बुधवार, 16 जुलाई 2008

.....ख्वाब में जीता रहूँ!!

.....ख्वाब में जीता रहूँ!!
तुमसे मिलना तो पहले इत्तफाक ही था,
पर क्या इत्तफाक कि इत्तफाक से मोहब्बत हो गई।
ढूंढ़ता रहता हूँ तुझे हर वक्त,हर घड़ी गली - गली,
पर अजीब इत्तफाक ,आज फ़िर तू ख्वाबों में ही मिली।
तेरा मिलना भी यूँ तो कम खुशगवार नहीं,
काश तू समझती,ख्वाबों से इतर भी दुनिया हसीं होती है।
रहता है इंतजार हर पहर तेरे ख्वाबों का,
ख्वाबों से बाहर आना तेरा मुनासिब जो नहीं।
चाहता हूँ तुझको बसा लूँ अपने पलकों पर,
हर वक्त नजरें बंद हों और ख्वाब में जीता रहूँ.
आलोक सिंह "साहिल"

6 टिप्‍पणियां:

rajan ने कहा…

सही जा रहे हैं बंधू,सही है

Advocate Rashmi saurana ने कहा…

sundar rachana ke liye badhai.

Udan Tashtari ने कहा…

Bahut badhiya, badhai.

karan ने कहा…

बहुत सही गुरु.

शोभा ने कहा…

आलोक जी
ख्वाब में जीने का अपना ही मज़ा है। पर जब ख्वाब टूटते हैं , बहुत दुख होता है। अच्छा लिखा है। सस्नेह

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सुधर जाओ :) सुन्दर लगी आपकी यह रचना जितनी बार पढ़ी साहिल जी