बुधवार, 19 नवंबर 2008

राजनीतिक नपुंसकता......चार चाँद लगाती रहेगी..?

डान फ़िल्म देखी है आपने?अरे वही जिसमें छोरा गंगा किनारे वाला बनारसी पान चबाते हुए बम्बई पहुँचता है और उसके कसीदे पढ़ते हुए गाता है 'ई है बम्बई नगरिया तू देख बबुआ'.जी हाँ,तब मुम्बई,बम्बई हुआ करती थी,उन्ही दिनों इडली,साम्भर,डोसा की बदबू से परेशान बम्बई का एक भूमिपुत्र हांथों में "छड़ी" लेकर पैदा हुआ और तमाम लुन्गीवालों को दक्षिण का रास्ता दिखा ताकि उसे वहां की राजनीति में एक रास्ता मिल जाए,मिला भी और वह छड़ी के बल पर ही किंगमेकर बन बैठा.तब बम्बई विकास के पहियों पर बहुत तेजी से दौड़ रही थी,बहुत विकास हुआ,इतना कि बम्बई,वर्णक्रम में दो कदम आगे बढ़कर 'ब' से 'म' पर आ गई और मुम्बई हो गई. अब वो "छड़ी" पुरानी हो गई थी,बिल्कुल घिसी हुई और कमजोर.तब उसे दरकार थी एक और नई छड़ी की पर उसे सँभालने के लिए नए,मजबूत हाँथ भी चाहिए थे.तब पुत्रमोह और बंटवारों के बीच वो "छड़ी" उसी भूमिपुत्र के भतीजे ने उठा ली,फर्क और भी आया,तब रुख दक्षिण का था अब उत्तर का. अब कहानी से आगे बढ़कर आज के मुद्दे पर आते हैं.आज राज ठाकरे(वही भतीजा) जैसा २००(सक्रिय) कार्यकर्ताओं की पार्टी चलाने वाला बन्दा मुम्बई से उत्तर भारतीयों को खदेड़ने पर अमादा है.कारण इसबार भी वही राजनीतिक हैसियत बना पाने की जद्दोजहद.इसके चलते देशभर में क्षेत्रीयता की आग लपटें लेने लगी,भाषा और क्षेत्र आधारित राजनीति सर उठाने लगी है. क्षेत्रीयता का जो राजनीतिक सबक मुम्बई से चल पड़ा है वह सरेआम उस लोकतंत्र की ऐसी तैसी कर रहा है,जिसके बूते आजादी के वक्त सरदार पटेल ने क्षेत्रीयता और बिखराव के तमाम रुझानों को नाकाम किया था. जब सरदार पटेल ने साढे पाँच सौ सूबों में बँटे हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरोने का काम शुरू किया तो तीन रियासतों से विरोध हुआ जिनमें एक जूनागढ़ भी था जो उन्ही के गृह प्रदेश गुजरात का हिस्सा था.जब वहां का निजाम साम दाम से नहीं माना तो उन्होंने सैनिक कार्रवाई से जूनागढ़ को गुजरात का अभिन्न हिस्सा बना दिया. अगर इस किस्से/घटना को ध्यान रखें तो यह सोचना बिल्कुल ग़लत है कि अगर केन्द्र सरकार चाहे तो भी इस क्षेत्रीयता की लपटों को शांत नहीं कर सकती.विडम्बना है कि आज देश का गृह मंत्री उसी महाराष्ट्र से आता है जहाँ क्षेत्रीयता की राजनीति चरम पर है.उस राज्य में सरकार भी उसी पार्टी की है जो केन्द्र में बैठी है,पर फ़िर भी कोई कुछ कहने को तैयार नहीं........अधिक दुखद/हास्यास्पद यह है कि आज जबकि सारा विश्व आर्थिक मंदी से जूझ रहा है वहीँ हमारा देश भाषा और क्षेत्रीयता की क्षुद्र राजनीति में व्यस्त है जिसे तक़रीबन दो दशक पहले दबा दिया गया था.सवाल यह कि,आख़िर कब तक इच्छाशक्ति की कमी से उपजी राजनीतिक नपुंसकता राजनेताओं की हैसियत में चार चाँद लगाती रहेगी,जाने कब तक?
आलोक सिंह "साहिल"

6 टिप्‍पणियां:

rashmi ने कहा…

bahut hi nirashajanak vishay hai,sach kaha aapne yah raajneetik napunsakta hi hai jisne in socalled raajnetaaon ki haisiyat badha rakhi hai.its really shame for us being lead by these bludyyyyyyy...

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

अफ़सोस जनक है यह ..जब इस तरह से जातीय भाषा विवाद से उभरेंगे तभी देश आगे उन्नति कर सकता है

karan ने कहा…

Kaas ki nafarat karna itna aasan hota jitna ki.....to ham khule manch se in naamuraadon ke prati apne nafart ka ijhaar kar paate.

gajendr ने कहा…

KYA KAHA JAYE ALOK BHAI,SHAYAD HAM RO SAKTE HAIN,YA GAALIYAN BAK SAKTE HAIN,

Husain ने कहा…

The word "Raajnaitik Napunsakta" fit best to the politics of Baal Thaakre and Raaj Thaakre.To be a leader a person should have a sense of patriotism If I will say that to be an Indian leader it will take a long period to Thaakre will not be wrong ….Read a Story of a boy who was in England…One Morning Sir Syed Ahmad Khan who was founder of Aligarh Muslim University was walking in the streets of London…he saw a boy who was standing alone and shooting anyone without gun ….Sir Syed asked him what are you doing? He replied I am defending our country to the enemies. He had a great patriotic desire. If I will say that boy had a great loving sense about his country it will not be wrong. I will give a suggestion to Raaj Thaakre and Baal Thaakre if they want to be popular and to be recognized then they should separate from the politics of India and should make a community of terrorist activities as their follower doing now a days but with a label, Political leaders. They are acting as a terrorist perhaps Many terrorists consider themselves to be patriots fighting for freedom.…How they can become our leaders when they don’t know about the definition of patriot, nationalist, political leader or regional leader. Why they are involved to defame India? They are showing themselves as a patriot perhaps they don’t know the actual meaning of patriot. How they can be patriots when they think Mumbai as separate part? First of all they should learn the meaning of patriot that is one who loves and defend his or her country, the first priority is to love and after it defence comes…I ask a question to Raaj Thaakre for whom he is doing so who is wanting freedom in Mumbai .Because in true sense a person can become leader when he is devoted to the interests or culture of a particular nation including promoting the interests of one country over those of others. Perhaps Mr. Thaakre has forgotten that all Indians are the part of the country………..Hum kyon bhool jaate hain ki ye wahi Baal Thaakre hain jo Rashtra Bhasha ka trissakaar karte nahi thakte jiske man mein apni rashtra bhasha se prem nahi wo apne deshwashiyon se prem kar hi nahi sakta.Its a Dilemma.You have written best Mr. Alok,Keep Continue..you have given the name “Raajnaitik Napunsakta …I give a name now to Raaj Thaakre and Baal Thaakre “Napunshak Leaders in Indian Politics.

आलोक सिंह "साहिल" ने कहा…

नमस्कार हुसैन भाई,आपकी प्रतिक्रिया पढ़ा,आपके राष्ट्रीय कंसर्न को जानकर बेहद खुशी हुई.
बंधू,आपने जो नाम दिया है इन तथाकथित देशप्रेमियों को "नपुंसक राजनेताओं की भारतीय राजनीति" यह बिल्कुल सही है,इससे असहमत नहीं हुआ जा सकता.मुझे यकीन है जब तक आप जैसे जागरूक लोग इस देश में हैं,देश की एकता बिल्कुल से ख़त्म नहीं हो सकती.
बहुत बहुत धन्यवाद.
आलोक सिंह "साहिल"