शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी ऐय्याशियाँ....

बीते दिनों देश ने बड़े वीभत्स दृश्य देखे,ह्रदय को चीर देने वाली चीखें और गुहार सुनीं,जो एक असामान्य बात थी (जो कि अब सामान्य बात हो चुकी है) और उसके बाद एक बेहद सामान्य प्रक्रिया हुई (जो कि इस सरकार में अब तक असामान्य थी),इस्तीफों का दौर शुरू हुआ,बड़े-बड़े नपे या नापे गए।पर समस्या यह है कि जिन तथाकथित नैतिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए इस्तीफे दिए गए उनको कितना नैतिक माना जाए?

क्या देश,पूर्व गृहमंत्री शिवराज पाटिल को इतना काबिल मानता है कि उनके इस्तीफे को सम्मान की निगाह से देखे और उनकी कर्तव्य-परायणता की गाथा गढे?....शायद नहीं,बिल्कुल नहीं....बल्कि यह हास्यास्पद ही है कि एक ऐसा व्यक्ति नैतिक इस्तीफा देता है जिसे नैतिक जिम्मेदारियों का ककहरा तक नहीं पता,उसे पता है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी ऐय्याशियाँ.... नैतिक इस्तीफा देना एक बड़ी घटना होती है जिसका मतलब होता है कि आपने प्राणपण से कोशिश की पर कीन्ही कारणों से आप असफल रहे या फ़िर किसी घटना ने आपको नैतिक रूप से झकझोर दिया हो।पर इनमें से कोई भी शर्त शिवराज पाटिल पर लागू नहीं होती,ये बात कोई भी भारतीय दावे से कह सकता है.बल्कि उन्होंने तो उस बेहद सम्मानीय और स्वस्थ परम्परा की धज्जियाँ उडायीं जिसकी शुरुआत "लाल बहादुर शास्त्री" (रेल मंत्री के रूप में) जैसे महान लोगों ने की थी.ऐसे में इन इस्तीफों का क्या करें? बात असल अभी भी ज्यों की त्यों है,अभी भी पकिस्तान आतंकियों को बेरोक टोक पैदा करता जा रहा है,सुरक्षा तंत्र की स्थति किसी से छिपी नही है(जवानो की वीरता पर किसी को शक नही,पर तंत्र...),ऐसे में आज जो मुम्बई में हुआ कल कहीं और होगा,इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.तो क्या हम हाँथ पर हाँथ धरे बैठे रहे और इन्तजार करें अगली ऐसी ही किसी घटना का?क्या किसी बड़ी घटना की प्रतिक्रिया में कुछ नामुराद इस्तीफे ही काफ़ी हैं?

इसका जवाब राजनेताओं को ढूँढना था,जो की हो चुका.

अब वक्त है यह सोचने का कि इन राजनेताओं का क्या करें,और यह काम जनता को करना है...

आलोक सिंह "साहिल"

4 टिप्‍पणियां:

डॉ .अनुराग ने कहा…

सच कहा सब दुखद है ऐसा लगा जैसे बाकी चीजे गौण हो गई है ,कुर्सी की छीना झपटी शुरू हो गई है

gajendr ने कहा…

maar daliye in naamuradon ko.

Husain ने कहा…

अमरेश मिश्र एक बड़े इतिहासकार और यथार्थवादी लेखक हैं उन्होंने २६ नवम्बर को मुंबई में हुए आतंकवादी हमलो पैर बहुत कुछ लिखा उन्होंने इन आतंकवादी हमलो और कई उलझे हुए प्रश्नों पैर रौशनी डाली है ...अगर एक बार हम अमरेश मिश्र को पढ़ें तो इन सब के बारें में ज्यादा उलझने की जरूरत नही है सच ख़ुद बखुद सामने आ जाएगा ....क्या बात करते हैं आलोक जी अगर ये सारे निकम्मे अभी इस्तीफा नही देंगे तो इनकी कुर्सिया खतरे में पड़ जायेंगी इन दुष्टों को अगर देश से प्रेम होता तो क्या हमें ये सब देखना पड़ता ? क्या अब भी हमारी आँखे बंद हैं? की हमारे हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिकता और आतंकवाद के नाम पैर राजनीति की जा रही ....क्या हमें नही दीखता की ये आतंकवादी कौन हैं ? और ये आतंकवाद फ़ैल कैसे रहा है ? अमरेश मिस्र के लेख का एक अंश मैं यहाँ रखना चाहूँगा ''इस्राइल -अमेरिका और आर एस एस का या खेल १९९१ से चल रहा है की आतंकवाद पैदा मुसलमानों का नाम प्रयोग करो और अंडरवर्ल्ड का कुछ अपराधियों को जिहादी कह कर पुकारो तथा इस प्रकार सभी मुसलमानों को बदनाम करो '' ....अगर इसकी आड़ में कुछ अहमक और भी इन गतिविधियों में शामिल है तो कौन सा पहाड़ टूट गया है ?...ye kutte aiyyaash nahi desh ki tizaarat karte hain .....hamaara durbhagya hai ye ki hamne inhe kursiyon pe bithaaya....ab jo bithaaya hai to saza to bhugatni hi hai...

rashmi ने कहा…

alok ji,shayad lagta hai ki ab KRANTI ka wakt karib aa gaya hai.shayad yah antim aur uchit upaay ho.