शुक्रवार, 26 मार्च 2010

कहां मर गईं संवेदनाएं...


अगर कोई छोटा-सा बच्चा किसी अन्य बच्चे को मार दे, तो आप क्या करेंगे ?...उसे डांटेंगे, थपकी लगाएंगे और समझाएंगे...शायद यही करेंगे न...वह भी जब उस बच्चे की उम्र महज 5 साल हो, तो शायद आप इनमें से कोई भी काम न करके सीधे उसे गोद में लेंगे और प्यार से समझाएंगे...

लेकिन इसके उलट अमेरिका की एक स्कूल टीचर ने अपने स्टूडेंट को ऐसी सजा सुनाई कि सोच कर मन सिहर जाता है कि आखिर मूल्यों के कुछ मायने रह भी गए हैं या नहीं...उस 5 साल के बच्चे की खता फकत इतनी थी कि उसने अपने क्लासमेट को मार दिया....उसपर टीचर ने क्लास के दसियों स्टूडेंट्स को उस मारने वाले लड़के के मुंह पर घूंसे मारने का आदेश दे दिया...ये सब सज़ा के नाम पर...जिसका कि उस मासूम को मतलब भी नहीं पता होगा...

टीचर-स्टूडेंट की बात होने के बावजूद मैं यहां...गुरू-शिष्य परंपरा की बात नहीं करूंगा...क्योंकि मुझे पता है अब पहले जैसी बात नहीं रही, लेकिन थोड़ी-सी इंसानियत तो जुटाई ही जा सकती है, जो ये फर्क करा सके कि किसी मासूम के साथ कैसा सलूक किया जाय...मैं नहीं जानता कि इस घटना के बाद उस बच्चे को सज़ा का मतलब पता पाएगा या नहीं...लेकिन इतना ज़रूर है कि इसके बाद उसे नफरत का पाठ ज़रूर कंठस्थ हो गया होगा...

यह घटना कोई नई या अनोखी नहीं है, हां तकलीफदेह ज़रूर हो सकती है...ऐसी ही तमाम घटनाएं अपने देश में भी समय-समय पर घटती रही हैं...अभी कुछ दिनों पहले ही एक टीचर ने एक मासूम छात्रा को ऐसी सजा सुनाई कि बच्ची की मौत ही हो गई...आनन-फानन में कोर्ट-कचहरी सब हुआ...लेकिन परिणाम कुछ नहीं आया...सच तो यह है कि इन घटनाओं में आनन-फानन में उठाए गए किसी भी कदम का कोई परिणाम निकल ही नहीं सकता...क्योंकि इसके लिए व्यापक तौर पर काम करने की ज़रूरत है...

ये रूटीन सी बात हो गई है...जब भी ऐसी घटनाएं घटती हैं, तुरत-फुरत में नए क़ानूनों को बनाने, सजा का प्रवधान करने और जागरुकता लाने जैसी न जाने कितनी बातें एकसाथ होने लगती हैं...और फिर मामला ठंडा होते ही...सबकुछ फेडआउट....

हालांकि तकरीबन हर देश में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए नियम-क़ानून बनाए गए हैं, लेकिन क़ानून के मायने सिर्फ उनके लिए होते हैं...जिन्हें भगवान जैसी सत्ता में विश्वास...या उनसे डर होता है...(क़ानून का तो डर ही नहीं होता किसी में)...और ऐसे लोगों की संख्या के बारे में कोई भी कयास यथार्थ को इंगित नहीं कर सकता....परिणाम यह होता है कि ऐसी घटनाएं बदस्तूर जारी रहती हैं...

ऐसे में खुद से एक सवाल उठता है, क्या ज़रूरी नहीं कि बहुत क़ाबिल, बहुत सफल और महान बनने की दौड़ में अपने अंदर की थोड़ी संवेदना को भी बचा लें!

आलोक साहिल

4 टिप्‍पणियां:

chandan ने कहा…

बच्चों को समझ है कि उन्हें क्या करना है, पर शिक्षक को नहीं। चलन बहुत बगड़ गया है। पता नहीं हम समाज को क्या देना चाहते हैं। बात उस मुल्क की जिसे हम विकसित कहते हैं मेरे हिसाबसे यदि इसे ही तरक्की कहते हैं तो नहीं चाहिए ऐसी तरक्की। लेकिन सवाल शिक्षक के पेशे का है तो बस इतना जरूर कहा जा सकता है कि वो जो कुच लोग थे बदजुबान यहां बांटते फिर रहे हैं ज्ञान यहां............

वीनस केशरी ने कहा…

अंधेर है

Snehil ने कहा…

एक नई पहल की जरूरत है...यूं केवल कागजी बातों से कुछ नहीं होने वाला....

Udan Tashtari ने कहा…

इसके लिए त्वरित और कड़ी सजा का प्रवधान होना चाहिये.

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हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

अनेक शुभकामनाएँ.