होती है और पीएम बनना और) लेकिन कभी- कभी मजबूत और निर्णायक लोग भी काँप जाते हैं, इसे पचाना कोई तकलीफ कि बात नहीं...अब ऐसी भी क्या बात है इज्जत केवल म्रिदुभाशियों कि ही थोड़े होती है... एक बात और जो ख़ास है, 96 के चुनावों को देखें तो, तब तीसरा मोर्चा बना था , जो उस वक्त तक के लिए ख़ास था..लेकिन इसबार तो चौथा मोर्चा भी मोर्चेबंदी में लग गया है। हद तो यह है की महाराष्ट्र में अपने पार्टी के लिए एक अदद मुख्यमंत्री भी न जुगाड़ पाने वाले शरद पवार से लगाए बहन जी तक इस जमात में शामिल हैं...
वहीँ राहुल गांधी के शब्दों में 'आर्थिक सुधार व विकासवादी' व्यक्तित्व वाले बिहार तक ही सीमित रहे बिहार के ,मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपरोक्ष रूप से ही सही इस घुड़दौड़ में शामिल हैं...लेकिन एनडीए के घटक के रूप में उनके लिए यह दिवास्वप्न सरीखा ही है...वे भी इस जुगत में हैं की चुनाव बाद यूपीए से गलबहियां कर कुछ तो उखाड़ ही लें। लेकिन एनडीए कि प्रमुझ घटक किसी भी सूरत में ऐसा होने देने के मूड में नहीं है। क्योंकि पहले ही अपने एक बड़े घटक बीजद के अलग होने के बाद भाजपा इस मामले में ज्यादा सतर्क है...लेकिन राजनीति में कुछ भी संभव है। जब यूपीए के कद्दावर सहयोगी लालू-पासवान और मुलायम यह सपना देख सकते हैं तो फिर नीतीश क्यों नहीं. आखिर हैं तो सब गुरुभाई ही... खैर, चार चरणों के मतदान हो चुके हैं. आखिरी चरण का चुनाव भी बहुत दूर नहीं , तो १६ मई का इन्तजार कर लेना ही मुफीद होगा...फिर किसी हजाम से इसपर बहस करने कि गुन्जायिश ही नहीं बचेगी कि माथे पर कितने बाल हैं. जैसे ही वोटिंग मशीनें अपने अन्दर छिपे राज उगलने शुरू करेंगी...बालों कि गिनती स्पष्ट होती चली जायेगी और पीएम इन वेटिंग/ सेटिंग का सिलसिला भी ख़त्म हो जायेगा।
आलोक सिंह "साहिल"
Sunday, January 18, 2009
क्षमा शोभती उस भुजंग को...
क्या हिन्दुस्तान की माँओं ने कायर और नामर्द जनना शुरू कर दिया है? नही॥ऐसा बिल्कुल नही,अब मुम्बई धमाकों के बाद सोनिया गाँधी का भाषण ही सुन लीजिये (आख़िर,वह भी एक मां हैं..) कि हम भारतीयों में बलिदान की उत्कृष्ट परम्परा रही है...क्या मायने हैं इसके ?क्या हम भारतीय सिर्फ़ गुमनाम मौत मरने के लिए ही पैदा होते हैं? चलिए दूसरे तरीके से बात करते हैं...अगर 26/11 की घटना मुम्बई की जगह वाशिंगटन में हुई होती तो क्या होता..पाकिस्तान अबतक इराक की शक्ल अख्तियार कर चुका होता..पर,भारत ऐसा नही कर पाता..आखिर क्या मज़बूरी आड़े आती है? सच कहते हैं पाकिस्तानी कि हमलोग बिल्कुल कायर और नामर्द।हमारा लहू कभी उबलता ही नही.हर एक घटना के बाद हमारे विदेशमंत्री एक ही राग अलापते हैं कि सारे विकल्प खुले हैं...क्या मतलब निकाले हम इसका ?क्या चुल्लू भर पानी में डूब मरने का विकल्प भी नहीं खुला है?मुम्बई हमले को दो महीने होने को आए और हम जहाँ के तहां हैं...कुछ हुआ है तो फकत लफ्फाजियां..हमारे हुक्मरान कहते हैं कि युद्ध की कोई संभावना नही,अरे,कौन चाहता है कि युद्ध हो? पर, कि पाकिस्तान यूँ हमारी निर्लज्ज कायरता के कारण वाक् ओवर पा जाए यह भी तो नही चाहते...दुर्भाग्य है कि ,अपने जख्मों का हिसाब लेने के लिए हम उम्मीद करते हैं उस अमेरिका से जिसने ख़ुद पाक में आतंक को पाला-पोषा है और बेइंतहा पैसा खर्च करके उसे अपना प्रिय पिट्ठू बनाया है, हम उम्मीद करते हैं उस अमेरिका से जिसे किसी भी सूरत में पाक-अफगान सीमा पर पाकिस्तान की मदद की दरकार है.यदि भारत-पाक युद्ध होता है तो पाकिस्तान अपनी सेना वहां से हटा लेगा जो कि अमेरिका के लिए किसी अंधे कुंए में गिरने से भी बदतर होगा...ऐसे में अमेरिका से मदद की उम्मीद हमारी किस मानसिक दशा को दर्शाता है?आज अगर हमारे पास मुम्बई की घटना में पाक के शामिल होने के पुख्ता सबूत हैं तो अमेरिका के आगे झोली फैलाने का क्या मतलब?क्या हम इस लायक भी नहीं कि छोटे-मोटे हिसाब ख़ुद क्लियर कर लें?हम चीखते हैं कि सारे सबूत पूरे दुनिया को दिखायेंगे,किसे दिखायेंगे,उन्हें जो अपनी आँखे जानबूझकर खोलना ही नहीं चाहते.क्या आंखों देखी को भी प्रमाण की जरुरत होती है?दुनिया में कौन ऐसा अँधा है जिसे पाक की आतंकी करतूतों की ख़बर नही? हमारी पीढी के लिए यह शायद पहलीबार है जब पूरे देश में नेताओं के विरुद्ध रोष की ऐसी लहर उठी है,अगर फिरभी सब-कुछ ऐसे ही चलता रहा तो बहुत जल्द ये लहर सुनामी का रूप धर लेगी,जिसकी तबाही से हमारे हुक्मरान भी बच नहीं पायेंगे...
आलोक सिंह "साहिल"
Saturday, January 17, 2009
इंसान ग़लतियों का पुतला है...
आलोक सिंह "साहिल"
Wednesday, December 31, 2008
ब्लॉगर साथियों माफ़ करना....
-हमें १६वीं सदी के पहले के साहित्य को बक्सों में बंद कर देना चाहिए क्योंकि उनसे आज की पीढी,यूँ कहें हिन्दी को कोई लाभ नहीं.उन्होंने ये नहीं कहा कि आप बिल्कुल उन्हें मत पढ़ें,ये आप की मर्जी.अपने बृज,अवधी और ऐसी तमाम भाषाओँ सम्बन्धी लिप्सा को जमकर बुझाईये पर इस चक्कर में इस पीढी या खासकर आनेवाली पीढी को तो कम से कम मत ही तंग करिए जिसके लिए पैदा होते ही लक्ष्य थमा दिया जाता है कि तुम्हे अंग्रेजी आनी चाहिए,उससे निपटे तो फ्रेंच,जर्मन और ऐसी तमाम भाषाओँ को भी जानना है,इसी बीच हिन्दी तो सीखनी ही है.फ़िर क्योंकर बोझ लादना? वैसे भी एक तरफ़ तो हम आधुनिकता का दम भरते हैं दूसरी तरफ़ रुढियों में जीने का शौक भी पाल रखे हैं.मुश्किल है जी.दोगलापन केवल हमारे नेतागणों को ही शोभा देता है.- दूसरी बात ,वे मंच पर बैठे हुए,अपनी पाईप से धुंए उडा रहे थे,अपना-अपना तकाजा है इस बात पर,हो सकता है कि आप ख़ुद ही खुन्दस खाए हों,अरे भाई कभी सुट्टा के चक्कर में पाकेट ढीली हुई हो,तो इसके लिए आप दुसरे को क्यों नोचने पर अमादा हैं.मैं ये नहीं कहता कि नियम तोड़कर सार्वजनिक जगह पर धुम्रपान अच्छी बात है,पर इसके लिए आप कान तो मत ही खाईये .इसके लिए हमारे स्वस्थ्य मंत्री ही काफ़ी नहीं क्या?
- तीसरी बात उन्होंने कही कि अगर हिन्दयुग्म के लोग सिखाने को तैयार हों तो इस उम्र में भी मैं ब्लॉगर बनना पसंद करूँगा ,क्योंकि दोजख की जबान भी तो यही होगी,अब इसमें क्या ग़लत है भाई?आप ख़ुद दिनभर नेट पर बैठकर टिपटिपीयाते रहते हैं पर जब एक उम्रदराज आदमी वही चीज सीखना चाहता है तो आपत्ति क्यों? समझ से परे है,ये सबकुछ अजी ,अब इतने retrogessive होकर रहेंगे तो तकलीफ होगी,वक्त के साथ,पजामा छोड़कर सूट और खडाऊं छोड़कर स्टायलिश जुटे पहनना तो मंजूर कर लिया पर भाषा की बात आते ही रुढियों की दुहाई... माफ़ी चाहूँगा,एक बात और मैंने पढ़ी थी उसका उल्लेख करना भूल गया.कुछ साथियों ने ये लिखा था की वे ट्राल हैं,अजी ,क्या कम से कम भारत में राजेन्द्र यादव को इसकी जरुरत है ?उल्टा चोर कोतवाल को दांते,ख़ुद राजेन्द्र यादव के साथ जुड़कर थोडी शोहरत बटोर पाने की जुगत में जाने कब आप ख़ुद ट्राल हो गए और दोष देते हैं॥यादव जी को,ये तो बेनियाजी है गुरु...कुछ बुरी लग सकने वाली बातों और शब्दों के लिए सभी ब्लॉगर साथियों से फ़िर माफ़ी...
आलोक सिंह "साहिल"
Thursday, December 11, 2008
मानवाधिकार: अब तो अंगुली करने से बाज आ जाओ...
किसी का कद बड़ा कहना,किसी के कद को कम कहना,
आता नहीं हमें गैर मोहतरम को मोहतरम कहना,
चलो चलें सरहद पर देश के लिए जान देने,
बहुत आसान है बंद कमरे में वंदे मातरम कहना!
इंसानी सभ्यता के शुरुआत के समय से ही अर्थात जब मानव ने जंगली जीवन छोड़कर सामाजिक जीवन में कदम रखा तब से ही प्राकृतिक रूप से उसने अपने अधिकारों और कर्तव्यों के दायरे बना लिए।धीरे धीरे सामाजिक जीवन का विस्तार हुआ,समाज ने एक व्यवस्थित आकार लेना शुरू किया तो, कुछ कायदे क़ानून भी बन गए,जिनके अनुसार कुछ काम करना अनिवार्य हो गए तो वहीँ कुछ काम वर्ज्य बन गए.इन सबके बीच हमें इंसानी(मानवीय) अधिकार भी मिले जो आगे चलकर मानवाधिकार बन गए.
वैसे तो हर देश अपने नागरिकों को तमाम सारे अधिकार देता है और लगभग हर जगह मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थायें भी हैं.भारतीय संविधान में भी नागरिकों को तमाम सारे अधिकार दिए गए हैं,विश्व में शायद सबसे अधिक क्रियाशील मानवाधिकार आयोग भी है.पर ११ सितम्बर की घटना के बाद जब अमेरिकी सैनिकों द्वारा "अबू गारेब जेल" सहित अनेक जगहों पर कैदियों के साथ दरिन्दगी भरे बर्ताव की बातें सामने आयीं,इज़राइल.पलाऊ और मार्शल आईलैंड जैसे देशों में बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार की बातें उभरकर आयीं तो वैश्विक स्तर पर ऐसे किसी संगठन की जरुरत महसूस हुई जो इन सब बातों की देख रेख करे कि कोई भी देश अपने बंदियों या अपने नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार न करे.इस तरह 19 जून 2006 को जेनेवा में युनाईटेड नेशन आफ ह्यूमन राईट्स काउन्सिल का गठन किया गया जिसमें भारत सहित ५३ देश शामिल हैं.हालाँकि इसे अपने गठन के समय से ही अमेरिका,इज़राइल,पलाऊ और मार्शल आईलैंड जैसे देशों का विरोध झेलना पड़ा. खैर,ये तो रही मानवाधिकार आयोग के गठन और इतिहास की बातें,अब आतें हैं भारतीय परिदृश्य में मानवाधिकार आयोग की जमीनी हकीकत पर.भारत में यों तो नागरिकों को संविधान के माध्यम से ढेरों अधिकार और कर्त्यव्य दिए गए हैं इनके संरक्षण के महत्व को देखते हुए अलग से एक स्वच्छंद मानवाधिकार आयोग का गठन भी किया गया,तमाम बड़े अधिकारों से लब्ध यह आयोग जब चाहे जिसे अपने "स्केल" पर नाप सकता है और नपने वाला छींक तक नहीं ले सकता क्योंकि जबतक वो छींकने की जुर्रत करे तबतक उसे निमोनिया हो चुका होगा.हालाँकि ये जरुरी नही कि हर बार ऐसा ही हो पर कमबख्त आंकडों पर किसका जोर है.दुर्भाग्य से इनकी सबसे अधिक गाज गिरती है उन पुलिसकर्मियों पर जो पूरे समाज पर अपनी गाज गिराते फिरते हैं.
एक आतंकी जब ढेरों लोगो को हताहत करने के बाद पुलिस की गोलियों का शिकार होता है तो गहरी नीद में सोया मानवाधिकार आयोग जाग उठता है,जब एक वहशी दरिंदा एक नाबालिग़ के साथ दुष्कर्म करने के बाद बड़ी बेरहमी से उसे मौत के घाट उतार देता है तो सबकुछ शांत रहता है पर जब पुलिस उसी दरिन्दे पर लाठियां चलने लगती है तो आयोग जाग उठता है,निठारी में अनेक बच्चे(जिनकी सही गिनती भी नहीं) एक हैवान की हैवानियत का शिकार हो गए,आयोग ऊँघता रहा पर जब वो हैवान पुलिसिया शिकंजे में आ फंसा तो आयोग जाग उठा,अभी हाल ही में मुम्बई को आतंकियों ने दहला दिया,तब शायद ही कोई महामानव रहा हो जिसका कलेजा न फटा हो पर ये धमाके भी आयोग की कुम्भकर्णी नीद तोड़ने में असफल रहा,पर पकड़े गए एक आतंकी कसाब ने पुलिस पर थर्ड डिग्री का आरोप क्या लगाया झट आयोग जाग उठा,कमाल है जनाब,.......ये कैसी नीद है आपकी? दुनिया के सारे धर्म सम्प्रदाय कहते हैं जो किसी मानव की हत्या करता है वो मानव नहीं रह जाता,या फ़िर आतंकियों का कोई जात धर्म नही होता,वे इंसान ही नहीं होते,क्योंकि कोई भी इंसान किसी की हत्या करने के पहले हज़ार दफे सोचेगा,पर क्या आतंकी ऐसा सोचते हैं कभी.....नहीं,तो...वे कैसे मानव?पर,असल मानव तो वही हैं क्योंकि हमारा आयोग हरदम उन्ही की हिमायत में लगा रहता है.एक हाल की घटना का जिक्र करना लाजिमी होगा,बीते दिनों दिल्ली के बाटला हाउस इलाके में कुछ तथाकथित आतंकी(तथाकथित इसलिए कि हमारे पूज्य,अमर सिंह,कपिल सिब्बल,अर्जुन सिंह जैसे लोग उन्हें आतंकी मानने से इनकार करते हैं ) पुलिस इनकाउन्टर में मारे गए,इस मुठभेड़ में पुलिस के जाबाज अधिकारी एम.सी.शर्मा शहीद हो गए,कुछ अन्य जवान भी घायल हो गए,कमाल तो देखिये जनाब,जो शहीद हुए उनका कोई नही पर जो दुर्दांत मारे गए उनके लिए आयोग वाले गला फाड़ने लगे(यहाँ हम नेताओं की बात नहीं कर रहे हैं,कम से कम इंसानी बिरादरी से तो उन्हें दूर ही रखिये). हालाँकि यह कहना एकतरफा बात होगी कि मानवाधिकार आयोग ने सिर्फ़ बेगुनाहों को ही सजा दिलाई है,कभी कभी उन्होंने गुनाहगारों को भी सजा दिलाई है,ये अलग बात है कि ऐसे आंकड़े ही दुर्लभ होते हैं. ऐसे में यह सवाल बड़ा ही लाजिमी हो जाता है कि क्या मानवाधिकार सिर्फ़ आतंकियों या अपराधियों के ही होते हैं,वीर जवानों,ईमानदार पुलिसकर्मियों या निर्दोष जनता के नहीं ?ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ भारत में ही आतंकियों और अपराधियों के मानवाधिकार की बातें होती हैं,पश्चिमी देशों में भी ऐसी बातें होती हैं.पर वहां दोगलापन नहीं होता,हमारी तरह वहां के मानवाधिकार वाले पुलिस की राह में रोड़े नहीं होते बल्कि उनके सहायक होते हैं,शायद यह भी एक वजह है कि अमेरिका में ११ सितम्बर के बाद आतंकवाद के नाम पर पटाखे तक नहीं फूटे,पर भारत में........खुदा,खैर करे.और दिनों की तो बात नहीं कर सकता पर औपचारिक रूप से घोषित मानवाधिकार दिवस पर यह उम्मीद करते हैं कि शायद अपना आयोग आम जनता और पुलिस के मानवाधिकारों को लेकर भी सचेत रहेगी और बिना वजह अंगुली करने से बाज आएगी.
आलोक सिंह "साहिल"
Friday, December 5, 2008
सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी ऐय्याशियाँ....
बीते दिनों देश ने बड़े वीभत्स दृश्य देखे,ह्रदय को चीर देने वाली चीखें और गुहार सुनीं,जो एक असामान्य बात थी (जो कि अब सामान्य बात हो चुकी है) और उसके बाद एक बेहद सामान्य प्रक्रिया हुई (जो कि इस सरकार में अब तक असामान्य थी),इस्तीफों का दौर शुरू हुआ,बड़े-बड़े नपे या नापे गए।पर समस्या यह है कि जिन तथाकथित नैतिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए इस्तीफे दिए गए उनको कितना नैतिक माना जाए?
क्या देश,पूर्व गृहमंत्री शिवराज पाटिल को इतना काबिल मानता है कि उनके इस्तीफे को सम्मान की निगाह से देखे और उनकी कर्तव्य-परायणता की गाथा गढे?....शायद नहीं,बिल्कुल नहीं....बल्कि यह हास्यास्पद ही है कि एक ऐसा व्यक्ति नैतिक इस्तीफा देता है जिसे नैतिक जिम्मेदारियों का ककहरा तक नहीं पता,उसे पता है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी ऐय्याशियाँ.... नैतिक इस्तीफा देना एक बड़ी घटना होती है जिसका मतलब होता है कि आपने प्राणपण से कोशिश की पर कीन्ही कारणों से आप असफल रहे या फ़िर किसी घटना ने आपको नैतिक रूप से झकझोर दिया हो।पर इनमें से कोई भी शर्त शिवराज पाटिल पर लागू नहीं होती,ये बात कोई भी भारतीय दावे से कह सकता है.बल्कि उन्होंने तो उस बेहद सम्मानीय और स्वस्थ परम्परा की धज्जियाँ उडायीं जिसकी शुरुआत "लाल बहादुर शास्त्री" (रेल मंत्री के रूप में) जैसे महान लोगों ने की थी.ऐसे में इन इस्तीफों का क्या करें? बात असल अभी भी ज्यों की त्यों है,अभी भी पकिस्तान आतंकियों को बेरोक टोक पैदा करता जा रहा है,सुरक्षा तंत्र की स्थति किसी से छिपी नही है(जवानो की वीरता पर किसी को शक नही,पर तंत्र...),ऐसे में आज जो मुम्बई में हुआ कल कहीं और होगा,इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.तो क्या हम हाँथ पर हाँथ धरे बैठे रहे और इन्तजार करें अगली ऐसी ही किसी घटना का?क्या किसी बड़ी घटना की प्रतिक्रिया में कुछ नामुराद इस्तीफे ही काफ़ी हैं?
इसका जवाब राजनेताओं को ढूँढना था,जो की हो चुका.
अब वक्त है यह सोचने का कि इन राजनेताओं का क्या करें,और यह काम जनता को करना है...
आलोक सिंह "साहिल"

