शनिवार, 12 जुलाई 2008

मैया मैं तो...परमाणु लैन्ह्यो

हमारा प्यारा भारतवर्ष एक प्रगतिशील देश है जिसकी प्रगतिशीलता का अंदाजा ११.६३ फीसदी की मंहगाई दर से ही लगाया जा सकता है.शायद लोगों को पता नहीं कि हमारे पीएम से लगाये योजना आयोग के उपाध्यक्ष और वित्तमंत्री सभी अर्थशास्त्री हैं.फ़िर भी लोग तो लोग हैं कि झुठ्मुथ में मंहगाई का रोना रो रहे हैं. खैर,किसी भी देश के अधिकाधिक विकास के लिए सबसे बड़ी जरुरत होती है उर्जा की.सच्ची बात तो यह है कि सभी मिलकर सबसे जरुरी काम पर अपना दिमाग खपा रहे हैं.अब उर्जा जैसी बड़ी समस्या से निपटने के लिए मंहगाई जैसी छोटी मोटी समस्याओं को इग्नोर तो करना ही पड़ता है .आख़िर बात देश के विकास की जो ठहरी.वैसे भी अगर मंहगाई है तो यह भी तो एक सूचक ही है कि हमारे यहाँ मंहगे मंहगे सामान बिकते हैं इसके मायने है कि हम अमीर हो रहे हैं,आखिरकार पैसा घूमफिरकर देश में ही तो रह रहा है. एक कहावत आपने सुनी होगी अंधे के हाँथ बटेर लगना.जी हाँ,हमारे रहनुमा अभी विचार मंथन में लगे ही हुए थे कि कैसे इंडिया को चमकाया जाए,कि एक पुराने शुभेच्छु देश ने एक उर्जावान प्रस्ताव दे दिया.भूखे को क्या चाहिए दो जून की रोटी ही न!फ़िर क्या था सभी आन्ख्मुन्दकर चिल्लाने लगे कि अगर फलां डील हो गया तो हम भी अमेरिका जैसे हो जायेंगे.ये तो पता ही है कि उर्जा आएगी तो लाईट आएगा और लाईट आएगा तो देश चमकेगा ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका चमकता है.इतनी सी फंडामेंटल थ्योरी है.अजी कहने वाले तो कहते रहें कि देश की सुरक्षा के लिए जरुरी परमाणु परीक्षणों पर रोक लग जायेगी,देश उस सहयोगी का पिट्ठू बन जाएगा पाकिस्तान की तरह,वगैरह वगैरह...लोग भी अजीब हैं,अरे भाई जब डील के बाद जब हम अमेरिका बन ही जायेंगे तो क्या जरुरत है किसी परिक्षण वरिक्षण की.लोग भी न... हाँ जी,तो हमारी सरकार को लगा कि भइया ४ साल बिता दिए पर कुछ भी ऐसा नहीं उखाड़ पाए कि अगले चुनाव में गा सकें,चलो इसी बहाने एक नया गाना तो मिल जाएगा गाने को.पर हमारे बायें वाले भइया लोग पता नही क्या खुन्नस है हमारे मनोहारी साहब से. तो साहब आज तक़रीबन डेढ़ साल होने को है जब से हमारे पीएम साहब निरंतर रोना लगाये हैं कि मैया(भइया) मैं तो चन्द्र खिलौना(परमाणु) लैह्यों.पर भाई जी लोग माने ही नही तभी उत्तर कि तरफ़ से से एक भाई साहब सायिकिल पर बैठे हाँथ में लालटेन लटकाए चले आए,अब जाके हमारे पीएम साहब को आशा की किरण दिखी कि अब तो कुछ भी हो जाए सयिकिल पर बैठकर परमाणु तो लायेंगे ही.धन्य है श्रृष्टि के परम अणु.
आलोक सिंह "साहिल"

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

परमाणु धन्य हुआ!!

डॉ.सुभाष भदौरिया. ने कहा…

आप ठीक फ़र्मा रहे हैं
मैया मैं तो परमाणु लैंहों.
जैहों लोट अबही धरना पे
तेरी गोद न अहिओं.
और मैंया अपने लाड़ले को चली है परमाणु दिलाने.
साथ में लालटेन वाले भी है रास्ता बताने को कहीं घुप अँधेरों में लड़खड़ाकर गिर न पडें.
आप इन पतों पर सचित्र तमाशा देखें और हमारी हौसला अफ़ज़ाई करें.
http://subhashbhadauria.blogspot.com/2008/07/blog-post_06.html

http://bhadas.blogspot.com/2008/07/blog-post_6491.html

gajendr ने कहा…

ABHI GOOGLE SE GUJAR RAHA THA to aapka ek purana article dikh gaya.kya khub kahi hai alok bhai,