Friday, May 30, 2008

एक वाकया,कुछ अजीब सा

एक वाकया,कुछ अजीब सा
पिछले दिनों एक प्रवेश परीक्षा का फॉर्म जमा करने जाना था।चूँकि फॉर्म दिल्ली में ही जमा करना था,इसलिए अल्हदिपने में ढेरों दिन आज कल करते हुए कट गए।पर उस दिन तो फॉर्म जमा करने का अन्तिम दिन था,ये सोचकर अपने अल्हादी मन को थोड़ा समझाया और चल दिया फॉर्म जमा करने।एक तो अन्तिम दिन और उपर से समय भी ४ बजे तक तो बेचैनी तो होनी ही थी।
खैर,नहा धोकर तैयार हुआ,माता जी के तस्वीर को नमन किया और निकल पड़ा।रिक्शा पकड़ा और मेट्रो के लिए बढ़ लिया(actually,आजकल दिल्ली का बड़े शानदार तरीके से विस्तार हो रहा है,यहाँ low floor buses चलने लगी हैं,मेट्रो ने भी अपना जाल फैलाना शुरू कर दिया है।जो भी दिल्ली आता है,उसकी एक ख्वाहिश यह जरुर रहती है कि कम से कम मेट्रो में तो चधेंगे ही।वो जी,हम तो दिल्ली में ही रहते हैं तो भला ये सुनहरा मौका क्योंकर छोड़ देते(असल में इतना अल्हादी हूँ कि महीने २ महीने में एक आध बार ही अपने मोहल्ले से निकल पाता हूँ))।हम मेट्रो पकड़ने कि ताक में रिक्शे की सवारी कर रहे थे यद्यपि मेरे कमरे के सामने से ही बसें वहाँ तक जाती हैं जहाँ तक मुझे मेट्रो से जाना था।लेकिन भाई,मेट्रो की तो बात ही कुछ और है )।रिक्शा अभी कैंप पहुँचा(बताते चलें कि कैंप एरिया में मेट्रो का निर्माण कार्य चल रहा है।मेट्रो वालों ने ६० फीट के सड़क को टीन की दीवारों से घेरकर १६ फीट का कर दिया है।)
जी हाँ तो हम कैंप पहुंचे ,सुबह का समय था,भयंकर भीड़,स्कूली बच्चों को ले जाने वाली छोटी बड़ी गाडियाँ,रिक्शे,आफिस जाने वालों की भीड़ और तफरी करने वाले ढेरों लोग(actually,भीड़ में देखने को शानदार चीज़ें मिल जाती हैं,सभी आयुवर्ग के लिए )।अब तो हम भी अपने रिक्शे सहित भीड़ में हो लिए थे.दांये बांये कि संकरी सडकों (टीन कि घेरेबंदी के कारण ) पर गाड़ियों का हुजूम,एक तरफ़ हम थे और बचे अन्तिम तरफ़ का हाल भी काफ़ी कुछ हमारे जैसा .
अच्छा खासा शोरगुल था।कहीं पी पी....कहीं टें टें...तो कहीं खर्र खर्र... और कभी कभी हमारे जैसे पढे लिखे बुद्धिजीवियों(जो जाम में फंसे थे) द्वारा मर्यादित भाषा में वेदवाक्यों का वाचन,पूरा माहौल भक्तिमय था।ऐसे में मानो red light ने भी अनशन कर रखा था कि अनशन तभी तोड़ेंगे जब दिल्ली की पूरी जनता मेट्रो में सफर करने लगेगी।
जैसाकि मैंने कहा,बहुत देर हो रही थी,सोंचा कि चलो,चलती सड़क को ही पार कर लेते हैं।रिक्शे वाले को १० का नोट थमाया और हीरो की माफिक भीड़ को चीरते हुए आगे निकल आए,मुझे देख कुछ और युवाओं को भी अपनी जवानी का एहसास हुआ(बता देना जरुरी है कि मैं भी अच्छा खासा जवान हूँ,अब कृपा करके "अच्छे खासे" का मतलब मत पूछिएगा)।आखिरकार हमलोग देश के भविष्य है,जब पी एम्, सी एम् के लिए यातायात ठप हो सकता है तो हमारे लिए क्यों नहीं।आगे पीछे देखते हुए हम बीच सड़क पर पहुंचे।तब तक दाहिने से एक कार हमारी तरफ़ बढ़ी,सच कहें तो एक पल के लिए वीरगति प्राप्त करने टाइप की फीलिंग होने लगी थी,संयोग से ड्राईवर समझदार था,मेरे फौलादी जिस्म से पंगा न लेते हुए,स्टाइलिश अंदाज में कट मारते हुए आगे बढ़ गया(ज़माने बाद मुझे अपनी जवानी का एहसास हुआ)।अभी यह हुआ ही कि एक रिक्शा तेजी से मेरी तरफ़ बढ़ा,मेरा जोश उमड़ पड़ा,सनी दयोल अन्दल में आंखों में खून लिए उसकी तरफ़ अपना हाँथ उठाया तो बेचारा रिक्शा वाला चोंईई...ई....की आवाज के साथ रुक गया(जैसे पल्सर में डिस्क ब्रेक लगाने पर होता है)।
इतने में ही red light महोदय वादा खिलाफी करते हुए अपना अनशन तोड़ दिए।बड़ी विडम्बना,एकाएक आगे और पीछे का अथाह भीड़ अपने वाहन समेत सड़क को रौंदने टूट पड़ा(जैसे गुड के टुकड़े पर भुक्खड़ छींटे चारों तरफ़ से जूझते हैं)। बड़ी मुश्किल हुई,हम तो बुरे फंसे। अचानक एक मोहतरमा(२३,२४ की रही होंगी) पीछे से हार्न मारते हुए अपनी स्कूटी दौडा दीं,आगे रिक्शा वाला था,तेजी इतनी थी कि balence बिगड़ गया और उन्होंने रिक्शे को टक्कर दे मारी।फ़िर क्या था,स्कूटी एक तरफ़ गिरी और मोहतरमा दूसरे तरफ़।गनीमत यह रही कि घटना होते ही आने जाने वाले लोग जहाँ के तहां थम गए(दिल्ली जैसे सभी शहर में ऐसा कम ही होता है)।शायद बहुत सारी चीजों का साक्षी बनते बनते रह गया ।मेरी तो साँसे ही मानो थम गई थीं। इधर स्कूटी और रिक्शे के बीच में फंसे हमारे एक युवा साथी बीच सड़क चारों खाने चित हो गए,लेकिन तुरंत अपनी मर्दानगी का ख्याल करते हुए फुर्ती से उठे और दांये बांये देखे बगैर आगे हो लिए।
मेरे लिए भी मौका था,मैं एक सभ्य और जिम्मेदार शहरी की भांति सीन से गायब हो गया। शायद मोहतरमा को गंभीर चोट आई होगी,पर समय किसके पास था(और वैसे भी रह कर भी क्या कर लेते?उल्टे दो चार मासूम हाँथो के भागी बनते)। हमे तो फॉर्म जमा करना था।
इस हादसे से मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ा,हाँ एक बात जरुर हुई तत्क्षण मेरा मेट्रो से जाने का मोह भंग हो चुका था और मैं बस में बैठे बैठे मोहतरमा के बारे में सोंच रहा था,कैसी होगी बेचारी?(अरे भाई,व्यस्त हुआ तो क्या हुआ,इंसानियत मेरे अंदर भी है)।
खैर,इन सब के बावजूद मैं अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम से ३,४ मिनट की देरी से था(इंडिया में ३,४ मिनट का मतलब कुछ नहीं होता,यहाँ तो कोई भी कार्यक्रम ३,४ घंटे से कम देरी से शुरू ही नहीं होता)।

आलोक सिंह "साहिल"

9 टिप्पणियाँ:

karan said...

बहुत ही सही वर्णन किया है आलोक जी आपने.मेट्रो,रोडवेज और भीड़ का लफडा...
अजीब है,सच में ये वाकया.

rashmi said...

समझ नही आ रहा कि हंसूं या तरस खावुं इस घटना पर. पर जो भी है एक बात तो सही है कि आपकी अदायगी बेहतरीन है.

Rajesh Roshan said...

रश्मि जी ने सही कहा अदायगी सही है बस कही कही आप थोड़े भटक गए. आप अपने पोस्ट को फ़िर से पढे आपको पता चल जाएगा

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

मेट्रो होते जा रहे शहरो की यही विडंबना है

jafar said...

bahut hi classic andaj hai

mehek said...

hmmmmmm hamne to metro dekhi bhi nahi asli zindagi mein,magar anubhav bada rochak tha,kuch sikhata bhi,nice one.

Udan Tashtari said...

क्या कहें. बढ़िया लिखा है.

aloka said...

kam chlu
koshishi krte rahe

Aloka

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बढ़िया वाकया है यह मेट्रो लाइफ ही जी यह .लिखा अच्छा है आपने